डॉ. रामवीर पचास साल पूर्व दिल्ली और आसपास के क्षेत्र में एक विज्ञापन ‘रिश्ते ही रिश्ते’ दीवारों पर बहुत दिखता था। यह पहला मैरिज ब्यूरो था, शादी डॉट कॉम का पूर्वज। मैसेज था कि रिश्तों की कोई कमी नहीं – जैसा चाहो वैसा रिश्ता मिल जाएगा। आज दीवारों पर ‘अन्धे ही अन्धे’ का विज्ञापन लिखवाया जा सकता है। सब तरह के अन्धे उपलब्ध हैं, धर्मान्ध कामान्ध क्रोधान्ध मदान्ध मोहान्ध आदि। ये अन्ध-उत्तरपद वाले अन्धे हैं। अन्ध-पूर्वपद वाले अन्धे अन्धभक्त कहलाते हैं। अन्धभक्त समस्त (समासयुक्त) पद है – इसका विग्रह ‘अन्धा है इसलिए भक्त है’ या ‘भक्त है इसलिए अन्धा है’ दोनों तरह हो सकता है, उपयुक्ततर कौन सा है सन्देह की स्थिति में व्याकरण के विद्वान् से सम्पर्क करना समुचित होगा। आम आदमी की भाषा में जिसे अक्ल का अन्धा कहते हैं उसे ही नव-देशभक्त अन्धभक्त कह कर स्वयं का संस्कारी होना सिद्ध करते हैं। उस दिन एक मित्र ने समझाया कि भारत की संस्कृति अति प्राचीन है। पता नहीं उसे क्यों सन्देह हो रहा था कि लेखक कहीं अर्वाचीन तो नहीं समझता। खैर, मित्र की सन्तुष्टि के लिए सूचित किया कि लेखक ने 1969 में संस्कृत में एम.ए. किया था। उस समय एंटायर संस्कृत जैसा कोई पाठ्यक्रम उपलब्ध नहीं था, होता तो उसे ही चुनता। उन दिनों विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष आज जितने संस्कारी भले न लगते हों पर लेखक को संस्कृत में पीएच.डी. करने के लिए शोध छात्रवृत्ति मिली थी। तेंतीस साल कालिज में संस्कृत पढ़ाने के बाद भी आज जब किसी अन्धभक्त से संस्कृत और संस्कृति पर प्रवचन सुनने की नौबत आती है तो ननिहाल की बात नानी के आगे जैसा लगता है।
अन्धभक्त नई चीज नहीं है, पहले भी होते थे। कठोपनिषद् का मन्त्र/श्लोक ‘अन्धेनैव नीयमाना यथान्धा: …’ (जैसे अन्धों द्वारा ले जाए जाते हुए अन्धे) अन्धभक्तों की प्राचीनता का प्रमाण है। बाढ़ आना सामान्य है, संकट तब आता है जब पानी खतरे के निशान से ऊपर बहने लगता है। आज अन्धभक्तों की यही स्थिति है, अन्धभक्ति की बाढ़ आई हुई है। यह बाढ़ प्राकृतिक नहीं है इसलिए आई नहीं – लाई गई है और जैसे बाढ़ में व्यापक विनाश होता है वैसे ही अन्धभक्ति में समस्त ज्ञान विज्ञान इतिहास भूगोल सभ्यता संस्कृति सब की अपव्याख्या का दौर चल रहा है। दावा सुधार का है इरादा बिगाड़ का। सुधार यदि है तो दस प्रतिशत, बिगाड़ नब्बे प्रतिशत।
देश में अन्धत्व के नवीनतम आंकड़े तो उपलब्ध नहीं हैं, 2022 के आंकड़ों के अनुसार भारत में 4.95 मिलियन पूर्णतया दृष्टिहीन हैं और 35 मिलियन दृष्टिबाधित हैं। आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग तक पौष्टिक भोजन की पहुंच बढ़ा कर और चिकित्सा उपलब्ध करा कर नेत्रों की अन्धता घटाई जा सकती है। यह सरकार की प्राथमिकता में नहीं है उल्टे अन्तर्नेत्रों की दुर्बलताजन्य अंधभक्ति इतनी बढ़ गई है कि चहुं ओर अन्धे ही अन्धे नजर आते हैं।