फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पखवाड़े के पाखंड का दो अक्टूबर को समापन करने के लिए हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने स्थानीय ईएसआई कॉर्पोरेशन द्वारा संचालित मेडिकल कॉलेज अस्पताल को चुना। वह यहां लाडो योजना का आरंभ करने वाले थे लेकिन कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल द्वारा आयोजित नमो वन महोत्सव के बाद राजनीतिक संतुलन स्थापित करने के लिए यहां का कार्यक्रम त्याग कर सीधे केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर के घर चले गए। वास्तव में यह कोई केन्द्र सरकार का कार्यक्रम न होकर राज्य सरकार का अपना कार्यक्रम होता और इसे बीके अस्पताल जैसे परिसर में मनाया जाना चाहिए था। लेकिन सर्वविदित है कि जो सरकारी अस्पताल खुद ही बीमार हो तो वहां कोई क्या कार्यक्रम कर सकता है? लिहाज़ा सिविल सर्जन व उपायुक्त ने अपने सिर से बला टालते हुए कॉर्पोरेशन के गले में डाल दी।
नि:संदेह कॉर्पोरेशन का यह संस्थान आज के दिन न केवल $फरीदाबाद के बल्कि हरियाणा भर के तमाम सरकारी संस्थानों से बेहतरीन हालत में है। लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि हरियाणा सरकार अपने संस्थानों के प्रति इतनी उदासीन क्यों है? उसके पास हिसार के एयरपोर्ट पर खर्च करने को 5200 करोड़, फरीदाबाद के क्रिकेट स्टेडियम को बर्बाद करने के लिए 250 करोड़, आईडी बनाने के नाम पर याशी कम्पनी को देने के लिए 57 करोड़, एमसीएफ द्वारा बिना कोई काम किए 200 करोड़ निगल जाने के लिए तो हो सकते हैं, परन्तु अपने चिकित्सा संस्थानों को चलाने के लिए धन का अभाव रहता है। चलो छोडि़ए इस मामले को, ईएसआई कॉर्पोरेशन द्वारा हरियाणा सरकार को दिए गए अस्पतालों व डिस्पेंसरियों को चलाने में इन्हें क्यों मौत आती है? विदित है कि इन्हें चलाने का केवल आठवां भाग ही राज्य सरकार को खर्च करना होता है शेष सात भाग कॉपोरेशन वहन करता है। अर्थात राज्य सरकार यदि 100 करोड़ खर्च करती है तो 700 करोड़ कॉर्पोरेशन वहन करता है। नियमानुसार प्रत्येक बीमाकृत मज़दूर के लिए कॉर्पोरेशन ने फिलहाल 3,000 रुपये वार्षिक की लिमिट रखी हुई है। इस हिसाब से हरियाणा के 30 लाख बीमाकृतों के लिए 900 करोड़ का बजट हरियाणा सरकार को बनाकर खर्च करना चाहिए। जाहिर है कि इसमें राज्य सरकार का मात्र 112 करोड़ ही खर्च होगा जिसके बदले राज्य के 30 लाख परिवारों को एक बेहतरीन चिकित्सा सेवा उपलब्ध हो सकती है।
3,000 रुपये प्रति बीमाकृत के अलावा कॉर्पोरेशन 200 रुपये प्रति बीमित उस स्थिति में अतिरिक्त प्रदान करता है जब इनके अस्पतालों में 70 प्रतिशत से अधिक बेड भरे हों। यह कोई मुश्किल काम नहीं है जिसे करने पर राज्य को 60 करोड़ अतिरिक्त प्राप्त हो सकते हैं। जिसका आठवां हिस्सा भी राज्य सरकार को वहन नहीं करना पड़ता। इतना ही नहीं कुछ छोटे-छोटे कैम्प लगाने पर 20 रुपये प्रति बीमाकृत के हिसाब से और मिल सकते हैं, यह रकम भी छ: करोड़ बन जाती है। जाहिर है कि यदि राज्य सरकार की नीयत जन एवं मज़दूर विरोधी न होती तो वह मौजूदा 250 करोड़ की बजाय 966 करोड़ का बजट बनाकर अपने द्वारा संचालित तमाम ईएसआई अस्पतालों व डिस्पेंसरियों की दशा सुधार कर 30 लाख बीमाकृत परिवारों को बेहतरीन चिकित्सा सेवा प्रदान सकती है। परन्तु यह सब तो तब सम्भव हो सकता है न, जब जन कल्याण की नीयत व भावना नायब सिंह जैसे मुख्यमंत्री के अंदर हो जो खुद भी श्रम मंत्री रह चुका है।
सीएम नायब सिंह सैनी के पौधरोपण कार्यक्रम के पाखण्ड के लिए सैक्टर-9 में सरकारी स्कूलों के करीब एक हजार बच्चे सुबह छह बजे से ही ले जाकर बैठा दिए गए। सीएम तो ग्यारह बजे के बाद आए तब तक ये बच्चे भूखे प्यासे बैठे रहकर मुरझाते रहे। शिक्षा विभाग ने इन बच्चों के लाने ले जाने के लिए निजी स्कूलों की बसें तो लगवा दीं लेकिन उन्हें भूख भी लगती है, प्यास भी सताती है इसका एहसास सीएम के जाने के बाद भी अधिकारी को हुआ या नहीं कहना मुश्किल है।