क्या शहर में अपराध खत्म हो गए जो पुलिस पत्रकारों के पीछे पड़ी है

क्या शहर में अपराध खत्म हो गए जो पुलिस पत्रकारों के पीछे पड़ी है
September 25 00:12 2025

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) शहर की पुलिस के पास हत्या, झपटमारी, लूट मार और अराजकतत्वों से निपटने का समय भले ही न हो लेकिन पत्रकारों के खिलाफ फर्जी शिकायत मिलते ही जांच किए बिना ही नोटिस और गिरफ़्तारी के सारे प्रयासों में मुस्तैदी से जुट जाती है। यदि पत्रकार सरकार और शासन प्रशासन की सच्चाई उजागर करने वाला हो तो फिर उसकी शामत पक्की समझो। बीके अस्पताल में सक्रिय निजी एंबुलेंस रेफर गैंग ने इस बार मज़दूर मोर्चा सोशल मीडिया के पत्रकार शेखर दास को निशाना बनाया और पुलिस आयुक्त कार्यालय में शिकायत दे दी। शिकायत मिलते ही पुलिस मामले की तफ्तीश में गंभीरता से जुट गई और बयान व पूछताछ के नाम पर पत्रकार को बार बार चौकी बुलाकर परेशान करने का खेल शुरू हुआ। हालांकि पुलिस को भी मालूम है कि शिकायत में कोई दम नहीं है और यदि गंभीरता से जांच की जाए तो शिकायतकर्ता मुकेश जो कि निजी एंबुलेंस का संचालक है, ही गलत पाया जाएगा। बावजूद इसके पुलिस पत्रकार को लपेटने की तैयारी में नजर आ रही है।

समाजसेवी सतीश चोपड़ा बीते करीब नौ महीनों से रेफर मुक्त फरीदाबाद के लिए धरने पर बैठे हैं। दरअसल, बीके अस्पताल में आने वाले मरीज को कागजों पर रेफर तो सफदरजंग दिल्ली, या रोहतक मेडिकल कॉलेज किया जाता है लेकिन अस्पताल में सक्रिय निजी एंबुलेंस गैंग उन्हें बहला फुसला कर शहर के किसी नर्सिंग होम पहुंचा देता है, और मरीज की लूट का कमीशन हासिल करता हैं। सतीश चोपड़ा के इस अभियान से सबसे ज्यादा परेशानी बीके अस्पताल परिसर के बाहर नंबर लगाकर खड़े इन्हीं एंबुलेंस वालों को हो रही थी। मज़दूर मोर्चा सहित अन्य अखबारों और मीडिया ने बीके अस्पताल में चल रहे रेफर कमीशनखोरी के इस धंधे को उजागर किया। इससे परेशान एंबुलेंस चालकों ने मीडिया को भी साधना शुरू किया लेकिन मजदूर मोर्चा काबू नहीं आया।

इस पर कमीशनखोर संचालकों ने सतीश चोपड़ा और मज़दूर मोर्चा के खिलाफ षणयंत्र करने शुरू किए। बताया जा रहा है कि जिस निजी एंबुलेंस चालक मुकेश ने मजदूर मोर्चा के रिपोर्टर शेखर दास के खिलाफ पुलिस में शिकायत दी है इससे पहले उसने सतीश चोपड़ा के खिलाफ भी षणयंत्र किया था। बाद में उसे एनआईटी तीन नंबर चौकी में सतीश चोपड़ा से लिखित माफी मांगनी पड़ी थी। इस बार उसने मज़दूर मोर्चा के पत्रकार शेखर दास के खिलाफ झूठी शिकायत दी है। शिकायत में जिस वीडियो का हवाला दिया गया है उसमें न तो मुकेश और न ही किसी अन्य काम नाम लिया गया है, केवल दलाल की बात की गई है। जिस फोटो का मुकेश जिक्र कर रहा है उसमें भी उसका चेहरा नहीं दिख रहा है। मुकेश ने जो शिकायत दी है उसके अनुसार 28-29 जुलाई की रात उन्हें रिश्ते के साले कालू का फोन आया कि उसके दोस्त सचिन का एक्सीडेंट हो गया है, उसे बीके अस्पताल में लाए हैं। मुकेश बीके अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि सचिन की जांघ की हड्डी टूटी है। मुकेश का आरोप है कि वह एक्स रे रिपोर्ट देख रहे था कि पत्रकार हरेंद्र स्वामी आ गया और उनकी वीडियो बनाने लगा।

जैसा कि होता है कि बीके अस्पताल से सचिन को दिल्ली रेफर कर दिया गया। घायल सचिन को 108 एंबुलेंस से सफदरजंग दिल्ली भेजे जाने की बजाय मुकेश अपनी एंबुलेंस से सूर्या हॉस्पिटल ले जाने लगा, आरोप है कि वीडियो बना रहे हरेंद्र स्वामी ने घायल को रोक कर उससे पूछताछ शुरू कर दी, लेकिन मुकेश ने उसे सूर्या अस्पताल पहुंचा दिया। आरोप है कि यह वीडियो हरेंद्र ने सतीश चोपड़ा को दी जिनके कहने पर शेखर दास ने वीडियो बना कर चलाई। इस वीडियो में मुकेश और उनकी पत्नी के मान सम्मान को ठेस पहुंचाना बताया गया है। मजे की बात यह है कि वीडियो में न तो मुकेश का जिक्र है और न ही उनकी पत्नी का कहीं नाम है। वास्तव में शेखर को चौकी में आने के बाद ही पता चला कि मुकेश की पत्नी रीना भी बीके अस्पताल में कर्मचारी होने के नाते मुकेश को उसके धंधे में सहयोग करती है।

यह अलग बात है कि मुकेश ने शिकायती पत्र में खुद ही मान लिया कि वीडियो में जिसे दलाल बताया जा रहा है वह खुद ही हैं और परिजन का अनुमान उन्होंने उनकी पत्नी के लिए लगाया है। बीके में तो अनेक निजी एंबुलेंस वाले दलाल दिन रात मरीजों को फांस कर नर्सिंग होम पहुंचाने में लगे रहते हैं, यदि मुकेश उनमें से नहीं हैं तो उन्हें बुरा नहीं लगना चाहिए था। बीके में काम करने वाले सभी कर्मचारियों के परिजन और रिश्तेदार होते हैं तो मुकेश को आरोप में उनकी पत्नी ही क्यों नजर आई। हालांकि मुकेश एक बार सतीश चोपड़ा से लिखित माफी मांग चुका हैं जिससे उसका चरित्र और कारोबार संदिग्ध माना जा सकता है। ऐसे में पुलिस को चाहिए कि पहले वह मुकेश की पिछले छह महीनों की दिनचर्या का पता करे, इसके अलावा वह जिस एंबुलेंस का मालिक है उससे पिछले छह महीनों में कितने मरीज निजी अस्पतालों में पहुंचाए गए, उनका ब्यौरा भी निकाले, तो तस्वीर काफी कुछ साफ हो जाएगाी।

मज़दूर मोर्चा का उद्देश्य शासन-प्रशासन की खामियों को उजागर कर समाचार के माध्यम से सरकार को अवगत कराना है, इसी के तहत बीके अस्पताल में निजी एंबुलेंस की दलाली का खेल उजागर कर सरकार तक पहुंचाने का प्रयास किया गया ताकि वह कोई ठोस कदम उठाए। समझने वाली बात यह भी है कि सरकार ने 108 एंबुलेंस सेवा प्रदान की हुई है। इसके तहत एक्सीडेंट, प्रसव, इमरजेंसी या बीमारी आदि मामलों में अस्पताल पहुंचाने की निशुल्क सेवा दी जाती है। जब इतनी बड़ी सेवा उपलब्ध है तो निजी एंबुलेंस की जरूरत नहीं होनी चाहिए। बावजूद इसके बीके अस्पताल परिसर के बाहर इनका जमावड़ा होना ही दलाली के खेल की ओर इशारा करता है। मुकेश से ये भी पूछा जाना चाहिए कि क्या उनकी एंबुलेंस सिर्फ बीके से मोटे बिल फाडऩे वाले निजी नर्सिंग होम ले जाने के लिए ही है या वे कभी नर्सिंग होम के मरीजों को सस्ता सुलभ इलाज दिलाने के लिए वहां से बीके भी लेकर भी आए हैं। पुलिस को अपनी जांच में ये सारे बिंदु भी शामिल करने चाहिए। मुकेश जैसों की झूठी दरख्वास्त को लेकर पुलिस का इतना गंभीर होना कि खुद एसएचओ भी चलकर चौकी में पहुंचे, ये सिद्ध करता है कि मुकेश जैसों की पुश्तपनाही करने वाली कुछ बड़ी ताकतें भी खड़ी हैं। ऐसे धंधेबाजों के पीछे कितनी ही बड़ी ताकतें क्यों न हों मज़दूर मोर्चा उनकी खबर लेने से पीछे नहीं हटेगा।

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