अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड दे।

अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड दे।
August 23 06:43 2025

यह शेर सुना होगा। कविता लिखने में दिलो-दिमाग दोनों से काम लेना पड़ता है। आज दिमाग थका हुआ था, छुट्टी मांग रहा था, वैसे दिमाग बड़ा आज्ञाकारी है – सदा मुस्तैद। आज पहली बार छुट्टी मांगी तो लगा यह तो बनती है एंड आई नोटिड ‘सैंक्शंड’ ऑन इट्स लीव एप्लिकेशन। अब दिल तन्हा था तो गीत लिख बैठा। तो दिल न तोडें कविता की जगह गीत से काम चलाएं। राजेन्द्र यादव अब नहीं हैं, जब तक रहे अपने मासिक हंस में गज़़ल और कभी कभी अतिबौद्धकता के बोझ से दबी कविताएं छापते रहे, गीत से ऐसे बचते थे जैसे स्वयं को सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण घोषित करने वाले रामभद्राचार्य पिछड़ों/दलितों से बचते हैं। रामभद्राचार्य ने नामोल्लेख पूर्वक पांच प्रकार के ब्राह्मणों को निकृष्ट भी घोषित किया है। अब स्मृति उतनी सबल तो नहीं है पर कुछ कुछ याद आ रहा है जैसे यादव जी ने भी गीत निन्दा में आनन्दानुभूति का इजहार किया था। बुढ़ापे में राजेन्द्र यादव और उनकी पत्नी मन्नू भंडारी अलग अलग रहे, दाम्पत्य में पार्थक्य। लगता है यादव जी का हृदय पक्ष मूलत: दुर्बल था इसलिए न उनकी गीत से बनी और न पत्नी से। गीत और पत्नी दोनों दिल मांगते हैं।
— डॉ. रामवीर

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Mazdoor Morcha
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