भाजपा राज में पुलिस की मूक सहमति से फल फूल रही मॉब लिंचिंग-गुंडागर्दी फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) मोदी-खट्टर-सैनी के मॉब लिचिंग वाले राज में दबंग, दंगेबाज और अराजकतत्व इतने बेखौफ हो चुके हैं कि उन्हें किसी कानून किसी पुलिस की कोई परवाह नहीं रही। पचास-साठ के झुंड में लाठी-डंडे, धारदार, नोकदार हथियारों के साथ कहीं भी किसी पर हमला कर देते हैं। राम नगर में रहने वाले रितिक का 27 जुलाई को जन्मदिन था। इस खुशी में वह शाम करीब पौने छह बजे अपने एक जाटव, दो वाल्मीकि और तीन मुसलमान दोस्तों को बस्ती के बाहर बाटा मोड़ स्थित एक रेहड़ी पर बिरयानी खिलाने लाया था। इसी दौरान दिनेश कउवा, हर्ष, लाला, सन्नी, सतीश चुटिया, गौरव, भक्तू, पूंजी, सहित करीब साठ-पैंसठ हथियारबंद साथियों को आता देख रितिक और उसके साथी वहां से मंदिर की ओर भागे। तीन चार दोस्त तो जान बचा कर भाग निकले लेकिन रितिक को सन्नी ने पीछे से पकड़ कर पटक दिया, इसके बाद सबने लाठी, डंडे, लातू-घूसों, सुआ आदि से उस पर जानलेवा हमला किया। रितिक के अनुसार दिनेश कउवा कह रहा था कि इसे जान से मार दो बाकी मैं देख लूंगा। हमलावर रितिक को लगभग मरा जान कर सड़क पर पड़ा छोड़ कर चलते बने।
विदित है कि जिस बाटा मोड़ पर ये चुकी है तो दबंगों में कानून का खौफ खत्म होता जा रहा है। सूचना मिलने पर सेक्टर 11 चौकी की पुलिस ने निजी अस्पताल पहुंच कर हृतिक का बयान दर्ज किया। इसके बाद केस की तफ्तीश करने घटनास्थल पर पहुंची, वहां मंदिर के सीसीटीवी फुटेज देखने से सच्चाई सामने आ गई। तफ्तीश पूरी करने के बाद रात 11.55 बजे जेर दफा बीएनएस 115, 126, 190, 191 (3) और 351 (3) (आईपीसी की धारा 323,506, 341, 148 और 149) जैसी कमजोर एवं जमानती धाराओं में मुकदमा नंबर 295 दर्ज कर लिया। इन धाराओं में गिरफ्तार करना भी कोई जरूरी नहीं समझा जाता लेकिन फिर भी पुलिस ने खबर लिखे जाने तक सन्नी और लाला को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।
इधर चंदरपाल अपने अधमरे बेटे का इलाज कराने में व्यस्त हो गए, उधर दबंगों का झुंड बचाव और पेशबंदी करने के लिए अपने नेता दीना (दीनदयाल) की शरण में जा पहुंचा। सत्तापक्ष के मंत्री-विधायकों की जूतियां उठाने, उनके लिए भीड़ जुटाने, जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगवाने के लिए अपनी कौम के बेरोजगार, ल_मारों की भीड़ जुटाने वाले दीना ने दलित कार्ड खेलते हुए पीडि़त के खिलाफ ही पुलिस आयुक्त सहित थाने चौकी में दिनेश कउवा की पत्नी अनुपम की ओर से झूठी शिकायत दिलवाई। विदित है कि दिनेश कउवा असावटी का रहने वाला है, और दबंगई करने यहां आता रहता है।
दरख्वास्त में मामले को जातीय रंग देने के लिए जाट बनाम दलित का भी खेल खेला गया है, क्योंकि पीडि़त जाट है और इत्तेफाक से चौकी इंचार्ज भी जाट है, इसी आड़ में जातीय कार्ड खेला गया। यह भी गौरतलब है कि एफआईआर में केवल वो ही छह नाम लिखे गए, अन्य का शब्द नहीं लिखा गया, इसका मतलब यह हुआ कि मामला पूरे गिरोह के बजाय केवल नामजद लोगों तक ही सीमित रहेगा। बेशक चौकी इंचार्ज सुनील ने मुकदमा दर्ज करने की हिम्मत तो दिखाई है, परंतु लगाई गई धाराएं बहुत ही कमजोर किस्म की नजर आ रही हैं, क्योंकि हत्या के प्रयास की धारा आईपीसी 307 (बीएनएस की धारा 109 ) नजर नहीं आती।
कायदे से इस केस में यूएपीए की धाराओं का भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए था। यदि चौकी इंचार्ज इस एक्ट को इस्तेमाल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया तो अफसरान बाला को इसका प्रयोग जरूर करना चाहिए था। यह अधिनियम अराजकता फैलाने वाले गुंडा तत्वों को नियंत्रित करने के लिए ही बनाया गया है न कि राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए। पुलिस की ढिलाई के चलते ये गुंडा तत्व दो चार दिन में जमानत पर आ जाएंगे और फिर वही गुंडागर्दी का तांडव करेंगे। रितिक के पिता चंदरपाल बताते हैं कि ये दबंग दलित बार बार एससी-एसटी एक्ट लगवा कर जीवन बर्बाद करने को धमकाते हुए कहते हैं कि हमारी बस्ती से निकल जाओ, यदि पुलिस और प्रशासन भी हमारा साथ नहीं देगा तो हम गरीबों को पलायन करने को मजबूर होना पड़ेगा।