फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सिटी बस रूट नंबर 912 यानी बल्लभगढ़ डिपो- पाली चौक और रूट नंबर 915 यानी बस डिपो से धतीर पर एफएमडीए ने बसों का संचालन अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। यह तो होना ही था, जो एफएमडीए अपनी स्थापना का उद्देश्य यानी सड़क, पेयजल, जल निकासी, सीवर जैसी आधारभूत सुविधाएं ही नहीं दे पा रहा है वह बसों का संचालन क्या कर पाता। बसें बंद करने का कारण सड़कों की जर्जर हालत होना बताया जा रहा है, लेकिन सड़कें तो पहले से ही खराब थीं, सच्चाई यह है कि एफएमडीए के हरामखोर अधिकारियों को भी अच्छी तरह पता था कि ये बसें नहीं चल पाएंगी, बावजूद इसके बसें चलाने के नाम पर करोड़ों रुपयों की बंदरबांट का इंतजाम किया गया। सवाल यह भी है जब आपको पता है कि आपकी खड्डेदार सड़कें लो फ्लोर बसों के लायक नहीं है तो साधारण बसें क्यों नहीं खरीदी गईं। साधारण बसों में मोटा कमीशन नहीं बनता इसलिए लो फ्लोर बसों पर पैसा लुटाया गया।
दरअसल, एफएमडीए से बस चलवाने का काम वैसे ही है जैसे कुम्हार से लोहार का काम लेना। एफएमडीए अपनी स्थापना से लेकर आज तक कोई भी ढंग का काम नहीं कर सका, सड़क मरम्मत का एक सप्ताह या महीने भर के प्रोजेक्ट को एक साल में भी पूरा नहीं कर सका। निर्माण इतना घटिया कि 36 लाख रुपये खर्च कर बनाया गया हार्डवेयर चौक छत्तीस सप्ताह में ही गड्ढों में तब्दील हो जाए। तीन तीन साल में भी रैनीवेल प्रोजेक्ट चालू नहीं करा सके लेकिन इनके नाम पर मोटे मोटे बिल फाड़ कर हिस्सापत्ती का खेल किया गया। एसटीपी हों या सीवर लाइन की सफाई करोड़ों उड़ाने के बावजूद समस्या जस की तस बनी रही, यानी जो एफएमडीए अपने काम सही ढंग से न कर पाए वह सिटी बस चलाए तो बेड़ा गर्क होना तय है।
एफएमडीए को भी उसी राह पर चलाया जा रहा है जिस पर करीब दो दशक पहले नगर निगम चला था। तब नगर निगम को भी सिटी बस सेवा देने के लिए सौ लो फ्लोर सीएनजी बसें सौंपी गई थीं। बसेें तो दे दी गईं लेकिन उनके संचालन, रखरखाव, सर्विसिंग आदि के लिए जरूरी स्टाफ भर्ती नहीं किया गया। जो चंद चालक थे उन्हें भी इन आधुनिक बसों को ऑपरेट करने की जरूरी ट्रेनिंग नहीं दी गई। नतीजा यह हुआ कि करोड़ों रुपये कीमत की ये बसें चलीं ही नहीं और खड़े-खड़े खराब हो गईं। सुधी पाठकों को बताते चलें कि बस संचालन के लिए पेशेवर दक्ष लोगों की जरूरत होती है। इसमें बसों का संचालन सुनिश्चित करने वाले चालक-परिचालक और सफाईकर्मियों से लेकर स्टेशन सुपरवाइजर, ट्रैफिक मैनेजर, वक्र्स मैनेजर, एसपीओ, डिप्टी इंस्पेक्टर, सुपरिंटेंडेंट, जीएम आदि स्टाफ होता है तब कहीं संचालन सुनिश्चित होता है।
यही हाल एफएमडीए का है इसके पास भी सिटी बसों के संचालन के लिए समर्पित स्टाफ व आधारभूत ढांचा नहीं है। ये बसें बंद ही होनी थीं क्योंकि एफएफडीए में वही निकम्मे और हरामखोर अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद फिर से तैनात किए गए हैं जिन्होंने नगर निगम, हूडा, पीडब्ल्यूडी आदि में रहते हुए शहर की ऐसी तैसी की थी। जो नगर निगम में बसें नहीं चलवा सके थे वो यहां भी नहीं चलवा पाएंगे। जानकार कहते हैं कि सरकार में बैठे नेता- मंत्रियों की मंशा सिटी बसें चलाने की नहीं है, क्योंकि इसमें बड़ा खर्च आएगा। इसके विपरीत बसों की खरीद में करोड़ों रुपयों की बंदरबांट की जाती है, जनता का क्या है वह तो सरकारी जुमलों से खुश होती रहेगी।