फ्ररीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) प्रशासनिक भ्रष्टाचार और लूट का पर्याय बन चुकी ‘संस्कारी’ भारतीय जनता पार्टी की सरकार में जनता की गाढ़ी कमाई लूटने वाले हरामखोर-कमीशनखोर अधिकारियों को कैसे सम्मानित किया जाता है, इसका बेहतरीन उदाहरण 37 लाख रुपये गबन का दोषी संस्कृत अध्यापक यतींद्र शर्मा है। जिस भ्रष्टाचारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश थे उसने अधिकारियों को शिष्टाचारपूर्वक खरीद लिया और न केवल क्लीनचिट् हासिल की बल्कि हाथों हाथ पदोन्नति पाने का दम भर भर रहा है। जिस तरह भ्रष्टाचारी नेता भाजपा में शामिल होते ही पाक साफ हो जाते हैं उसी तरह भ्रष्टाचारी संस्कृत अध्यापक यतींद्र भी सीएम सैनी की वाशिंग मशीन में धुल कर स्वच्छ हो गया लगता है।
शिक्षा विभाग का शातिर संस्कृत अध्यापक यतींद्र कुमार शर्मा का पूरा कार्यकाल विवादों से घिरा रहा है। उसने नकारात्मक परिणाम आने के बावजूद झूठे दस्तावेज लगाकर राज्य शिक्षक पुरस्कार हड़पा और सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए), राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आरएमएसए) की धनराशि हड़पने और गबन करने का दोषी है। यतींद्र कुमार शर्मा सेहतपुर स्थित सरकारी स्कूल में संस्कृत शिक्षक 2001-06 तक रहा। कक्षाएं तो पढ़ाईं नहीं इसलिए हर साल परिणाम खराब ही आता रहा। नकारात्मक परिणामों के कारण यतींद्र शर्मा राज्य शिक्षक पुरस्कार पाने के लायक नही था। बावजूद इसके उसने तथ्य छिपाकर और गलत जानकारियां देकर किसी तरह 2009 में राज्य शिक्षक पुरस्कार झटक लिया। जागरूक शिक्षकों ने इसके खिलाफ शिकायत की थी लेकिन तू डाल डाल मैं पात-पात की तर्ज पर शर्मा ने शिक्षा विभाग की एडिशनल डायरेक्टर किरण मई को ही खरीद लिया, फिर क्या था उन्होंने शिकायत ही खारिज कर दी। लेकिन शिकायतकर्ता भी हतोत्साहित नहीं हुए और लड़ाई जारी रखी। फिर से जांच का नाटक किया गया और 2022 में दिखावे के लिए अयोग्य बताकर उससे पुरस्कार वापस ले लिया गया। दिखावा इसलिए क्योंकि सिर्फ पुरस्कार वापस लिया गया लेकिन पुरस्कृत शिक्षक को मिलने वाली वेतनवृद्धि व आर्थिक लाभ आदि बरकरार रखे गए और रिकवरी भी नहीं की गई। इससे लगता है कि पुरस्कार भी दिखावे के लिए ही वापस लिया गया है वास्तव में पुरस्कार वहीं कायम है। उसकी हरामखोरी यहीं नहीं रुकी, 2011 से 2015 के बीच छात्रों की यूनिफार्म, स्टेशनरी आदि के लिए आने वाली करीब 37 लाख रुपये की ग्रांट भी डकार गया। 2017 में उसने स्कूल में शौचालय, कमरे आदि बनने के लिए कम निर्माण सामग्री मंगवा कर ज्यादा का बिल लगाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया। 2 लाख रुपये के बिल को फर्जी तरह से बढ़ा कर 2.26 लाख का बना कर रकम भी वह हड़प गया।
इस सबके बावजूद यतींद्र का खेल जारी रहा और उसने सेहतपुर में ड्राइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (डीडीओ) रहते हुए कई कर्मचारियों को निर्धारित से अधिक छुट्टियां दीं और फरलो पर भेजा, उन्हें इस दौरान का वेतन जारी कर राज्य के खजाने का नुकसान पहुंचाया। डीडीओ रहते हुए उसने उन शिक्षकों को (एश्योर्ड कॅरियर प्रोग्रेसिव) एसीपी का लाभ दिलवा दिया जो इसके पात्र नहीं थे, जबकि पात्र शिक्षकों को इससे वंचित रख कर उनके अधिकारों का हनन किया।
उसकी करतूतों के कारण विद्यालय की बदहाली से नाराज सेहतपुर गांव के जागरूक नागरिक भूपेंद्र शर्मा ने 2018 में सीएम विंडो पर इसकी शिकायत की थी। निदेशालय स्तर हुई जांच में यतींद्र शर्मा दोषी पाया गया था और डायरेक्टर एलिमेंटरी एजुकेशन ने उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई सहित एफआईआर दर्ज कराने के आदेश जारी किए थे। इसके बावजूज यतींद्र की मिलीभगत से तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी शशि अहलावत ने कोई कार्रवाई नहीं की। बाद में तत्कालीन डीईओ ऋतु चौधरी ने 14 अक्तूबर 2020 को उसे निलंबित कर रूल सात के तहत कार्रवाई की। सितंबर 2021 में मुख्यमंत्री कार्यालय से यतींद्र शर्मा के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने और गबन किए हुए 37 लाख रुपये रिकवर करने का आदेश तत्कालीन जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी मुनेश चौधरी को दिया गया था। यतींद्र ने ऊपर तक सेटिंग कर रखी थी इसलिए पहले उसने विभाग की भ्रष्टतम और अयोग्य डीईईओ मुनेश चौधरी को साधा। नजराना मिलते ही मुनेश चौधरी ने मामला लटकाने की गरज से निदेशक हरियाणा मौलिक शिक्षा निदेशक से मार्गदर्शन मांगा। इसके बाद यतींद्र ने निदेशालय में उसका मामला देख रही असिस्टेंट डायरेक्टर शंकुतला संधू को खरीदा।
उन्होंने भी एक झूठी जांच का हवाला देकर सीएम ऑफिस को गुमराह कर मामला लटका दिया। यतींद्र ने कार्रवाई टालने और बरी होने के लिए जिले में आने वाले लगभग हर डीईओ और डीईईओ को रिश्वत खिलाई। मुनेश चौधरी के अलावा उसने डीईईओ मनीराम पर भी डोरे डाले, बताया जाता है कि उसके बरी होने की काफी बड़ी जमीन मनीराम ने ही तैयार की थी। पूरी तरह से क्लीनचिट् देने का काम पूर्व डीईओ और शिक्षा निदेशालय में संयुक्त आयुक्त अजीत सिंह सेवानिवृत्त होने से पहले कर गए। जाहिर है कि इसके लिए यतींद्र ने उन्हें अच्छा खासा नजराना दिया होगा। नूंह, फरीदाबाद मेंं जमकर लूट कमाई करने वाले भ्रष्टाचारी अजीत सिंह के लिए रिश्वत लेकर दूसरे भ्रष्टाचारी यतींद्र को क्लीनचिट् देना रोजमर्रा के काम की तरह रहा होगा। निदेशालय में ऊपर तक बैठे अधिकारियों की कृपा से यतींद्र सारे आरोपों से बरी कर दिया गया। कार्रवाई न होने का दूसरा कारण बताया जाता है कि यतींद्र को सत्ताधारी भाजपा के नेता-मंत्रियों का समर्थन प्राप्त है। बताया जा रहा है कि उसे क्लीनचिट् दिलाने में पूर्व शिक्षामंत्री सीमा त्रिखा ने अहम भूमिका निभाई थी।
बरी होने के बाद भ्रष्ट यतींद्र अपनी पदोन्नति की तैयारी में लगा है। बताया जा रहा है कि वह फाइल लेकर शिक्षकों के बीच यह कहता घूम रहा है कि तुम लोग तरसते रहोगे और मैं हाथोंहाथ अपना प्रमोशन लेटर टाइप करवा कर ले आऊंगा। उसका आत्मविश्वास बता रहा है कि उसने पदोन्नति देने वाले अधिकारी का मुंह नोटों से भर दिया है। जल्द ही वह ईमानदार, मेहनती और पदोन्नति की कतार में खड़े वरिष्ठ शिक्षकों के मुंह पर तमाचा जड़ते हुए प्रमोशन हासिल कर लेगा। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि न खाऊंगा न खाने दूंगा और भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस के झूठे नारे देने वाली भाजपा की डबल इंजन सरकारों में सरकारी धन हड़पने वाले, बच्चों का भविष्य बर्बाद करने वाले, भ्रष्टाचारी यतींद्र को निदेशालय स्तर की जांच में दोषी पाए जाने और एफआईआर दर्ज करने के आदेश के बावजूद क्लीनचिट् मिल गई। शासन में बैठे विधायक, मंत्री और सत्ताधारी नेता ही जब भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देंगे तो फिर प्रशासनिक अधिकारी भी मोटी रिश्वतें लेकर दोषी को अपराध मुक्ति का सर्टिफिकेट बेखौफ होकर क्यो नहीं बेचेंगे। क्योंकि उन्हें भी मालूम है कि जो भी जांच हो मोदी-सैनी सरकारों में यतींद्र शर्मा की तरह अंत में क्लीनचिट मिल ही जानी है।
भ्रष्टाचारी यतींद्र शर्मा को दोषमुक्त किए जाने से शहर के शिक्षकों में दुख और रोष व्याप्त है। इन लोगों के अनुसार सरकार का यह फैसला यतींद्र और उस जैसे भ्रष्ट कर्मचारियों का मनोबल बढ़ायेगा जिससे शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार का बोलबाला होगा। इसके विपरीत एश्योर्ड कॅरियर प्रोग्रेशन (एसीपी) के हकदार और ईमानदारी से काम करने वाले शिक्षकों का मनोबल गिरता है, जिससे सरकारी स्कूलों में पढ़ाई लिखाई प्रभावित होती है। भ्रष्टाचारियों की समर्थक सत्ता को इससे क्या लेना देना, वह तो पहले ही शिक्षा व्यवस्था का चौपट करने की कुत्सित चालें चलती रहती है। जो सरकार 832 स्कूल बंद कर रही हो उससे दूसरी उम्मीद करना भी बेमानी होगा।
वाशिंग मशीन भाजपा ने व्याभिचारी विकास बराला को बनाया एएजी भाजपा की वाशिंग मशीन में सिर्फ शिक्षक यतींद्र शर्मा ही पाक साफ होकर नहीं निकला है। पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला के अपहरण का प्रयास, यौन उत्पीडऩ आदि नीचता के जुर्म में जमानत पर बाहर घूम रहे बेटे विकास बराला को असिस्टेंट एडवोकेट जनरल केे पद गरिमामय पद से नवाजा है। विकास बराला ने 4 अगस्त 2017 की रात दोस्त आशीष कुमार के साथ हरियाणा के पूर्व नौकरशाह वीएस कुंडू की बेटी वर्णिका कुंडू की कार का पीछा कर रोका और उसकी कार में घुसने की कोशिश की। इस मामले में विकास के खिलाफ वर्णिका की शिकायत पर पीछा करने (भारतीय दंड संहिता की धारा 354डी), गलत तरीके से रोकने (341) और वर्णिका कुंडू का अपहरण करने की कोशिश (365) का केस दर्ज किया गया था। नौ अगस्त 2017 को विकास को गिरफ़्तार कर लिया गया था। 13 अगस्त को आरोप भी तक हो गए थे। उसे चंडीगढ़ की बुडैल जेल मे उसे रखा गया था। तब वह लॉ का छात्र था और पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश पर उसे परीक्षा देने की अनुमति मिली थी। क्योंकि पिता सुभाष बराला उस समय भाजपा के विधायक एवं प्रदेश अध्यक्ष थे तो महज छह चंद महीने बाद जनवरी 2018 में उसे जमानत मिल गई। तब से वो जमानत पर बाहर चल रहा है। खुद को पार्टी विद डिफरेंस कहने वाले भाजपाइयों ने सारी मान मर्यादाओं को ताक पर रखते हुए कथनी करनी का डिफरेंस दिखलाते हुए शोहदे विकास बराला को बड़ा सा पद दे दिया। सीएम सैनी ने सिर्फ इस तथ्य को ही नहीं कुचला कि विकास जमानत पर है बल्कि उसे असिस्टेंट एडवोकेट जनरल बनने योग्य करने मे मानक पूरे करने में भी फर्जीवाड़े किए गए। जानकारोंं के मुताबिक एएजे बनने के लिए कम से कम पांच साल स्टैंडिंग काउंसिल होना चाहिए, पांच लाख रुपये का आयकर रिटर्न, कम से कम 25 केसों में ऑर्डर में अभ्यर्थी में नाम होना चाहिए। सैनी सरकार ने सारी योग्यताओं का जुगाड़ भी कर दिया ताकि ऑनलाइन आवेदन और चयन को निष्पक्ष दिखाया जा सके। विकास की नियुक्ति से स्तब्ध वर्णिका कुंडू ने पत्रकारों से कहा कि न्यायपालिका में उनका विश्वास ”डगमगा रहा है’