फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बडख़ल झील बीते 11 वर्षों से भाजपा के लिए जनता को सुनहरे ख्वाब दिखा कर चुनाव जीतने और हरामखोर अधिकारियों के लिए नेताओं की मिलीभगत से लूट कमाई करने का बेहतरीन औजार बन कर रह गई है। पहले तो झील को भरने के नाम पर 102 करोड़ का भारी भरकम बजट बना कर खूब कमाई की गई, अब पर्यटकों की सैर और तफरीह के लिए किए जा रहे निर्माण में जमकर बंदरबांट हो रही है। कमीशनखोरी और लूट कमाई का आलम यह है कि ठेकेदार भी अपना सड़ा-गला, टूटा फूटा माल खपा कर स्टैंडर्ड सामान का पैसा वसूल रहा है। निर्माण इतना घटिया है कि आम आदमी को नजर आ रहा है लेकिन कमीशन खाने वाले निगम अधिकारियों की नजर में सब चंगा है।
बीते 11 साल में करोड़ों खर्च कर भाजपा सरकार बडख़ल झील को सीवर के तथाकथित शोधित पानी से भरवा पाई है। अब इस झील परिसर को पर्यटकों की सैरगाह बनाने के लिए रैंप, सीढिय़ां, प्लेटफार्म, बेंच आदि का निर्माण कराया जा रहा है। निगम अधिकारियों के अनुसार केवल इतने निर्माण का ठेका शिव शक्ति कंस्ट्रक्शन नाम कंपनी को 64 करोड़ में दिया गया है। बताया जा रहा है कि ठेकेदार सत्तापक्ष का करीबी है, इसलिए ही यह काम हथिया सका। जब सत्ता और कमीशनखोर अधिकारियों का हाथ हो तो फिर ठेकेदार मनमानी न करे, ऐसा कहां हो सकता है। तो ठेकेदार साहब ने झील पर बने पैदल पथ से लेकर सीढिय़ों, प्लेटफार्म हर जगह बहुत ही घटिया निर्माण सामग्री लगा डाली। अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए सीढ़ी, प्लेटफार्म रैंप आदि सब एक ही प्रकार के ग्रेनाइट पत्थर से बनाए जाने थे ताकि एकसार और भव्य रूप प्रदान किया जा सके।
पूर्व विधायक सीमा त्रिखा का चहेता बताए जाने वाले ठेकेदार ने सारी ड्राइंग और गुणवत्ता को ठेंगे पर रख कर रंग बिरंगे, कम-ज्यादा मोटाई वाले, बिना मैचिंग के पत्थर लगा डाले। यहां तक कि मैचिंग के लिए कुछ बेरंगे पत्थरों को रंग कर थोप दिया गया। हालात ये हैं कि अभी निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ है लेकिन कहीं कहीं ये पत्थर टूट चुके हैं तो कहीं उखड़ रहे हैं। जानकारों के अनुसार पर्यटन स्थल पर सबसे घटिया और सस्ता पत्थर लगाया जा रहा है। इतना ही नहीं घटिया पत्थर की कटिंग जिसकी कोई कीमत ही नहीं होती ठेकदार ने डिजायन बनाने के नाम पर वो सारा माल भी खपा दिया। भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार टेंडर में लिखे ढाई सौ रुपये वाले के स्थान पर पचास रुपये वर्गफुट का पत्थर लगाकर लूट कमाई की जा रही है।
ठेकेदार ने सिर्फ घटिया पत्थर ही नहीं लगाए, इन्हें लगाने में घटिया सीमेंट और मसाले लगाए गए हैं, इसी कारण जगह जगह पत्थर जमीन छोड़ रहे हैं, दो पत्थरों की बीच की दरारें भरने के लिए एपॉक्सी भी नहीं भरा गया है। नगर निगम के पूर्व एसडीओ ज्ञान प्रकाश वाधवा ने बताया कि घटिया निर्माण के कारण ठेकेदार कंपनी का एक करोड़ रुपया भुगतान रोक लिया गया है। इससे साबित होता है कि निर्माण कार्य घटिया है और मानक के अनुरूप नहीं हुआ है। आश्चर्य तो यह है कि एक करोड़ रुपया रोके जाने के बावजूद ठेकेदार धड़ल्ले से वही काम कर रहा है जबकि होना यह चाहिए था कि ठेकेदार को घटिया निर्माण हटाकर दोबारा मानक के अनुसार काम करना चाहिए था। अधिकारी बहाना बनाते हैं ठेकेदार पर पांच साल तक निर्माण की देखभाल और मरम्मत की जिम्मेदारी होगी, यदि इस दौरान टूट फूट होगी तो ठेकेदार उसे ठीक कराएगा। पांच साल की यह जिम्मेदारी तो तब शुरू होगी जब ठेकेदार निर्माण पूरा करने के बाद नगर निगम को हैंडओवर कर देगा। जब हैंडओवर करने से पहले ही पत्थर टूट और उखड़ रहे हैं तो फिर वो पांच साल कैसे चलेंगे समझा जा सकता है।
सूत्र बताते हैं कि यह एक करोड़ सिर्फ दिखावे के लिए काटे गए हैं दरअसल, निगम के खाऊ अधिकारियों को नजर आ गया है कि ठेकेदार कमीशन देने के बावजूद बहुत मोटी कमाई कर रहा है तो अपनी हिस्सापत्ती बढ़ाने के लिए यह नाटक किया गया है। ठेकेदार कुछ अतिरिक्त चुग्गा डालेगा और सबकुछ ठीक हो जाएगा। सूत्र यह भी बता रहे हैं कि विधायक अदलखा ने भी झील के निर्माण में घटिया सामग्री लगने की चिंता जताने का पाखंड किया था, ठेकेदार ने मुंह में हड्डी डाल दी तो उन्हें भी सब चंगा दिख रहा है। बडख़ल झील पर्यटकों को लुभाएगी या नहीं ये तो उसके चालू होने पर पता चलेगा लेकिन उसने नेता, अधिकारियों की चांदी कर दी है।
पानी बदबू देने लगा स्थानीय लोगों की मानें तो बडख़ल झील में भर रहे पानी में बदबू आने लगी है। घटिया शोधन प्रक्रिया के चलते झील में डाला जा रहा पानी नाममात्र को ही शोधित है, जिसका सडऩा स्वाभाविक था यह सच्चाई मज़दूर मोर्चा ने बरसों पहले ही अपनी रिपोर्ट में प्रकाशित कर दी थी। यह भी लिख दिया था कि बदबू के कारण आपके होटल-मोटल रेस्टोरेंट आदि जो हैं उनमें भी ग्राहकों का आना मुश्किल हो जाएगा। जानकार कहते हैं कि एसटीपी से जो पानी शोधित होकर आ रहा है उसका बीओडी (बॉयोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) दस पीपीएम (पार्ट पर मिलियन) से भी ज्यादा है। दस पीपीएम से ज्यादा बीओडी वाला पानी किसी भी इस्तेमाल के योग्य नहीं होता।
यदि एसटीपी में फिल्टरेशन मानक अनुसार नहीं हुआ और पानी में बैक्टीरिया व अन्य सूक्ष्म जीवाणु रह गए तो कुछ समय बाद इनकी संख्या बढऩे के कारण बदबू आने लगेगी। संभवत: यही बडख़ल के पानी के साथ हो रहा है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि जिस तरह सीएम नायब सैनी ने यमुना का पानी साफ बताने के लिए आचमन करने के साथ मुुंह में लेकर कुल्ली की थी उसी तरह बडख़ल झील का पानी पीकर दिखाएं, अन्यथा माना जाएगा कि केवल सत्ता की जिद पूरी करने के लिए जनता की गाढ़ी कमाई का करीब दो सौ करोड़ रुपया बर्बाद कर दिया गया।