गुडग़ांव (मज़दूर मोर्चा) सेक्टर 9 स्थित ईएसआई कॉर्पोरेशन द्वारा संचालित 150 बिस्तर वाला अस्पताल, स्थानीय अमीर लोगों की आंख की किरकिरी बना हुआ है। अस्पताल को यहां से हटवाने की ताकत तो उनमें नहीं है परन्तु अस्पताल के लिए परेशानी पैदा करने के लिए इन लोगों ने इसका वर्षों पुराना पानी का कनेक्शन जुगाड़बाज़ी से कटवा दिया। पानी की आपूर्ति नगर निगम गुडग़ांव द्वारा की जाती थी। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे इन निगमों में वैध काम भले ही न हो पाए परन्तु अवैध काम कराने में कोई दिक्कत नहीं आती।
हूडा द्वारा अलॉट किए गए पांच एकड़ के भू-खंड पर करीब 15 वर्ष पूर्व बने इस अस्पताल को हूडा ने ही 50 एमएम का कॉमर्शियल पानी का कनेक्शन दिया था। इसके एवज में अस्पताल द्वारा नियमित तौर पर अच्छा-खासा बिल पहले हूडा को और बाद में नगर निगम को अदा किया जाता रहा है। लेकिन बीते सप्ताह सेक्टर वासियों ने तिकड़मबाज़ी लगा कर इस कनेक्शन को कटवा दिया। उनका तर्क यह था कि अस्पताल को पानी दिए जाने की वजह से उन्हें पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा। कनेक्शन काटने के लिए आए एसडीओ ने अस्पताल की चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर अनिता मिढ्ढा से बहुत अधिक बदतमीजी करते हुए उन पर पानी चोरी का आरोप लगाते हुए कनेक्शन को भी अवैध बताया। उसने यह भी पूछा कि और कितने कनेक्शन कहां-कहां से जोड़ रखे हैं? सेक्टर वासियों से घूस खाकर आए एसडीओ ने डॉक्टर अनिता मिढ्ढा की एक न सुनी और कनेक्शन काट गया।
विदित है कि अस्पताल में करीब 130 मरीज दाखिल रहते हैं तथा 1200 के करीब मरीज़ ओपीडी में आते हैं। इसके अलावा 300 स्टा$फ भी अस्पताल में कार्यरत रहता है। उस बिके हुए एसडीओ तथा उसके ऊपर बैठे अफसरों ने यह भी समझने की कोशिश नहीं की कि चिकित्सा सेवा अति आवश्यक सेवा है और अस्पताल के आधारभूत ढांचे को नुकसान पहुुंचाना संज्ञेय अपराध है। बावजूद इसके कनेक्शन काट दिया गया, यह भी नहीं सोचा कि पानी कटने से इन सब लोगों पर गर्मी के इस मौसम में क्या प्रभाव पड़ेगा? चिकित्सा अधीक्षक ने इस बाबत उपायुक्त से बात की तो उन्होंने कनेक्शन चालू करवाने का आश्वासन तो दिया लेकिन पुराना कनेक्शन बहाल करने की बजाय एक छोटा सा 10 एमएम का घरेलू कनेक्शन और वह भी उस दिशा से दिया गया जहां से पानी नाम मात्र को आता है। पुराना कनेक्शन बहाल करने के लिए, उपायुक्त के आदेश के बावजूद सम्बन्धित फाइल नगर निगम व महानगर विकास प्राधिकरण के बीच में झूले खा रही है।
मज़दूरों के इस अस्पताल की जगह यदि यहां सरकारी सिविल अस्पताल होता अथवा किसी धन्नासेठ का बड़ा व्यापारिक अस्पताल होता तो इन सेक्टर वासियों की चूंं तक करने की हिम्मत न होती और तो और वह बेहूदा एसडीओ अस्पताल की ओर झांकने की हिम्मत भी नहीं कर सकता था। दरअसल ट्रेड यूनियन आंदोलन कमजोर होने के चलते ये सब लोग ऐसा दुस्साहसिक कदम उठा पाए। यदि शहर की तमाम ट्रेड यूनियनें इस मसले का तुरन्त संज्ञान लेते हुए धरने प्रदर्शन पर उतर आते तो यह कांड न हुआ होता।