फऱीदबाद (मज़दूर मोर्चा) भाजपा की मनोहरलाल खट्टर सरकार में जिस केंद्रीय राज्यमंत्री कृष्णपाल गूजर का इतना डंका बजता था कि प्रदेश के, खासकर फरीदाबाद के बारे में, फैसला उनकी बाध्यकारी सलाह के बिना नहीं लिया जाता था, उसी केंद्रीय मंत्री को नायब सरकार मेंं कभी उनके चेले रहे विपुल गोयल और राजेश नागर के आगे मंच पर जगह तलाशना भी भारी पड़ रहा है। हालांकि वह अभी भी अपनी साख बनाए रखने के लिए सतीश फागना जैसे चेलों को मोहरा बनाकर गोयल-नागर से छद्म जंग लडऩे का असफल प्रयास कर रहे हैं।
एनआईटी विधानसभा से पहली बार विधायक बने सतीश फागना ने चुनाव बीतने के छह महीने बाद बीते रविवार को डबुआ मंडी में जन आभार रैली का आयोजन किया था। भाजपा के करीबियों के अनुसार चुनाव के छह महीने बाद आभार रैली का आयोजन तो एक बहाना था, दरअसल इसके नाम पर शहर के उद्यमियों से मोटी उगाही की जानी थी क्योंकि फागना को टिकट पाने से लेकर जीत सुनिश्चित करने के लिए बारह-तेरह करोड़ रुपये खर्च करने पड़े थे। बताया जाता है कि केवल टिकट पाने के लिए फागना ने रिश्ते के मामा कृष्णपाल गूजर को करीब दस करोड़ रुपये कीमत की एक कीला जमीन दान करनी पड़ी थी। फागना ने यह रैली भी मंत्री गूजर के इशारे पर ही करवाई। गूजर इस रैली के बहाने एनआईटी की जनता को अपने लिए जोडऩा चाह रहे थे, क्योंकि केंद्रीय मंत्री बनने के बाद इस इलाके में उनके न के बराबर कार्यक्रम हुए थे।
मनोहर लाख खट्टर राज में बेताज बादशाह वाली मौज काटने वाले गूजर ने इस रैली में अपनी चलाने का भरसक प्रयास किया। सबसे पहले उन्होंने फागना के बैनर पोस्टरों से कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल और मंत्री राजेश नागर के नाम और फोटो हटवा दिए। भाजपा सूत्रों के अनुसार इन दोनों मंत्रियों को अनमने मन से निमंत्रण भेजा गया था गंभीरता से नहीं। यही कारण है कि मंच पर सम्मानित किए जाने वालों में इन दोनों का नाम भी नहीं रखा गया था। कार्यक्रम के अनुसार सतीश फागना सीएम नायब सैनी को पगड़ी पहनाते और कोई वरिष्ठ भाजपाई केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर को। कार्यक्रम में तब अव्यवस्था का माहौल हो गया जब सीएम के साथ दोनों मंत्री भी पहुंच गए, अब मजबूरी में उनके लिए भी मंच पर बैठने की व्यवस्था करनी पड़ी। हास्यास्पद स्थिति तो तब उत्पन्न हो गई जब केंद्रीय मंत्री का नाम काट कर विपुल गोयल को पगड़ी पहनाने के लिए एनाउंस हुआ।
गोयल को अच्छी तरह मालूम था यह पगड़ी उनके लिए नहीं है तो उन्होंने नहीं पहनी और गूजर को पहना दी मानो संदेश दे रहे हों कि मैं दूसरों का हक नहीं छीनता खुद अपने दम पर हासिल करने में विश्वास रखता हूं। इस पूरे प्रकरण में गूजर की जो भद पिटनी थी सो पिटी, उससे ज्यादा बेइज्जती सीएम सैनी द्वारा की गई पत्रकार वार्ता में हुई। खट्टर राज में तो सीएम और केंद्रीय मंत्री ही कैमरे के सामने होते थे बाकी सब पीछे, इस बार उल्टा हुआ सीएम ने अपने दोनों मंत्री विपुल और राजेश को साथ लिया। गूजर को जैसे ही पता चला कि प्रेसवार्ता हो रही है तो वह सीएम के बगल में खड़े होने के लिए तेजी से लपके लेकिन नायब सैनी को दोनों ओर से अपने मंत्रियों से घिरा देखा तो इज्जत बचाते हुए चुपचाप पीछे से ही खिसक लिए।
अधिकारियों के साथ बैठक में उन्हें प्रोटोकॉल के तहत सीएम नायब सैनी के बगल में बैठने का सम्मान तो मिला लेकिन वह मूकदर्शकों की तरह ही शामिल हुए क्योंकि अधिकतर अधिकारियों से सीएम के बाद दोनों मंत्री ही सवाल-जवाब करते रहे। भाजपा मामलों के जानकारों के अनुसार तीसरी बार गूजर को केंद्र में राज्यमंत्री का दर्जा दे तो दिया गया है लेकिन उनका रुतबा कम हो गया है। जातिवादी राजनीति करने मेेें माहिर भाजपा को उनके विकल्प के रूप में राजेश नागर जैसे दूसरे गूजर नेता नजर आने लगे हैं।