फऱीदबाद (मज़़दूर मोर्चा) एंटी करप्शन ब्यूरो ने दो सौ करोड़ घोटाले में बीते दिनों नगर निगम के इंस्पेक्टर नवीन रत्रा को गिरफ्तार किया है। उसकी गिरफ्तारी सात करोड़ रुपये के फर्जीवाड़े में 2025 में दर्ज केस में की गई। रत्रा की गिरफ्तारी एसीबी की नाटकबाजी ही होकर न रह जाए, क्योंकि जिस तरह दो सौ करोड़ के घोटाले की हिस्सेबांट कर छोटे छोटे टुकड़ों में आईएएस अधिकारियों और नेताओं को बचाने कार्रवाई की जा रही है, उससे तो यही लगता है कि अंत में सारे भ्रष्टाचारी बचा लिए जाएंगे। एसीबी के अनुसार नगर निगम की ओर से वर्ष 2018 में विकास कार्यों के लिए करीब 40 लाख रुपये के आठ वर्क ऑर्डर जारी किए गए थे। बाद में इनमें बदलाव कर करीब 18 गुणा बढ़ा कर लागत सात करोड़ रुपये से ज्यादा कर दी गई थी। इस मामले में नगर निगम के डेढ़ दर्जन से अधिक अधिकारियों के साथ तत्कालीन बल्लभगढ़ विधायक के चहेते ठेकेदार सतबीरा का नाम आया था। यह रकम सतबीरा को लाभ पहुंचाने के लिए ही बढ़ाई गई थी।
दो सौ करोड़ के घोटाले का खुलासा तो 2019 में ही हो गया था और नगर निगम चीफ इंजीनियर डीआर भास्कर के साथ निचले दर्जे के इक्का दुक्का कर्मचारियों को गिरफ्तार कर मामले को ठंडे बस्ते में डालने का प्रयास किया गया था। सूत्रों के अनुसार जांच में आईएएस सोनल गोयल, एम शाईन, अनीता यादव के साथ ही बल्लभगढ़ विधायक मूलचंद का भी नाम आया था। जांच में सतबीरा ने कुबूल किया था कि उसने मूलचंद को चालीस लाख रुपये वाली लग्जरी कार गिफ्ट की थी साथ ही विधायक के परिवार को पर्यटन पर भेजने का हवाई जहाज का टिकट सहित अन्य खर्च भी दिया था। जाहिर है कि यह सारा खर्च सतबीरा ने अपनी जेब से नहीं किया था, इसके एवज में उसके लिए जारी किए गए वर्कऑर्डर की कीमत 18 से 20 गुना तक बढ़ाई गई थी।
वर्क ऑर्डर नंबर 1433 के तहत वार्ड नंबर-38 में इंटरलॉकिंग टाइल्स लगाने का काम 4.92 लाख रुपए में होना था, लेकिन इसकी राशि बढ़ाकर 93 लाख 82 हजार 362 रुपए कर दी गई। इसी तरह वर्क ऑर्डर नंबर 1442 के तहत मोहना रोड पर यादव डेयरी से साईं अस्पताल तक वार्ड नंबर-36 में इंटरलॉकिंग टाइल लगाने के लिए 5.83 लाख रुपए का वर्क ऑर्डर था, जिसे बढ़ाकर करीब 98 लाख 95 हजार 837 रुपए कर दिया गया। नवीन रत्रा उस समय नगर निगम में क्लर्क था, और एसीबी जांच में वर्क ऑर्डर में धनराशि बढ़ाने में उसका हाथ सामने आया है। समझने वाली बात है कि एक क्लर्क की इतनी औकात नहीं है कि वह पांच लाख के वर्क ऑर्डर को बढ़ा कर 99 लाख रुपये कर दे, जाहिर है कि ऊपर बैठे अधिकारियों ने उससे ऐसा कराया होगा। ऊपर बैठे अधिकारी भी इस तरह के आदेश देकर अपनी गर्दन नहीं फंसाते जब तक उन्हें सत्ता पक्ष के नेता, विधायक, मंत्रियों का संरक्षण न हासिल हो। इन्हीं नेताओं और आईएएस अफसरों को बचाने के लिए दो सौ करोड़ के घोटाले को टुकड़ों में बांटने का खेल किया जा रहा है।
जब भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस का बाजा बजाने वाली भाजपा सरकार ही भ्रष्टाचारियों को बचाने में जुटी हो तो एसीबी को भी मंशा के अनुरूप जांच की दिशा तय करनी पड़ती है। नवीन रत्रा को गिरफ्तार तो कर लिया गया है लेकिन उसे दोषी ठहरा पाना आसान नहीं होगा। कारण, यह है कि दो सौ करोड़ का घोटाला होने के समय वह क्लर्क था और वह भी जांच में फंसा था। अगस्त 2025 में एसीबी ने सात करोड़ के घोटाले में उसे फिर से आरोपी बनाया, लेकिन वह भी अन्य आरोपियों के साथ न्यायलय पहुंच गया। न्यायालय ने उसे कोई राहत नहीं दी लेकिन एसीबी ने उसे गिरफ्तार नहीं किया। इतना ही नहीं जांच में फंसा होने के बावजूद नगर निगम में उसे इंस्पेक्टर पद तक पदोन्नति उसी शाखा में दे दी गई। यह सब तब हुआ जब उसके खिलाफ 2022, 2023 और 2025 में भ्रष्टाचार के कुल पांच केस दर्ज किए गए। माना जा रहा है कि उसे यह ईनाम इसलिए दिया गया ताकि वह पद का दुरुपयोग करके सुबूतों को नष्ट करे या बदलाव कर सके।
जानकार कहते हैं कि उसकी गिरफ्तारी भी सत्ता के इशारे पर ही टाली जाती रही क्योंकि सारा घोटाला मूलचंद के प्रिय सतबीरा से जुड़ा है, जांच की आंच सतबीरा से मूलचंद तक पहुंच सकती है। नवीन रत्रा को उसी शाखा में बनाए रखने से संदेह पैदा होता है कि उसने सबको बचाने के लिए सारा काम ठीक से कर लिया होगा। अब करीब आठ महीने बाद उसकी गिरफ्तारी की गई है। गिरफ्तारी तो हो गई लेकिन एसीबी उसे अदालत में दोषी ठहरा पाएगी कहना मुश्किल है।