फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सेक्टर 88 स्थित सैनिक विहार असल में एनआईटी स्थित दि फरीदाबाद एक्स सैनिक एंड कर्मचारी को ऑपरेटिव हाउस बिल्डिंग सोसायटी लिमिटेड का ही विस्तार है। इसकी शुरूआत सन 1997 में उस वक्त हुई थी जब स्वर्गीय डॉक्टर ओपी भल्ला इसके चेयरमैन हुआ करते थे। उस वक्त सैनिक विहार कॉलोनी के पास मात्र लगभग 50 एकड़ ज़मीन थी जबकि कॉलोनी बनाने का लाइसेंस प्राप्त करने के लिए 101 एकड़ ज़मीन का होना जरूरी था। बाद में यह शर्त काफी नर्म कर दी गई। डॉक्टर भल्ला के बाद सोसायटी पर कब्जा करने वालों ने सोसायटी को लूट का बाजार बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। इस लूट के लिए समय-समय पर सत्तारूढ़ विधायकों एवं मंत्रियों का पूरा सहयोग प्राप्त किया गया, जाहिर है इसके लिए उन्होंने भी लूट कमाई से खुल कर अपने हाथ रंगे और आज भी रंग रहे हैं।
लूट कमाई के चक्कर में सोसायटी पदाधिकारी लगातार इसकी सदस्य संख्या बढ़ाते चले गए। परिणाम स्वरूप सदस्यों को प्लॉट आवंटित करने के बजाय फ्लैटों के फ्लोर आवंटित करने की नौबत आ गई। अब फ्लैट कौन बनाए, इसके लिए करोड़ों रुपए कहां से आएं? इसके लिए सोसायटी पदाधिकारियों ने टीडीआई/फैंटाबुलस नामक बिल्डर कम्पनी के साथ मिल कर एक षड्यंत्रकारी समझौता किया था। लेकिन षड्यंत्रकारियों की तमाम कोशिशों के बावजूद तत्कालीन रजिस्ट्रार कॉपरेटिव सोसायटीज़, सीआर राणा आईएसएस ने 12 आपत्तियां लगा कर षड्यंत्र को ठंडे बस्ते में डाल दिया। परन्तु उनके जाते ही षड्यंत्रकारी सक्रिय हुए और सफलता प्राप्त कर ली। इसका पूरा विवरण ‘मज़दूर मोर्चा के 5-11 सितंबर 2022 के अंक में ‘खट्टर सरकार की छत्रछाया में सैनिक विहार सोसायटी की खुली लूट शीर्षक से प्रकाशित किया गया था। जो पुन: प्रकाशित की जा रही है।
षड्यंत्रकारी समझौते के अनुसार बिल्डर को 702 फ्लैट बनाने थे। इसके लिए तमाम लाइसेंसी प्रक्रियाएं पूरी करने के साथ-साथ अंदरुनी व बाहरी विकास कार्य करना, बिजली का 33 केवीए का सबस्टेशन बनाना, वाटर लाइन, सीवर लाइन व एसटीपी का निर्माण आदि उसके जिम्मे था। इसके बदले उसे सोसायटी द्वारा 23 एकड़ जमीन तथा 82 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाना था। यह धनराशि कुछ किस्तों मेें सोसायटी ने उसे दे दी। बिल्डर ने फ्लैट तो बना दिए लेकिन न तो बिजली का सबस्टेशन बनाया, न ही सीवर तथा पेयजल आपूर्ति की शर्तें पूरी करीं और न ही एसटीपी चालू किया। कहने को एसटीपी बना तो दिया है परन्तु जब तक वह चालू न हो जाए तो कैसे माना जा सकता है कि वह सही बना है? 34 फ़्लैटों के आगे पार्किंग की जगह भी नहीं छोड़ी।
इन तमाम खामियों के बावजूद 8 दिसंबर 2023 को तत्कालीन असिस्टेंट रजिस्ट्रार कोऑपरेटिव सोसायटी (एआरसीएस) देवेंद्र बेनीवाल तथा प्रशासक मंडल ने धुन्ना की मिलीभगत से आम सभा के नाम पर अपने चहेते सदस्यों को फोन कर बुलाया। बाकी सभी सदस्यों को एजेंडे तक की जानकारी नहीं दी गई। इस आम सभा में यह कह कर प्रस्ताव पारित कर दिया गया कि बिल्डर ने कार्य पूर्ण कर दिया है इसलिए 23 एकड़ जमीन उसे ट्रांसफर कर दी जाए। प्रस्ताव में बिल्डर को जनरल पावर ऑफ अटार्नी (जीपीए) दे दी गई।
आम सभा के इस प्रस्ताव के अनुसार देवेंद्र बेनीवाल ने लैंड ट्रांसफर का एक प्रस्ताव बना कर डीआरसीएस गुडग़ांव को मंजूरी के लिए भेजा। इसकी जानकारी जब कुछ जागरूक सदस्यों को मिली तो डिप्टी रजिस्ट्रार कोऑपरेटिव सोसायटी (डीआरसीएस) गुडग़ांव के यहां उन्होंने एक अपील दायर की। सुनवाई नहीं होने पर सदस्य कमिश्नर एवं अतिरिक्त मुख्य सचिव डा. राजा शेखर वुंडरू की कोर्ट में गए। ढाई-तीन महीने तक सुनवाई के बाद 6 जून 2024 को वुंडरू द्वारा पारित आदेश मेेें कहा गया कि समझौते में लिखी गई तमाम शर्तें पूरी करने के बाद ही बिल्डर को 23 एकड़ ज़मीन बेचने के लिए प्राधिकृत किया जा सकता है। गजब तो तब हो गया जब सोसायटी के मैनेजर ने धुन्ना एवं एसआरसीए व डीआरसीएस के इशारों पर नाचते हुए लिख कर दे दिया कि बिल्डर ने तमाम शर्तें पूरी कर दी हैं, अत: उसे प्राधिकृत किया जाता है, साथ ही बिल्डर के पक्ष में डिक्लेरेशन डीड भी बना कर दे दी। जिसके आधार पर विभागीय अधिकारियों ने जीपीए जारी कर बिल्डर को जमीन बेचने के लिए अधिकृत कर दिया। बिल्डर ने कई सौ करोड़ की जमीन को बेच डाला। जबकि मौके पर आज भी उक्त काम बिल्डर द्वारा नहीं किए गए हैं। फ्लैटों में बसे लोग बराबर की पुरी सोसायटी से बिजली लेकर काम चला रहे हैं।
अब यहां समझने वाली असल बात यह है कि बीते करीब चार वर्षों से सोसायटी का चुनाव नहीं होने दिया जा रहा। इसे किसी न किसी बहाने से लटका कर रखा जा रहा है। चुनाव न होने की स्थिति में सोसायटी के डीआरसीएस व एआरसीएस से मिल कर राकेश धुन्ना नामक एक सदस्य,पूर्व डायरेक्टर ने एक प्रकार से सोसायटी पर अवैध कब्जा कर रखा है। सोसायटी के नियमानुसार जब चयनित पदाधिकारी न हों तो कॉपरेटिव सोसायटी का एआर अपने महकमे के किसी भी कर्मचारी को प्रशासक नियुक्त कर देता है। इसी तरह के नियुक्त प्रशासक अपने एआर व धुन्ना के इशारों पर कठपुतली की तरह नाचते रहते हैं। इसी कवायद के तहत टीडीआई बिल्डर से षड्यंत्रकारी समझौता किया गया। इसी के तहत बिल्डर को 23 एकड़ जमीन के लिए अवैध रूप से प्राधिकृत किया गया। इसी के तहत उसे तमाम शर्तों की उल्लंघना करने की छूट दी गई। जाहिर है कि यह सारा षड्यंत्र कोऑॅपरेटिव महकमे के अफसरान तथा धुन्ना अपने राजनैतिक आकाओं की मिलीभगत के बिना तो नहीं ही कर सकते, और भुगत रहे हैं सोसायटी के साधारण सदस्य।
लूट के इस कारोबार में पहले दस साल तक सीमा त्रिखा ने किस तरह से कितना माल डकारा और अब किस तरह से नया विधायक अदलखा इस धंधे मेें जुटा हुआ है, इसकी विस्तृत जानकारी हासिल करने के प्रयास जारी हैं।