‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’

‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’
February 04 00:15 2025

पंकज श्रीवास्तव
“भारत की लाखों पीडि़त जनता सूखे गले से जिस चीज़ के लिए बार-बार गुहार लगा रही है, वह है रोटी। वे हमसे रोटी मांगते हैं और हम उन्हें पत्थर पकड़ा देते हैं। भूख से मरती जनता को धर्म का उपदेश देना, उसका अपमान है। भूखे व्यक्ति को तत्व-मीमांसा की सीख देना उसका अपमान है।”

सत्ता संरक्षण में मचाये जा रहे ‘हिंदुत्व के देशव्यापी कोलाहल के बीच इन चार पंक्तियों के कारण किसी को भी ‘धर्मद्रोही घोषित किया जा सकता है। ‘सनातन को अपमानित करने और ‘हिंदू धर्म का दुश्मन बताते हुए क़ानूनी कार्रवाई भी हो सकती है। लेकिन यह उद्धरण योद्धा संन्यासी स्वामी विवेकानंद का है जिन्हें आधुनिक विश्व को हिंदू धर्म के शुभ पक्षों से परिचित कराने का श्रेय दिया जाता है।

शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में 20 सितंबर को 1893 को अपना चौथा भाषण देते हुए स्वामी विवेकानंद ने जि़दगी की तकलीफ़ों से ध्यान भटकाने के लिए धर्म की आड़ लेने वाले को कड़ी फटकार लगाते हुए जो कहा था वह ‘धर्म नहीं है भारत की सबसे बड़ी ज़रूरत शीर्षक से उपलब्ध है। उन्नीसवीं सदी के उस अंतिम दशक में न आस्था की कमी थी और न धर्म का ज़ोर ही कम था लेकिन किसी ने विवेकानंद पर इस भाषण के लिए कोई लांछन नहीं लगाया। उल्टा भारत लौटने पर ‘महान हिंदू संत के रूप में उनको तरह-तरह से सम्मानित किया गया था।

बहरहाल, लगभग 131 साल बाद ‘हिंदू राष्ट्र का दम भरने वाले ऐसी कोई गुंजाइश छोडऩे को तैयार नहीं हैं। धर्म के परिसर से विवेक को निष्कासित करके उसे घृणा और हिंसा का पर्याय बना दिया गया है। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद संबित पात्रा का कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े पर किया गया ताज़ा हमला इसी का सबूत है। उन्होंने मध्यप्रदेश के महू में ‘जय बापू, जय भीम, जय संविधान रैली में दिये गये कांग्रेस अध्यक्ष के भाषण को सनातन के खिलाफ़ बताते हुए माफ़ी मांगने की मांग की है जबकि उसमें एक तरह से स्वामी विवेकानंद के भाषण को ही दोहराया गया था।

डॉ.आंबेडकर की जन्मस्थली महू में 27 जनवरी को आयोजित रैली में मल्लिकार्जुन खडग़े ने कहा, “अरे भाई गंगा में डुबकी लगाने से गऱीबी दूर होती है क्या? क्या आपको पेट में खाना मिलता है? मैं किसी की आस्था को कोई ठेस नहीं पहुँचाना चाहता। अगर किसी को दु:ख हुआ तो मैं माफ़ी चाहता हूं। लेकिन आप बताइए कि जब बच्चा भूखा मर रहा है, बच्चा स्कूल में नहीं जा रहा है, मजदूरों को मजदूरी नहीं मिल रही है। जब ये है, तो ये लोग जाकर हज़ारों रुपये खर्च करके कम्पटीशन में डुबकियां मार रहें हैं। कम्पटीशन में एक डुबकी मारता है, फिर दूसरा, और जब तक टीवी पर अच्छा नहीं आता, तब तक डुबकी मारते रहते हैं। ऐसे लोगों से देश की भलाई होने वाली नहीं है। हमारी आस्था भगवान में है, कर सकते हैं। हर एक को आज़ादी है। आप रोज़ पूजा करिए। घर में हर आदमी और हर महिला पूजा कर के बाहर निकलती है। हमें कोई एतराज़ नहीं है। हमको एतराज़ है- गऱीबों का जो शोषण हो रहा है, धर्म के नाम पर, उसके खिलाफ़ हमको लडऩा है। साफ़ है कि मल्लिकार्जुन खडग़े धार्मिक लोगों की आस्था पर चोट नहीं कर रहे हैं जो परलोक सुधारने या मोक्ष के लिए कुम्भ में डुबकी लगाने जा रहे हैं, उनका निशाना वे सत्ताधारी हैं जो देश में फैली भीषण गऱीबी और बेकारी पर पर्दा डालने के लिए महाकुम्भ के ‘इवेंट का इस्तेमाल कर रहे हैं और अपनी तमाम असफलताओं पर उठ रहे सवालों को ‘आस्था की डुबकी के पी.आर में ‘डुबो देना चाहते हैं। उनके लिए गंगा में आस्था की डुबकी लगाने से ज़्यादा टीवी के पर्दे पर ‘स्नान करते दिखना है।

स्वामी विवेकानंद ने इसे ही जनता का अपमान बताया था। तब किसी ने ये नहीं कहा था कि विवेकानंद दूसरे धर्म के बारे में सवाल क्यों नहीं उठाते? पर संबित पात्रा ने चैलेंज किया है कि “क्या खडग़े जी कह सकते हैं कि हज में जाने से क्या हो जाएगा? सनातन के खिलाफ़ उनके बोल शर्मनाक हैं। इस बयान के लिए कांग्रेस पार्टी को माफ़ी मांगनी चाहिए।”

संबित पात्रा शायद भूल गये हैं कि भारत के महान संत-महात्माओं ने ऐसे तमाम सवाल उठाये हैं। संत रैदास कहते हैं कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा। उनके लिए ईमानदारी से अपना काम करने वालों के लिए गंगा स्नान की ज़रूरत नहीं है। वहीं संत कबीर चेताते हैं, ‘न्हाये धोये क्या हुवा,मन का मैल न जाये/मीन (मछली) सदा जल में रहे, धोये बास न जाये। कबीरदास का एक प्रसिद्ध निर्गुण है- ‘चली कुल बोरिनी गंगा नहाय! इसमें वे कहते हैं, ‘गंगा नहाइन जमुना नहाइन, नौ मन मैलहि लिहिन चढ़ाय/ पांच पचीस के धक्का खाइन, घरहु की पूंजी आई गंवाय/ कहैं कबीर हेत करु गुरु से, नहीं तोर मुक्ती जाइ नसाय/”

उधर, गुरु नानक से जुड़ा प्रसिद्ध वाक्य़ा है कि वे हरिद्वार में गंगा में खड़े होकर सूर्य को जल न देकर पंजाब की दिशा में पानी उलीचने लगे। पूछने पर जवाब दिया कि वे अपने खेतों को सींच रहे हैं। इस पर जब पुरोहित हंसे तो उन्होंने सवाल किया कि अगर आपका चढ़ाया जल सूर्य लोक पहुंच सकता है तो पंजाब के हमारे खेतों तक क्यों नहीं पहुंच सकता?

ज़ाहिर है, धर्म के मार्ग में विवेक को छोडऩा अनिवार्य नहीं है। ये सभी संत-महात्मा ईश्वर पर विश्वास करते थे लेकिन इसके लिए पूजा-पाठ या गंगा स्नान करने की जगह मन का मैल दूर करने, सदाचरण और सद्भावना की सीख देते थे। क्या संबित पात्रा या बीजेपी नेता उन्हें भी चुनौती देते कि ‘पहले किसी और धर्म पर सवाल उठाओ, यह हिंदू धर्म का अपमान है!
कुम्भ में गंगा स्नान करके आस्थावान ‘मोक्ष यानी आवागमन के चक्र से मुक्ति चाहते हैं। यानी इस आयोजन का रिश्ता लोक से नहीं परलोक से है। जबकि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी ‘लोक की व्यवस्था करना है। लोक के संकटों को दूर करना उनका ‘धर्म है। इसीलिए इस व्यवस्था को ‘लोकतंत्र कहा गया है न कि ‘पर-लोकतंत्र। राजनेता भी अपनी आस्था के तहत गंगा स्नान करें, इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है, लेकिन अगर लोकतंत्र की कमान संभालने वाले नेता लोक-व्यवस्था की बदहाली के सवालों के जवाब में ‘परलोक की पुडिय़ा बांटेंगे तो इसे धर्म नहीं अधर्म ही कहा जाएगा। विवेकानंद की नजऱ में यह जनता का अपमान है। देश के सबसे गऱीब राज्यों में शुमार उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार जिस तरह से महाकुम्भ की ब्रांडिंग से अपना चेहरा चमका रही है, वह नाकामी पर पर्दा डालने की कोशिश ही है।
संबित पात्रा सरीखे बीजेपी के तमाम नेता जो ‘हिंदू बनाम अन्य के खेल से अपनी सत्ता मज़बूत करना चाहते हैं उन्हें विश्व धर्म संसद में दिया गया विवेकानंद का अंतिम भाषण ज़रूर पढऩा चाहिए। 27 सितंबर 1893 को सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “पवित्रता, शुद्धता और उदारता, दुनिया के किसी एक धर्म की मिल्कियत नहीं हैं। सभी धर्मों ने सर्वश्रेष्ठ गुणों वाले महान पुरुषों और महिलाओं को जन्म दिया है।

यह बात साबित होने के बाद भी अगर कोई व्यक्ति सिर्फ अपने धर्म के आगे बढऩे और बाकी धर्मों के नष्ट होने का सपना देखता है, तो मुझे उस पर दिल की गहराइयों से तरस आता है। ऐसे लोगों को मैं बताना चाहूंगा कि तमाम विरोधों के बावजूद बहुत जल्द हर धर्म के बैनर पर लिखा होगा ‘युद्ध नहीं, सहयोग!, ‘विनाश नहीं, मेल-मिलाप!, ‘आपसी कलह नहीं, शांति और सद्भावना!

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Mazdoor Morcha
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