मोहम्मद जाहिद इलाहाबाद में आयोजित कुंभ में अखाड़े और नागा साधुओं की चर्चा है। मगर आप जानते हैं कि अखाड़े और नागा साधु कौन होते हैं? “नागा” शब्द को सांप की एक प्रजाति से मिलता जुलता शब्द समझकर उससे संबंधित ही समझ लिया जाता है, मगर ऐसा नहीं है। संस्कृत में “नागा” शब्द का अर्थ होता है “पर्वत” या पहाड़, अर्थात जो साधु-संत कैलाश पर्वत पर गुप्त रूप से तपस्या करते हैं वह नागा साधु कहलाए जाते हैं। “नागा पर्वत श्रृंखला” भारत और म्यांमार की सीमा पर स्थित है जिसका सबसे ऊंचा बिंदु “माउंट सरमाटी” है। नागा पर्वतों का एक हिस्सा भारतीय राज्य नागालैंड में और दूसरा हिस्सा म्यांमार में है। एक बात समझ लीजिए कि नागा साधू और नागालैंड में कोई संबंध नहीं है और नागा पर्वतों वाले भारतीय राज्य नागालैंड में “नागा” एक जाति होती है जिसे भारतीय संविधान में शिड्यूल्ड ट्राईब के वर्ग में रखा गया है।
दरअसल आठवीं शताब्दी में जब आदि शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों पर चार मठों 1-ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, 2-श्रृंगेरी पीठ, 3-द्वारिका शारदा पीठ और 4- पुरी गोवर्धन पीठ हिन्दू धर्म के लोगों को समय-समय पर शिक्षित और दीक्षित करने के लिए स्थापित किया तो इन पीठों और हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ों को भी स्थापित किया। ‘अखाड़ा’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘कुश्ती का मैदान’, जो संस्कृत शब्द ‘अखंड’ से निकला है, जिसका अर्थ है ‘अविभाज्य’ , अखाड़े का अर्थ शिक्षा हासिल करने वाले स्थान से भी होता है। अखाड़ा एक पारंपरिक भारतीय संस्था है जो तपस्वियों और संतों के लिए एक सांप्रदायिक धार्मिक मठ के रूप में कार्य करती है जो हिंदू धर्म और चारों पीठ की रक्षा के लिए बनाया गया।
अखाड़ों में हिंदू धर्म की शिक्षाओं में पारंगत कराने के साथ साथ शस्त्र विद्या की शिक्षा भी दी गयी कि यदि शास्त्र विफल हो तो शस्त्र का प्रयोग किया जा सके। अर्थात हिंदू धर्म के बाहरी खतरों से रक्षा और प्रचार के लिए अखाड़ों की स्थापना गई जो आध्यात्मिक और मार्शल दोनों परंपराओं में दक्ष हों।? आदि शंकराचार्य के बनाए चारों पीठ 10 क्षेत्रों में बंटें थे जिनके एक-एक मठाधीश थे। हिंदू धर्म के भीतर आध्यात्मिक ज्ञान और अभ्यास के संरक्षक के रूप में कार्य करने के लिए बनाए गए अखाड़ों को कई अलग-अलग प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है, 1-शैव अखाड़े 2-वैष्णव अखाड़े 3-उदासीन अखाड़े इन अखाड़ों पर आदि शंकराचार्य की शिक्षाओं का विशेष प्रभाव था और यह सभी अखाड़े शिव के चारों मठों से संबंध होते हैं और शिव की उपासना करते हैं। शिव संन्यासी संप्रदाय के अंतर्गत ही दशनामी संप्रदाय जुड़ा हुआ है। यह दशनामी संप्रदाय हैं , गिरि, पर्वत, सागर, पुरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, तीर्थ और आश्रम।
इन सभी अखाड़ों में जूना अखाड़ा इनका खास अखाड़ा है , बाद में इन अखाड़ों की संख्या 13 हो गई जिनमें ट्रांसजेंडर समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला किन्नर अखाड़ा सबसे नया अखाड़ा बना। हिन्दू संतों के 13 जो अखाड़े हैं उनमें शिव संन्यासी संप्रदाय के 7 अखाड़े, बैरागी वैष्णव संप्रदाय के 3 अखाड़े और उदासीन संप्रदाय के 3 अखाड़े हैं। इन्हीं में नाथ, दशनामी आदि होते हैं और सभी संत अपने नाम के आगे सागर , गिरि, पुरी, भारती , सरस्वती,आचार्य, दास, नाथ आदि उपनाम लगाते हैं। इस उपनाम से ही यह पता चलता हैं कि वे किस अखाड़े, मठ, मड़ी और किस संत समाज से संबंध रखते हैं। यह उपनाम एक कोड होता है।
जैसे गोस्वामी शिव संन्यासी संप्रदाय के दशनामी संप्रदाय के संत, पर्वत, सागर, पुरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, तीर्थ और आश्रम? नाम अपने नाम के बाद लगाते हैं और इनमें शंकराचार्य, महंत, आचार्य और महामंडलेश्वर आदि पद होते हैं। किसी भी अखाड़े में महामंडलेश्वर का पद सबसे ऊंचा होता है। बैरागी वैष्णव संप्रदाय के अखाड़े में आचार्य, स्वामी, नारायण, दास, आदि उपनाम रखते हैं। जैसे रामदास, रामानंद आचार्य, स्वामी नारायण आदि। नाथ संप्रदाय के सभी साधुओं के नाम के आगे नाथ लगता है। जैसे गोरखनाथ, मछिंदरनाथ और योगी आदित्यनाथ आदि।
उदासीन संप्रदाय के संत निरंकारी होते हैं और इनके संतों में दास, निरंकारी और सिंह अधिक होते हैं। सन् 1954 के पहले इन अखाड़ों में ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा थी और कुंभ में पहले स्नान करने को लेकर आपस में मार काट हो जाती थी ? मगर 1954 में अखाड़ा परिषद बना और यह सभी अखाड़ों में आपसी सहमति से दिशा निर्देश तय करने लगा। तेरह प्रमुख अखाड़ों में से सात संन्यासी अखाड़े ही नागा साधु बनाते हैं। ये हैं 1-जूना, 2-महानिर्वणी, 3-निरंजनी, 4-अटल, 5-अग्नि, 6-आनंद और 7-आवाहन अखाड़ा। अब आईए समझते हैं कि नागा साधू क्या होते हैं? दरअसल शैव पंथ के यह 7 अखाड़ों द्वारा देश में होने वाले चार कुंभ में एक विशेष प्रक्रिया के तहत नागा साधू बनाया जाता है।
इन चार प्रमुख कुंभों में नागा साधु बनने पर उन्हें अलग-अलग नाम दिए जाते हैं। इलाहाबाद के कुंभ में उपाधि पाने वाले को नागा, उज्जैन में खूनी नागा, हरिद्वार में बर्फानी नागा और नासिक में खिचडिय़ा नागा कहा जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि साधु को किस कुंभ में नागा की उपाधि मिली है। नागा साधु बनने के लिए 12 वर्ष का समय लगता है। जिसमें नागा साधुओं को सबसे पहले यह सातों अखाड़े ब्रह्मचारी बनने की शिक्षा देते हैं। 2-3 साल के इस दौर में अगर यह पाया जाए कि साधु नियम मानने में कोताही बरत रहा है, या फिर भटक रहा है तो उसे परिवार में वापस लौट जाने को कह दिया जाता है।
इस परीक्षा को पास करने के बाद दीक्षा दी जाती है। इसके बाद की परीक्षा यज्ञोपवीत और पिंडदान की होती है जिसे बिजवान कहा जाता है। अंतिम परीक्षा दिगम्बर और श्रीदिगम्बर की होती है। दिगम्बर नागा एक लंगोटी पहन सकते हैं, लेकिन श्रीदिगम्बर को बिना कपड़े के रहना होता है और उनकी इन्द्रियाँ तोड़ दी जाती हैं। दरअसल इंद्रियों के तोडऩे की इस प्रक्रिया में सबसे पहले एक क्रिया पंचकेश होता है जिसके तहत शरीर के सभी भागों के बाल उतार दिया जाता है फिर “लिंग तोड़क” या “तंगतोड़” किया जाता है। यह एक बेहद कष्टकारी प्रक्रिया होती है जिसमें व्यक्ति कई दिनों तक तड़पता रहता है।
इसके तहत किसी भारी वस्तु को लिंग से बांध कर कई दिनों तक लटकाया जाता है जिससे लिंग में तनाव उत्पन्न करने वाली नस टूट जाती है और लिंग निष्क्रिय हो जाता है , उसमें उत्तेजना की शक्ति समाप्त हो जाती है। अखाड़े इसे शारीरिक और मानसिक तपस्या का चरम रूप मानते हैं और? इस लिंग तोड़क क्रिया के बाद उन्हें कुंभ के दौरान अपना पिंडदान करना पड़ता है, जिसका मतलब है कि वह अपने पिछले जीवन से मुक्ति पा लेते हैं और फिर ब्रह्म मुहूर्त में 108 बार कुंभ की डुबकी लगाई जाती और फिर विजया हवन करके उन्हें “नागा” की उपाधि दी जाती है। “नागा” की उपाधि के बाद साधुओं को उनकी वरीयता के आधार पर कोतवाल, पुजारी, बड़ा कोतवाल, भंडारी, कोठारी, बड़ा कोठारी, महंत और सचिव पद दिए जाते हैं जिनमें सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पद महंत का होता है।
नागा साधु सुबह चार बजे उठकर नित्य क्रिया और स्नान करते हैं और फिर श्रृंगार करते हैं। इसके बाद हवन, ध्यान, बज्रोली, प्राणायाम, कपाल क्रिया और नौली क्रिया करते हैं। पूरे दिन में एक बार शाम को भोजन करते हैं और फिर बिस्तर पर चले जाते हैं। नागा साधु 17 श्रृंगार करते हैं? जिनमें लंगोट, भभूत, चंदन, लोहे या चांदी के कड़े, अंगूठी, पंचकेश, कमर में माला, माथे पर रोली, कुंडल, चिमटा, डमरू, कमंडल, गुथी हुई जटाएं, तिलक, काजल, हाथों में कड़ा, और बाहों में रुद्राक्ष की मालाएं शामिल हैं। महानिर्वणी अखाड़ा , जूना अखाड़ा और निरंजनी अखाड़ों में सबसे अधिक नागा साधु होते हैं। नागा साधु केवल शिव के भक्त होते हैं और वह किसी अन्य देवता को नहीं मानते?, नागा साधुओं का एक मात्र अभिवादन मंत्र है”? नमो नारायण”।
कुंभ के बाद, ये साधु तपस्या के लिए हिमालय की ओर जाते हैं और यहां वह कठोर तप और संन्यासी जीवन के कठिन प्रशिक्षण से गुजरते हैं। यह प्रशिक्षण शास्त्र और शस्त्र दोनों का होता है और अगले कुंभ तक ये साधु वहीं रहते हैं। कुंभ में लौटने पर इन्हें नई जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं। जब महिलाएं संन्यास में दीक्षा लेती हैं तो उन्हें भी नागा साधु बनाया जाता है, लेकिन वह सभी वस्त्रधारी होती हैं। जूना अखाड़े ने ‘माई बाड़ा’ को दशनाम संन्यासिनी अखाड़ा का स्वरूप प्रदान किया और यह वहीं रहतीं हैं। इन महिला साधुओं को ‘माई’, ‘अवधूतानी’ कहा जाता है। उन्हें किसी विशेष इलाके में प्रमुख के रूप में ‘श्रीमहंत’ का पद भी दिया जाता है।