गबन उजागर होने के बावजूद प्रिंसिपल छतरपाल अपने पद पर कायम
बल्लबगढ़ (मज़दूर मोर्चा) बीते दिनों स्थानीय राजकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक स्कूल की 10 वीं तथा 12 वीं जमात की छात्राओं की लाखों रुपये बोर्ड परीक्षा फीस डकार कर $फरार होने वाला प्रिंसिपल छतरपाल अभी तक अपने पद पर कायम है। ये प्रिंसिपल महोदय बोर्ड परीक्षा फीस के अलावा करोड़ों रुपये के छात्र फंड भी डकार चुके हैं। इतना ही नहीं, प्रिंसिपल बनने से पूर्व जब ये इसी स्कूल में प्राध्यापक थे तो कई माह तक गैरहाजिर रहने के चलते तत्कालीन प्रिंसिपल ने इनका वेतन नहीं निकाला था। लेकिन खुद प्रिंसिपल बनते ही इन्होंने अवैध रूप से अपना रुका हुआ पुराना वेतन भी निकाल लिया। इनकी तमाम कार्य करतूतों के बावजूद ये जनाब अभी तक शहर की बालिकाओं को शिक्षा देने का कार्य-भार सम्हाले हुए हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार जि़ला शिक्षा अधिकारी अजीत सिंह कई माह पूर्व स्कूल के रजिस्टरों की जांच करके इन घाटालों की जानकारी ले चुके थे। नियम-कायदों के अनुसार पाये गए घोटालों का संज्ञान लेते हुए उन्हें तुरन्त प्रिंसिपल के खिला$फ विभागीय तथा आपराधिक दंड संहिता के तहत कार्रवाई करनी चाहिए थी लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। जाहिर है कि इस इस तरह की कोई कार्रवाई न करने की पूरी कीमत जि़ला शिक्षा अधिकारी ने भी वसूली होगी। यह वसूली केवल यहीं तक सीमित न होकर शिक्षा निदेशालय तक भी पहुंचती है; क्योंकि इस तरह के घोटालों की महक निदेशालय में बैठे उच्चाधिकारियों तक भी पहुंचती रहती है। छात्राओं की बोर्ड परीक्षा फीस को डकार कर फरार होने के बाद प्रिंसिपल के विरुद्ध थाने में दर्ज कराई गई शिकायत को भी इस आधार पर वापस ले लिया गया था कि प्रिंसिपल के परिजनों द्वारा डकारी गई रकम जुर्माने सहित जमा करा दी गई थी। लेकिन कानून की दृष्टि से यह एकदम गलत हैं क्योंकि सरकारी पैसे का गबन तो एक बार हो ही चुका था, जिसके लौटाने से जुर्म कम नहीं हो जाता।
इसी स्कूल के प्राध्यापक संदीप चौहान हरियाणा स्कूल लेक्चचर ऐसोसिएशन (हस्ला) के जि़ला स्तरीय प्रधान होते हुए भी इस तरह के गबन एवं भ्रष्टाचार को देखते हुए भी अनदेखा करते रहे। जाहिर है यह अनदेखी मुफ्त में तो नहीं ही की जा रही थी। यदि वे ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ होते तो इसके विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद करते। लेकिन इसके विपरीत वे भी अपराधी प्रिंसिपल की दलाली करने में जुट गए। इन दोनों की जुगलबंदी के चलते अनेकों, गणित, भौतिकी व रसायन शास्त्र के प्राध्यापक स्कूल में केवल हाजिरी लगाने के बाद कोचिंग सेंटरों में पढ़ाने को जाते रहे।
जानकार बताते हैं कि अपने इस पद की बदौलत संदीप चौहान न केवल प्रिंसिपल की दलाली करने में जुटे रहे बल्कि जि़ला शिक्षा अधिकारी कार्यालय तक में भी यह धंधा चलाते रहे। वे स्कूल में पढ़ाने की बजाय डीईओ कार्यालय में ही अध्यापकों के छोटे-मोटे कामों को लेकर बैठे रहते थे। गौरतलब है कि चौहान भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक हैं और जब इस विषय को पढ़ाने वाला ही स्कूल में न रहे तो बच्चे क्या और कैसे पढ़ते होंगे। किसी की एसीपी बनवानी है, तो किसी की चाइल्ड केयर लीव मंजूर करानी है अथवा किसी का तबादला करवाना या रुकवाना आदि चौहान के मुख्य धंधे थे। हर धंधे की बाकायदा एक ‘फीस’ तय थी जिसे चौहान, दफ्तर वालों के साथ मिल-बांट कर डकारते थे।
चौहान की इन हरकतों के चलत 29 दिसंबर में हुए ….चुनाव में ये 142 मतों से हार गए। उनके स्थान पर उच्चतर माध्यमिक स्कूल अजरौंदा के प्राध्यापक दान सिंह प्रधान चुने गए। अब देखना यह है कि दान सिंह भी र्चौहान की तरह दलाली करते हैं अथवा अध्यापकों एवं छात्रों के हितों के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं।