फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) मुर्दा हो चुकी बडख़ल झील को पुर्नजीवित कराना, सीमा त्रिखा का पहला चुनावी मुद्दा 2014 में बना था। पांच साल बाद होने वाले 2019 के चुनाव में भी सीमा त्रिखा का यह एजेंडा कायम रहा। मुद्दा चाहे मंझावली यमुना पुल का हो या फिर गुडग़ांव-पलवल मेट्रो का हो, अथवा बडख़ल झील का हो उसे सदैव जिंदा रखने में भाजपा सरकार मीडिया का भरपूर इस्तेमाल करती आई है। अब बताया जा रहा है कि झील में दो मीटर पानी भर गया है और आगामी एक वर्ष में छ: मीटर भर जाने के बाद इस पर होने वाले तरह-तरह के खेल तमाशों के हवाई किले बनाए जा रहे हैं। अब तक 102 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद प्रोजेक्ट इस स्तर तक पहुंच पाया है, अभी और कितना खर्च होना है इसका कोई अंदाजा नहीं।
सुधी पाठक यह तो अवश्य जानते ही होंगे कि झील में भरा जाने वाला यह पानी सीवरेज का है। इसे शोधित करने के लिए करोड़ों रुपए का सीवेज़ ट्रीटमेंट प्लांट सेक्टर 21 ए में लगाया गया है। वहां से पाइप लाइन द्वारा इसे झील में डाला जा रहा है। सीवेज को शोधित करने व आए दिन टूटने वाली पाइप लाइन की मरम्मत आदि पर कितना खर्च हुआ करेगा यह तो समय ही बताएगा। नगर निगम द्वारा पहले से ही चलाए जा रहे ऐसे प्लांटों की हालत देख कर बखूबी समझा जा सकता है कि इनके द्वारा ‘शोधित’ जल कितना शोधित होता है। इस तथाकथित जल को धरती में समाने से रोकने के लिए बडख़ल के तल पर प्लास्टर भी किया गया है।
सैंकड़ों-करोड़ रुपए खर्च करके जिस तरह से बडख़ल झील को बर्बाद किया गया है, उसे बिना कोई खर्च किए बरसाती पानी से बड़ी आसानी से ठीक वैसे ही भरा जा सकता था जैसे कि पुराने समय से भरा जाता रहा है। इस संबंध में पर्यावरण प्रेमी संगठन ‘ग्रीन इन्डिया फाऊंडेशन ट्रस्ट’ के करीब 40 विशेषज्ञों ने पहली जून 2019 को बडख़ल झील का दौरा किया था। इस टीम में अलीगढ़ के सुबोध नंदन शर्मा, विख्यात पक्षी प्रेमी एआर रहमानी सहित कई अन्य जल, जंगल एवं प्रकृति प्रेमी विशेषज्ञ थे। इस संगठन के संगरक्षक मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित जल पुरुष राजेन्द्र सिंह हैं।
इन सभी वरिष्ठ विशेषज्ञों ने 10-12 घंटे पूरे क्षेत्र में घूम-फिर कर यहां की प्रकृति, वनस्पति, पक्षियों आदि का जायजा लिया। उन्होंने पाया कि इस झील को बहुत आसानी से पुन: बरसाती पानी से ठीक वैसे ही भरा जा सकता है जैसे कि यह पहले भरी जाती रही है। इसके लिये पहाड़ से आने वाले बरसाती पानी के रास्ते में जो भी रुकावटें आ गयी हैं उन्हें दूर किया जाए जिससे बरसाती पानी बह कर झील तक आ सके। उनकी इस परियोजना पर सरकार का एक पैसा भी खर्च होने वाला नहीं था। इस संगठन के मुताबिक बडख़ल झील की खुदाई से जो मिट्टी निकलेगी उसकी बिक्री से ही सारा खर्च निकल जायेगा।
बडख़ल झील को प्राकृतिक ढंग से भरे जाने के संबंध में खुद डीसी विक्रम सिंह ने दिसंबर 2022 को झील क्षेत्र का दौरा किया था। साइकिल से पूरी बडख़ल झील का दौरा करने के बाद उन्होंने भी इसे प्राकृतिक तरीके से भरे जाने पर ही जोर दिया था लेकिन नेताओं के आगे की उनकी वैज्ञानिक- प्रशासनिक बुद्धि नहीं चल सकी। इसके लिए प्रकृतिविदों व अन्य विशेषज्ञों द्वारा इस बाबत निगम अधिकारियों व नेताओं को समझाने का प्रयास भी किया गया था। यदि उनकी मान ली गई होती तो ये सैंकड़ों करोड़ तो बचते ही साथ में भू-जल स्तर भी अच्छा-खासा रिचार्ज हो सकता था। परन्तु ऐसा करने से जनविरोधी भ्रष्ट अफसरों व नेताओं को भला क्या बचता? इन लोगों को तो तभी कुछ मिल पाता है जब लम्बे-चौड़े बजट खर्च किए जाएं।