फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सेक्टर 16 ए स्थित जि़ले के सबसे बड़े व पुराने महाविद्यालय की इमारत, आठ वर्ष पूर्व कंडम घोषित कर दी गई थी। उसके बाद जैसे-तैसे करीब चार वर्ष पूर्व इसकी नई बिल्डिंग का निर्माण कार्य शुरू किया गया। दावा किया गया था कि छ:मंजिला बनने वाली इस इमारत में 15 हजार विद्यार्थियों के पढऩे का स्थान होगा।
रोते-पीटते करीब डेढ़ साल में बिल्डिंग का ढांचा तो खड़ा हो गया, परन्तु काम पूरा करने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं बचे तो काम बीच में ही रोक दिया गया। ढाई साल तक काम रुके रहने के बाद अब फिर से शुरू करने की बात चलाई जा रही है। बात में कितना दम है यह तो काम शुरू होने पर ही पता चल पाएगा। कहा जा रहा है कि इसके लिए 15 करोड़ रुपए मंजुर हो गए हैं। हकीकत क्या है वह तो रकम आने पर ही पता चलेगा। लेकिन एक बात तो स्पष्ट कर दी गई है कि अब 15 हजार के बजाय साढे सात हजार विद्यार्थियों के लिए ही इसमें स्थान बन पाएगा। यानी कि मूल घोषणा से आधे पर तो अभी से आ चुके हैं, पूरा हानेे तक न जाने कितने पर आएंगे? इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि काम कब तक पूरा हो पाएगा?
सवाल यह पैदा होता है कि जब पैसे पल्ले नहीं होते तो भाजपा के घोषणावीर ऐसी घोषणाएं क्यों करते हैं? घोषणा करने का यह सिलसिला अभी भी ज्यों का त्यों जारी है। कभी बल्लबगढ़ सोहना रोड के रेलवे फ्लाईओवर को चौड़ा करने की तो कभी मोहना रोड को एलिवेटेड तो कभी गुडग़ांव व पलवल तक मेट्रो चलाने के जुमले फेंकने से ये जुमलेबाज परहेज नहीं कर रहे। इसी को तो कहते हैं घर नहीं दाने अम्मा चली भुनाने।