फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) एनएच तीन स्थित ईएसआई कॉर्पोरेशन मेडिकल कॉलेज-अस्पताल बीते करीब तीन साल से स्टाफ की भारी कमी से जूझता आ रहा था। इसी दौरान रेफरल पर होने वाले खर्च को बचाने के लिये यहां डायलिसिस, कैथलैब, बोनमैरो ट्रांस्प्लांटेशन, आंख का कोर्निया तथा किडनी प्रत्यारोपण जैसी अति विशिष्ट चिकित्सा (सुपर स्पेशलिटी ) सेवाएं शुरू की गईं। आईसीयू में बिस्तरों की संख्या 30 से बढ़ाकर 120 कर दी गई। इन सबके कारण कॉर्पोरेशन का वह सैंकडों करोड़ प्रति वर्ष होने वाला खर्च बच गया जो उसे निजी अस्पतालों को अदा करना पड़ता था।
संस्थान की उत्कृष्ट सेवाओं के चलते जहां ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या 2000 से बढ़कर 5000 हजार तक होने लगी और 550 बिस्तरों वाले अस्पताल में 900-950 मरीज़ भर्ती रहने लगे तो स्टाफ की कमी का खलना स्वाभाविक था। कायदे से देखा जाए तो अस्पताल की बढ़ती ज़रूरतों का स्वत: संज्ञान लेकर मुख्यालय में बैठे अधिकारियों को स्टाफ संख्या में आवश्यक बढ़ोत्तरी करनी चाहिए थी। लेकिन अस्पताल प्रबन्धन द्वारा तीन वर्षों तक लगातार अनेकों बार लिखित एवं मौखिक आग्रह करने के बावजूद स्टाफ की वृद्धि नहीं की गई। यह तो शुक्र है कि अगस्त 2024 में अशोक सिंह आईएएस यहां बतौर डीजी नियुक्त हुए और उन्होंने समस्या को समझते हुए मुख्यालय में बैठे अधिकारियों को हड़काया और 10 सितम्बर तक स्टाफ बढ़ोत्तरी की स्वीकृति प्रदान करने को कहा।
प्रशासनिक योग्यता से रहित, मूर्ख एवं कामचोर अधिकारियों को डीजी के दबाव में स्टाफ बढ़ोत्तरी स्वीकृत तो करनी पड़ी भले ही तारीख 10 की बजाय 30 सितम्बर हो गई। इतना ही नहीं जो वृद्धि की गई है वह जरूरत एवं मानदंडों से काफी कम की गई है। इतने बड़े अस्पताल में जहां 800 का नर्सिंग स्टाफ होना चाहिए था वहां केवल 300 से काम चलाया जा रहा था अब दो सौ नर्सेे और बढ़ाने की स्वीकृति दी गई है यानी अभी भी 300 नर्सों की कमी रहेगी। इन नर्सों के श्रेणी विभाजन में भी बड़ा गड़बड़ झाला छोड़ा गया है। कुल संख्या में से 86 नर्सों को सीनियर नर्सिंग ऑफसर में रखा गया है जबकि नर्सिंग सेवा मानक के अनुसार यह संख्या 170 होनी चाहिए। सेवा शर्तों के अनुसार वे पांच साल बाद पदोन्नत तो हो जायेंगी परन्तु उनकी तैनाती कहां होगी, पता नहीं?
इसी तरह 800 नर्सिंग अर्दली (एनओ) का काम जो अभी तक 250 एनओ से लिया जा रहा था उसमें अब 100 की वृद्धि कर दी गई है। अब इनकी कुल संख्या 350 हो गई है लेकिन 450 की कमी तो फिर भी रह गई है। जो कैथलैब अभी तक बिना टेक्नीशियनों के, जैसे-तैसे चलाई जा रही थी, उसके लिये 18 टेक्नीशियनों की स्वीकृति प्रदान कर दी गई है।
इसी तरह जो डायलिसिस विभाग, आईसीयू में तैनात नौ टेक्नीशियनों के द्वारा चलाया जा रहा था, उसके लिये 28 अतिरिक्त टेक्नीशियन स्वीकृत किए गए हैं। संदर्भवश सुधी पाठक जान लें कि यहां प्रति दिन 70-80 मरीजों का डायलिसिस होता है। इसके विपरीत मुख्यालय की नाक के नीचे बसई दारापुर स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मात्र 30-35 डायलिसिस करने के लिये यहां से ज्यादा टेक्नीशियन तैनात हैं। जहां किचन में पहले से 37 पद स्वीकृत थीं उन्हें समाप्त कर दिया गया है, क्योंकि किचन को ठेके पर देने का इरादा है। इनमें स्थायी कर्मचारी तैनात करने की जरूरत मुख्याल नहीं समझता। यही हाल लॉंड्री का है, लॉंड्री में भी पहले 15 पद स्वीकृत थे जिन्हें समाप्त कर ठेके पर देने की तैयारी हो रही है।
ठेकेदारी पर काम कराने के इच्छुक मुख्यालय अधिकारियों ने तो आईसीयू, डायलिसिस को भी ठेके पर दे दिया था। स्वाभाविक है कि ठेकेदारी में इस तरह का काम करने वाला कोई भी ठेकेदार यदि मानकों के अनुसार काम करेगा तो उसके बर्तन बिक जाना स्वाभाविक है! ऐसे मेें मुनाफे के लिए आया ठेकेदार हर तरह से मानकों की उल्लंघना करने का प्रयास करता है। लेकिन अस्पताल प्रशासन ने इन दोनों ठेकेदारों को मानकों का उल्लंघन नहीं करने दिया तो वे छोड़ कर भाग गए। मजबूरी में शर्मसार होकर मुख्यालय के बेशर्म अधिकारियों ने ये दोनों काम करने का जिम्मा खुद अस्पताल को सौंप दिया।
अस्पताल को सौंप तो दिया लेकिन स्टाफ बरसों तक भी नहीं दिया, इसी तरह मुख्यालय की भरपूर कोशिश थी कि पूरा रेडियोलॉजी तथा लेबोरेट्री विभाग भी ठेके पर दे दिया जाए, लेकिन भरपूर प्रयास के बावजूद मुख्यालय वाले ऐसे किसी ठेकेदार को तलाश नहीं पाए।
सर्वविदित है कि किसी भी अस्पताल में डॉक्टरों के साथ साथ पैरा मेडिकल एवं अन्य स्टाफ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण समझी जाती है यह स्टाफ एक प्रकार से अस्पताल की रीढ़ होता है। किसी भी अस्पताल में डॉक्टरों के लिए यह संभव नहीं हो सकता कि वे मरीज़ का इलाज करने के बाद चौबीसों घंटे उसकी देखभाल करें। इस देखभाल के अभाव में डॉक्टरों के सारे किए-कराए पर पानी फिर जाना निश्चित है लेकिन इस बात की समझ मुख्यालय में बैठे अधिकारियों को शायद नहीं है।
एनएचपीसी के नोटिस से बनी हॉस्टल समस्या जिस अनमने ढंग से रो-पीट कर कॉर्पोरेशन मुख्यालय ने फरीदाबाद के मेडिकल कॉलेज को चलने दिया था, उसमें दूरदर्शिता का अभाव होना तो स्वाभाविक ही था जिसका दुष्परिणाम आज सामने है। 100 सीटों से आरम्भ होने वाले इस मेडिकल कॉलेज में इसी हिसाब से छात्रावास बनाए गए थे। चार वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री मोदी ने बैठे-बिठाए देश भर के तमाम मेडिकल कॉलेजों की सीटें डेढ़ गुणा कर दीं। इस हिसाब से यहां वैसे तो 150 सीटें बनती थी लेकिन कॉर्पोरेशन ने केवल 125 ही बनाई। जाहिर है कि इससे हॉस्टल की समस्या तो होनी ही थी।
कायदे से तो कॉर्पोरेशन को तुरन्त ही नए हॉस्टल का निर्माण कार्य शुरू कर देना चाहिए था। परन्तु निकम्मे व कामचोर अधिकारियों ने इस दिशा में तिनका तक नहीं तोड़ा। इस समस्या से निपटने के लिए मेडिकल कॉलेज प्रबन्धन ने करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित एनएचपीसी कॉलोनी में बने कुछ घरों को किराये पर लेकर अस्थायी व्यवस्था कर ली। छात्रों को लाने-ले जाने के लिये तीन बसें भी भाड़े पर ले लीं। अनुमान है कि घरों के किराये व बसों के भाड़े पर जितने करोड़ रुपये अब तक खर्च हो चुके हैं, इतने में तो हॉस्टल बिल्डिंग बन सकती थी, और छात्रों का जो समय आने-जाने में बर्बाद हो रहा है उसकी तो कोई कीमत ही नहीं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार एनएचपीसी ने संस्थान को उनके घर खाली करने का नोटिस दे दिया है। पहले से तय शर्तों के अनुसार तीन महीने के नोटिस पर ये घर खाली होने चाहिए। समझौता इस भरोसे किया गया था कि कॉर्पोरेशन हॉस्टल बनवा देगा, परन्तु अपनी आदत के मुताबिक कॉर्पोरेशन वाले कोई काम करके तो राजी होते नहीं लिहाजा आज यह समस्या आन खड़ी हुई। एनएचपीसी के अलावा संस्थान ने अपने इंटर्न डॉक्टरों के छात्रावास के रूप में एनएच चार स्थित केन्द्र सरकार के कुछ छोड़े हुए मकानों को भी ले रखा है। छोड़े गए (परित्यक्त)इन मकानों की हालत भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। यह भी एक काम चलाऊ व्यवस्था के रूप में अपनाई गई थी जिसे कभी भी खाली करना पड़ सकता है। लेकिन मुख्यालय में बैठे निकृष्ट एवं कामचोर कमिश्नरों की फौज को इन सब समस्याओं से कोई सरोकार लगता नज़र नहीं आ रहा।