फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) 21 अगस्त को बीके अस्पताल प्रसव के दौरान नवजात की मौत के मामले में बैठी जांच कमेटी ने स्टाफ नर्स मंजू, बलजीत तथा पूनम को दोषी ठहराते हुए उस समय ड्यूटी पर तैनात महिला डॉक्टरों को बचाने का खेल खेल दिया है। जांच कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर दोषी ठहराई गई नर्सों के खिलाफ सीएमओ ने केस दर्ज करने के लिए एनआईटी तीन पुलिस चौकी को पत्र लिखा है।
पल्ला क्षेत्र निवासी संदीप ने 21 अगस्त की सुबह नौ बजे गर्भवती पत्नी वर्षा को प्रसव के लिए बीके अस्पताल में भर्ती कराया था। संदीप के अनुसार महिला चिकित्सकों ने जांचने के बाद जच्चा-बच्चा दोनों ठीक होने और सामान्य डिलीवरी कराने का आश्वासन दिया था। उसने कई बार पत्नी और गर्भस्थ शिशु के बारे में पूछा तो हर बार दोनों सामान्य बताते रहे। दोपहर एक बजे प्रसव पीड़ा से तड़प रही वर्षा की तबीयत बिगड़ी तो संदीप से दो यूनिट रक्त का इंतजाम करने को कहा गया। संदीप की सास रेखा का आरोप है कि डिलीवरी रूम के एक स्टाफ ने उनसे तीन हज़ार रुपये की मांग की। कहा गया कि रुपये दे दोगी तो यहीं नॉर्मल डिलीवरी करा देंगे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रसव कराने वाले स्टाफ ने वर्षा के पेट में घूंस मारे जिससे शिशु की मौत हो गई। संदीप जब रक्त लेकर पहुंचा तो उसे बताया गया कि शिशु को नहीं बचाया जा सका है वर्षा की हालत भी खराब है उसे बचाने का प्रयास किया जा रहा है। सास रेखा ने सारी बातें बताईं तो संदीप और परिजनों ने हंगामा कर दिया।
संदीप ने इसकी शिकायत सीएमओ व पीएमओ से की थी। इस पर उपमुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. रामभगत, डॉ. रचना शर्मा, बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विकास गोयल और डॉ. पूनम शर्मा की टीम ने मामले की जांच की। तीन सितंबर को कमेटी द्वारा दी गई रिपोर्ट में वही आना था जो पहले से तय था। कमेटी ने उक्त तीन नर्सों की लापरवाही के कारण नवजात की जान जाना बताया। घटना के समय ड्यूटी पर मौजूद डॉॅ. प्रोमिला सहरावत को बचाने के लिए रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया जाता तो प्रसूता की भी मौत हो सकती थी।
स्वास्थ्य मामलों के जानकारों के अनुसार अस्पताल में प्रसव कराने का काम महिला डॉक्टर द्वारा या उनकी उपस्थिति में नर्सिंग स्टाफ द्वारा कराया जाता है। वर्षा की डिलीवरी के समय केवल नर्सिंग स्टाफ ही मौजूद था महिला डॉक्टर नहीं। संदीप से दो यूनिट रक्त मंगाया गया था यानी कि प्रसव के समय वर्षा की हालत नाजुक थी तब भी महिला डॉक्टर को नहीं बुलाया गया।
डॉ. प्रोमिला सहरावत के मुताबिक वह उस समय कोई अन्य ऑपरेशन कर रहीं थीं, जब उन्हें वर्षा की हालत बिगडऩे की जानकारी हुई तब वह मौके पर पहुंचीं और वर्षा की जान बचाई। वर्षा सुबह नौ बजे भर्ती हुई थी और दोपहर एक बजे उसकी हालत खराब हुई। सवाल उठता है कि क्या डॉ. प्रोमिला चार घंटे ऑपरेशन ही करती रहीं। कमेटी को यह भी जांचना चाहिए था कि चार घंटों में डॉ. प्रोमिला ने कितने ऑपरेशन किए, कितनी डिलीवरी कराईं, या कितने मरीजों को देखा। जांच में सच सामने आ जाएगा कि डॉ. प्रोमिला कितनी व्यस्त थीं।
यदि वो प्रसव के दौरान उपस्थित होतीं तो शायद शिशु की भी जान बचाई जा सकती थी। संदीप ही नहीं स्वास्थ्य मामलों के जानकारों का भी मानना है कि कमेटी ने जांच के नाम पर खानापूर्ति ही की है। भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार पुलिस केवल इस कमेटी की रिपोर्ट के भरोसे तफ्तीश करने नहीं जा रही। इसके लिए वह अन्य विशेषज्ञों से राय व जानकारी प्राप्त करेगी। पुलिस जांच में बीके अस्पताल के प्रसव और जच्चा बच्चा वार्ड में चल रही लूट कमाई, भ्रष्टाचार और लापरवाहियों का भी खुलासा हो जाएगा। अस्पताल में आए दिन किसी न किसी नवजात व प्रसूता की मौत निकम्मे स्टॉफ की वजह से हो जाती है। यह उन मंत्री-विधायकों के मुंह पर भी तमाचा है जो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के बेहतर होने का ढिंढोरा पीटते रहते हैं। बडख़ल विधायक सीमा त्रिखा तो हर महीने यहां पिंक डे यानी महिला दिवस के मौके पर आकर महिला मरीजों को दी जाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं का निरीक्षण करने का ढोंग करती हैं। यदि वो और उनके जैसे सत्ताधारी नेता-मंत्री सच में गंभीर होते तो बीके अस्पताल के महिला वार्ड में चल रही उगाही तो खत्म कराते ही, स्टाफ की कमी भी पूरी कराते ताकि मरीजों को सच में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध होतीं।