संजीव चंदन पिछले दिनों सोनागाछी,कोलकाता की महिलाओं (वेश्यावृत्ति में शामिल) ने कोलकाता में बलात्कार की घटना के बाद कहा कि बलात्कारियों को यौन जरूरतों के लिए उनके पास आ जाना चाहिए, लड़कियों पर बलात्कार की जगह।
ऐसा ही मुझे गया के ब्रोथल की लड़कियों ने कहा था 2009 में, एक रिसर्च के सिलसिले में। उनका कहना था कि जब ‘उनका कोठा चालू रहता है तो गया में बलात्कार की घटनाएं नहीं होतीं! अपने तर्क के लिए उन्होंने उदाहरण दिया था कि रेड के कारण जब उनका काम बंद था तो उनके इलाके के बगल में ही मानपुर ओवरब्रिज पर बलात्कार हुआ था।
ऐसे बयानों पर लोग भावुक होते हैं। कोलकाता की महिला का बयान उसकी तस्वीर के साथ काफी शेयर किया गया। हालांकि यह महिलाओं पर यौन हिंसा को लेकर सबसे गलत धारणा है। बलात्कार सेक्स के लिए पार्टनर की कमी या सेक्स के उतावलेपन में नहीं होते, होते भी हैं तो बेहद कम।
ऐसा ही है तो केरल फिल्म इंडस्ट्री की घटना को लेकर क्या कहेंगे? सबसे साक्षर/ शिक्षित राज्य की फिल्म इंडस्ट्री है वह, जहां प्रोग्रेसिव चेहरे इंडस्ट्री में अधिक सक्रिय हैं, ताकत में हैं। इस इंडस्ट्री में यौन हिंसा, यौन शोषण की शिकायतों को लेकर 2017 में बनी हेमा समिति की रिपोर्ट 2019 में तैयार हो चुकी थी लेकिन सरकार ने दवाब में उसे जारी किया 2024 में। इसके बाद वहां के बड़े अभिनेताओं, निदेशकों के इस्तीफे हो रहे हैं, उन पर मुकदमे दर्ज हो रहे हैं।
क्या इन पढ़े लिखे लोगों को सेक्स की उपलब्धता की कमी है, इन्हें सहमति के साथ सेक्स के लिए पार्टनर नहीं उपलब्ध हैं? बलात्कार का सबसे बड़ा संबंध ‘पावर से है। पुरुष इसे अपनी ताकत की तरह देखता है। एक महिला को बिना सहमति के अपने काबू में लेना उसे उसकी हर तरह की सत्ता का अहसास देता है। कई तरह की, अर्थ की, सफलता की, राजनीति की और सबसे बढ़कर जाति की।
यदि कायदे से केरल फिल्म इंडस्ट्री की तरह साहित्य, संस्कृति, कला और अकादमी जगत के क्षेत्र में कोई समिति बन जाए तो शायद यहां भी ‘शक्ति के प्रदर्शन के मामले आयेंगे। Me Too के दौर में स्त्री काल एक अंक भी लाया था, स्त्रीकाल का लेकिन इस क्षेत्र में जिन लोगों को खुलकर सामने आना था वे नहीं आए।
सहमति से सेक्स, संबंध एक अलग प्रसंग है लेकिन किसी भी सत्ता संबंध के जरिए ताकत का इस्तेेमाल करना यौन शोषण ही तो है। यदि विश्वास में लेकर टेस्टिमोनी हो तो साहित्य क्षेत्र के दिग्गजों पर भी मुकदमे हो सकते हैं। मेरे सामने ही ऐसे एक दो टेस्टिमोनी से यह बात समझ में आई कि एक पावर सेंटर यहां भी हैं, जो या तो शक्ति संबंध के जरिए सहमति हासिल कर रहे हैं या स्टॉकिग करते हुए, नुकसान की संभावना पेश करते हुए कथित ‘प्रेम हासिल करते हैं। गप्पों में इस प्रसंग के लिए दोनो कुख्यात हैं,अपने-अपने लोगों के बीच, अपने क्षेत्र के सुख्यात हैं।ऐसी अलग -अलग यौन हिंसा के प्रति सिविल सोसायटी का रुख हम देख चुके हैं। इनकी भी दुनिया में हमारे बलात्कारी, उनके बलात्कारी का भेद बेहद स्पष्ट है। यौन हिंसा को लेकर सबसे मुखर समवेदित भी यही दिखता है।
यौन हिंसा को जिस तरह से राजनीतिक जमातें अपने अपने हित के अनुसार राजनीतिक दायरे में डालती हैं, कार्रवाई या आंदोलन करती हैं वह ऐसी घटनाओं को एक खास किस्म से समर्थन ही देता है या इसके खिलाफ सामाजिक मानस की असहजता को कम करता है। कोलकाता की यौन हिंसा से इस वक्त देश की एक मात्र महिला मुख्यमंत्री के खिलाफ भाजपा, सीपीआईएम और स्थानीय कांग्रेस को एक मुद्दा मिल गया है। जांच की संवेदनशीलता से किसी को क्या सरोकार? आखिर सीबीआई की जांच में देरी का जिम्मेवार कौन है? ममता कि मोदी?
असम में यौन हिंसा को भाजपा का मुख्यमंत्री ही साम्प्रदायिक रंग दे रहा है। उत्तर प्रदेश की यौन हिंसा पर वैसा आक्रोश नहीं है, मीडिया भी वह तवज्जो नहीं दे रही है। महाराष्ट्र में एक स्कूल में बच्चियों के साथ यौन हिंसा के खिलाफ विपक्ष के बंद को हाईकोर्ट रोक दे रहा है। विपक्ष के प्रदर्शन को मीडिया तवज्जो नहीं दे रही। उसे बंगाल को एक और सुशांत सिंह मामला बनाने में रुचि है।
बिहार में हुई बलात्कार की घटना ने स्थानीय मीडिया के लिए भी वह कंसर्न नहीं बनाया, जितना बंगाल को लेकर ‘उत्साहित है। ऐसी घटनाओं के लिए प्राथमिक जिम्मेवारी स्टेट की बनती है, सिस्टम की, वह संवेदनशील होगा तो बड़े पैमाने पर इसे रोका जा सकता है। दूसरी बड़ी जिम्मेवारी समाज और संस्कृति की है। इनका सबसे बड़ा हल स्त्रियों के आर्थिक सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता के साथ इको सिस्टम में स्त्रियों की अधिकतम भागीदारी ही है। कहना न होगा कि संपूर्ण डायवर्सिटी के साथ।
इसे लिखते पढ़ते हुए निराशा के जोन में जाना भी ठीक नहीं या यह कहना कि समाज, सार्वजनिक स्पेस उत्तरोत्तर महिला के लिए खराब हो रहा है। सच तो यह है कि आधुनिकता और संविधान आधारित लोकतंत्र ने महिलाओं को ज्यादा सक्रिय किया है, सार्वजनिक स्पेस में लाया है। बस जरूरत है उसी अनुपात में उत्तरोत्तर सामाजिक उत्तरदायित्व की।