नवनियुक्त डीईओ आशा दहिया पूरी बारात के साथ कार्यालय पहुंची

नवनियुक्त डीईओ आशा दहिया पूरी बारात के साथ कार्यालय पहुंची
October 30 14:30 2023

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बीते करीब दस माह से डीईओ (जि़ला शिक्षा अधिकारी)के खाली पड़े पद पर नियुक्त हुई आशा दहिया ने 18 अक्टूबर को कार्यभार सम्भाल लिया। डिप्टी डीईओ रोहतक से पदोन्नत होकर यहां का कार्यभार संभालने का सौदा करीब चार माह पूर्व ही हो चुका था। इससे सम्बन्धित लेन-देन भी हो चुका था। परन्तु इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश, जिसके अनुसार अनुुसूचित जाति का कोटा पूरा करना था, के चलते आशा दहिया का काम अटका रह गया था।

खैर, जो भी हो राज्य के शिक्षामंत्री कंवर पाल गूजर अपने सौदे पर ईमानदारी से कायम रहे और सुप्रीम कोर्ट की अड़चना दूर होते ही आशा दहिया को यह जि़ला सौंप दिया जबकि उनके पास और भी बड़ी-बड़ी आर्कषक ऑफर थीं। हालांकि उनको यह लीज केवल सात-आठ महीने के लिए ही मिली है, अप्रैल में तो वो सेवानिवृत्त होने वाली है। यानी जो खेल करना हैं उन्हे इन्हीं सात-आठ महीनों में करना होगा। शिक्षा विभाग के भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि $फरीदाबाद में डीईओ लगने का रेट पांच से दस लाख तक कुछ भी हो सकता है। इसी तरह अन्य जि़लों में लूट कमाई की संभावनाओं को देखते हुए अलग-अलग रेट चलते हैं। मंत्री की ओर से सौदेबाज़ी का यह धंधा सुखबीर कौशिक नामक एक बाबू को दिया हुआ है। तबादलों के अलावा और भी अनेकों प्रकार के कामों के लिये भी लेन-देन का काम यही कौशिक करता है। मंत्री के मुंह लगे होने के चलते यह डीओ स्तर तक के अधिकारियों से ऐसे बात करता है जैसे कि वे उसके मातहत हों।

लूट कमाई करने वालों के लिये यह पांच-दस लाख कोई मायने नहीं रखते क्योंकि यहां पर लूट कमाई का धंधा का$फी तगड़ा चलता है। डीओ दफ्तर में बैठे बाबूओं की कमाई तो लगभग हर सीट पर हो ही जाती है परन्तु प्राइवेट स्कूलों को डील करने वाली सीट का तो कोई मुकाबला ही नहीं है।

नियुक्ति से प्रफुल्लित आशा दहिया जब चार्ज लेने यहां पहुंची तो उनके साथ करीब 40 लोग थे। आधे से अधिक तो रोहतक से ही साथ आये थे, शेष यहां से शामिल हो गये। अपने साथ आने वाली इस पूरी बारात की सूचना आशा दहिया ने पहले से ही आपने दफ्तर में इस हिदायत के साथ दे दी थी कि इन सबका जलपान तथा लंच का प्रबन्ध किया जाय। लंच के लिये सारे बारात को सेक्टर 16 स्थित ओम  स्वीट्स नामक रेस्तरां में ले जाया गया। यह बताने की जरूरत नहीं है कि सारा खर्चा दफ्तर के उन बाबूओं ने उठाया जिनकी दुकानदारी अब बुलेट ट्रेन की गति से चलने लगेगी। ऐसे में स्कूलों व शिक्षा की हालत क्या होगी बखूबी समझा जा सकता है।

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Mazdoor Morcha
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