फऱीदाबाद की मज़दूर बस्तियाँ-गाँव अनखीर सत्यवीर सिंह लगभग 40 साल पहले तक, बडख़ल झील को, दिल्ली के सबसे नज़दीक वाले पर्यटन स्थल, होने का गौरव हांसिल था. अरावली के खूबसूरत जंगलों से झरने, फऱीदाबाद के उत्तर पश्चिम में मौजूद, क़ुदरती पानी के इस विशाल भंडार को, कभी सूखने नहीं देते थे. बे-इन्तेहा खनन और ज़मीन, जल, जंगलों के बेरहम और बे- परवाह शोषण की कभी ना शांत होने वाली, मुनाफ़े की पूंजीवादी भूख के तहत, अरावली खोखली होती गई और बडख़ल झील सूखती गई. आज इस झील में एक बूंद पानी भी नहीं है. ये ‘झील’ आज भैसों, गायों और बंदरों का पर्यटन एवं प्रजनन स्थल बन चुकी है. ‘पर्यावरण का विनाश’, हमारे देश का राष्ट्रीय कार्यक्रम है. जाने कितने स्थल, निकट भविष्य में ही, ‘जोशीमठ’ बन जाने वाले हैं.
‘बडख़ल मोड़’ मेट्रो स्टेशन से, बडख़ल झील जाने वाली सडक़ पर, सेक्टर 21 सी और डी की विभाजन रेखा पर, अनखीर पुलिस चौकी से अनखीर गाँव शुरू हो जाता है, जिसका आखरी सिरा, बडख़ल झील और इससे अगले गाँव, बडख़ल से मिला हुआ है. चूँकि, ये गाँव और अरावली जंगल एक दूसरे से मिले हुए हैं, इसलिए फऱीदाबाद नगर निगम के ‘अतिक्रमण हटाओ विभाग’ जिसे ‘गऱीब सताओ विभाग’ कहना ज्यादा सही होगा, अधिकारी, ‘उगाही’ करने के मक़सद से, अक्सर इस गाँव के दौरे करते रहते हैं. चूँकि, हरियाणा शहरी विकास निगम द्वारा बसाए किसी भी सेक्टर में, मज़दूर, एक कमरा भी किराए पर लेने लायक़ नहीं बचे और किसी भी शहर के, किसी भी इलाक़े में, एक बाथ रूम तक का निर्माण ‘क़ानूनी’ तरीक़े से करने लायक़ नहीं बचे जिसे वे अपना वैध घर कह सकें, इसलिए शहरों में समा गए गाँव, मज़दूर बस्तियां बन गए हैं. अनखीर गाँव भी ऐसी ही एक मज़दूर बस्ती बन चुका है.
2011 के बाद से जनगणना नहीं हुई है, लेकिन आधार कार्ड विभाग की मदद से हरियाणा सरकार ने 2020 में जनसंख्या के जो आंकड़े तैयार किए हैं उनके अनुसार, अनखीर गाँव की आबादी 9608 है; 5133 पुरुष और 4475 महिलाऐं. गाँव का कुल क्षेत्रफल 1.74 वर्ग किमी है. चूँकि आधार कार्ड प्रक्रिया में विस्थापित मज़दूरों की शुमार नहीं हो पाती, इसलिए वास्तविक आबादी, इससे कहीं अधिक होगी. अनखीर गाँव की एक और बहुत सुखद खासियत है. गाँव में वैसे तो गूजर जाति के लोग अधिक हैं, लेकिन दलित समाज, यहाँ जातिगत उत्पीडऩ का शिकार नहीं है. सभी जाति के लोग आत्म सम्मान के साथ रहते हैं. गाँव में सामाजिक गैर-बराबरी का माहौल भी नहीं है, सभी इकट्ठे रहते हैं. गाँव में ही जन्मे, एक प्रतिष्ठित कॉलेज प्रोफ़ेसर, लेफ्टिनेंट विमल गौतम, जो ‘विमल फरीदाबदी’ नाम से कविताएँ भी लिखते हैं, ने बहुत गर्व के साथ बताया कि हमारे गाँव में तो चुनावों में वोट भी, 90त्न एक ही उम्मीदवार को पड़ते हैं. हर चुनाव के पहले सभा होती है, उसमें तय होता है, किसे चुनना है.
यही वज़ह है कि गाँव में 27 दिसंबर को हुई एक बहुत दर्दनाक, बर्बर घटना, जिसमें एक युवक ने 7 साल की एक बच्ची के साथ बलात्कार कर, उसकी नृशंस हत्या कर दी थी, को याद कर, लोग गहरी साँस लेकर बोलते हैं कि इस घटना ने पूरे गाँव को शर्मसार किया है. वह महोबा से आकर, किराए के कमरे में रह रहे एक गऱीब की बच्ची नहीं, बल्कि पूरे गाँव की बच्ची थी. हमारे गाँव में ऐसा कभी नहीं हुआ. हत्यारे-बलात्कारी की जाति वाला भी कोई व्यक्ति, उसका अप्रत्यक्ष बचाव भी करता नजऱ नहीं आया. “ऐसे दुर्दांत अपराधी को जीने का कोई हक नहीं, उसे तो फांसी होनी चाहिए”, सभी लोग ये कहते ही सुनाई पड़े. और यही वज़ह है कि गाँव निवासी चमन गर्ग, जो गाँव में एक किराणा दुकान चलाते हैं, ख़ुद को भाजपा का जिला उपाध्यक्ष कहकर ही परिचय देते हैं, और आगामी नगर निगम चुनाव में पार्षद बनकर, अपनी राजनीतिक दुकान चमकाने की हसरत भी पाले हुए हैं, की उक्त बलात्कार व हत्या की वारदात के बाद, उस मासूम बच्ची को न्याय दिलाने की तहरीक़ में निभाई, शर्मनाक भूमिका पर बहुत गुस्से में हैं. सभी गाँव वाले एक ही बात बोलते हैं कि चमन गर्ग ने ऐसा क्यों किया?
27 दिसंबर को, मासूम बच्ची की नृशंस हत्या की दिल दहलाने वाली घटना के बाद, क्रांतिकारी मज़दुर मोर्चा, फऱीदाबाद ने निर्णय लिया कि मासूम को न्याय दिलाने के लिए गाँव के सभी लोगों से मिला जाएगा. मुक़दमा फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में चले, गऱीब मज़दूर के घर दो वक़्त की रोटी की भी व्यवस्था नहीं है, उसे आर्थिक सहायता मिले, बाक़ी शहर की तरह ही अनखीर गाँव में भी नशाखोर बेख़ौफ़ घूमते हैं, उनपर पुलिस की सख्ती हो, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढाओ’ चिल्लाने और उसे हर जगह लिखवाने वाली सरकार महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करे, गाँव की सडक़ें टूटी हुई हैं, सीवर बहता रहता है, स्ट्रीट लाइट का पता नहीं, शाम से ही गलियों में अँधेरा छा जाता है, सरकार स्मार्ट सिटी फऱीदाबाद की ‘स्मार्टनेस’ इधर भी आने दे आदि मांगों को लेकर, सभी गाँव वालों को साथ लेकर, 2 जनवरी को डी सी को एक ज्ञापन दिया जाए.
पम्फलेट बाँटने की मुहीम में, चमन गर्ग, बिना बुलाए और बिना उसे पढ़े, आगे-आगे हो गए. गाँव के सभी लोगों को 2 जनवरी के मोर्चे में ज़रूर आना है, कहते हुए उन्होंने उस तहरीक़ को ही एक तरह हाईजैक कर लिया था. रात को बडख़ल विधानसभा क्षेत्र भाजपा की आपातकालीन मीटिंग में विचार-विमर्श हुआ, कि गाँव में अगर क्रांतिकारी राजनीति अपनी जड़ें जमा गई, तो हमारे, ‘हिन्दू ख़तरे में हैं, उन्हें बचाने के लिए भाजपा को वोट दो, वाला हिन्दू-मुस्लिम एजेंडे का क्या होगा? वो खेल अगर चौपट हो गया तो हमारे पास रह ही क्या जाएगा? इसलिए वे, 2 जनवरी को, तडक़े से ही घर-घर जाकर लोगों को उल्टा पाठ पढ़ाने में लग गए. मोर्चे में किसी को भी नहीं जाना है, ये लोग तो भाजपा-संघ-विरोधी हैं. यहाँ तक कि जब पीडि़त परिवार की महिला, अपने पड़ौस की 10 महिलाओं को लेकर निकल पड़ीं, तो वे उस महिला को डरा-धमकाकर अपनी गाड़ी में बैठा लाए.
इस मामले में विजेंद्र सिंह, उनकी पत्नी पूनम और उनकी माता जी का उल्लेख किए बगैर, ये रिपोर्ट मुकम्मल नहीं हो सकती. पीडि़त गऱीब परिवार, उन्हीं के मकान में, किराए पर रहता है. उन्होंने ही, सबसे पहले, दर्द से टूट चुके परिवार का दु:ख बांटा, कई दिन तक उनके खाने की व्यवस्था की और चमन गर्ग के विरोध के बावजूद, पीडि़त महिला के साथ डी सी कार्यालय चलने का साहस दिखाया. ‘आप वाल्मीकि परिवार से हैं, जो लोग आपको जाने से रोक रहे थे, वे आपको तंग करेंगे तो क्या करेंगे?’ “हमसे पंगा लेने की हिमाक़त कोई नहीं कर सकता, सब अच्छी तरह जानते हैं, चमन गर्ग कौन होता है हमें सिखाने वाला”, घर की महिलाओं द्वारा एक स्वर में दिए गए जवाब ने दिल खुश कर दिया.
संसदीय राजनीति के मामले में, अनखीर, एक कांग्रेसी गाँव माना जाता है क्योंकि लम्बे समय तक हरियाणा की राजनीति में अपना दबदबा रखने वाले, पहले गूजर कांग्रेसी नेता, महेन्द्र प्रताप सिंह, बडख़ल विधान सभा से ही चुने जाते रहे हैं. 2014 में शुरू हुए मोदी-शाह-काल के भाजपाई बवंडर के बाद से, कांग्रेसी मायूसी की अवस्था में हैं. फ़ासिस्ट भाजपा का पलड़ा, बुर्जुआ राजनीति में इतना झुक गया है कि कई कांग्रेसी उसकी तरफ़ खिसकते जा रहे हैं. आज यहाँ, पार्षद, विधायक, सांसद सब भाजपा के हैं. मतलब ‘मोदीय विकास’ के लिए आवश्यक डबल इंजन की जगह, ट्रिपल इंजन की सरकार है. विकास का लेकिन ये हाल है कि गाँव में सार्वजनिक शौचालय नहीं, डिस्पेंसरी नहीं, सडक़ों और उनपर मौजूद असंख्य गड्ढों में भरे सीवर की ये हालत है कि चलना मुश्किल है. सडक़ों पर अँधेरा छाया रहता है और नशाखोर बेख़ौफ़ हैं. एक सरकारी स्कूल ज़रूर है, जो कांग्रेस के शासन में बना था.
जिसमें आज पढ़ाने को शिक्षक नहीं है। गऱीब मज़दूर, जिनके घर शौचालय नहीं हैं, हर रोज़ सुबह-सुबह, हाथ में पानी की बोतल/ डिब्बे लेकर अरावली की सैर करने को मज़बूर हैं. अधिकतर जगह सडक़ें टूटी पड़ी हैं जिसकी वज़ह, गाँव वालों ने, ये बताई कि नगर निगम की सीवर लाइन तो बीसियों वर्ष पहले बन चुकी थी। जो उदघाटनों के बावजूद भी अभी तक चालू नहीं है। एक ही जगह अटकी हुई क्यों है? इन सवालों का जवाब ये मिला, ‘आप तो जानते ही हैं जी, कि नगर निगम के चुनाव फऱवरी में संभावित हैं, और ‘भाजपाई विकास’, चुनाव से हफ्ताभर पहले ही होता हुआ नजऱ आता है, वरना वो बासी हो जाएगा!!’ चुनाव घोषित हों, तो विकास परवान चढ़े!! ‘हिन्दू ख़तरे में हैं, इसलिए भाजपा को वोट दो’, चुनाव से पहले वाले, लोगों को मज़हबी ख़ुमारी चढाने वाली भाजपाई परियोजना के सन्दर्भ में, सरकार ने हिन्दुओं के सशक्तिकरण के लिए कुछ क़दम उठाए क्या? ‘9 साल से वे सत्ता के मज़े लूट रहे हैं, अडानी दुनिया का दूसरे नंबर का अमीर बन गया, हो गया हिन्दू सशक्तिकरण!! मंहगाई, बेरोजग़ारी से उन्हें क्या मतलब? 2024 से पहले फिर डुगडुगी बजानी शुरू हो जाएगी!!’, चौपाल पर हुक्का गुडग़ुड़ाते हुए, गाँव के एक चौधरी ने देश की वर्तमान फासिस्ट राजनीति का सार-तत्व ही उजागर कर दिया.
सबसे तक़लीफदेह होता है किसी भी बहाने सडक़ खोदना और फिर उसे उसी हालत में छोडक़र भूल जाना. गाँव में सीवर लाइन डलने का काम, पार्षद चुनाव का इंतज़ार ना करते हुए तत्काल शुरू हो, जल्दी से जल्दी पूरा हो, सेक्टरों की तरह गाँव की सभी सडक़ें सीमेंट की बनें, स्ट्रीट लाइट लगें और उनकी मरम्मत की व्यवस्था हो, सीसी टी वी कैमरे लगें जिससे अपराधियों को पकड़े जाने का खौफ हो, सार्वजनिक शौचालय बने, डिस्पेंसरी बने, पुस्तकालय और सामुदायिक भवन का निर्माण हो, अरावली अतिक्रमण के नाम पर गाँव वालों को सताना बंद किया जाए. अतिक्रमण को लेकर चिंतित नजऱ आने वाले नगर निगम अधिकारियों को मालूम है अतिक्रमण कहाँ है और कौन कर रहा है?? उनका नाम लेने की हिम्मत भी उनमें नहीं है. उनके सामने बुलडोजऱ एक इंच भी आगे नहीं बढ़ते. गाँव का यही घोषणा-पत्र है.