फरीदाबाद (म.मो.) 1960 के दशक में डाली गई सीवर लाइन को अब कंडम घोषित कर दिया गया है। शहर भर में जगह-जगह सीवर लाइन जाम रहने से गलियों में सड़ा हुआ सीवेज बहते देखा जा सकता है। उस वक्त डाली गई सीवर लाइन शहर के नियोजित विकास के अनुसार बनाई गई थी। उस वक्त के योजनाकारों को मालुम नहीं था कि शहर में असली आबादी से कहीं अधिक अवैध कब्जेधारियों की हो जायेगी। दो या तीन मंजिला मकानों की जगह पांच व छ: मंजिला मकान बन जायेंगे।
शहर को बसाने वाले योजनाकारों ने जो सडक़ें 200-200 फुट चौड़ी रखी थी, वे अब 100 फीट की भी नहीं रह गई हैं। इसी तरह 100 फीट वाली 50 फीट भी नहीं बची। इसी के चलते सडक़ों पर जाम रहता है। यही स्थिति सीवर लाइन के साथ भी बनी हुई है। यदि शहर का विकास योजनाबद्ध तरीके से किया जाये तो न सीवर जाम होते और न ही सडक़ें।
विदित है कि सीवर लाइन कोई 40-50 साल के लिये नहीं बनाई जाती। लंदन शहर की सीवर लाइन 150 वर्ष से भी अधिक पुरानी है और अगले 150 वर्ष तक भी उसका कुछ बिगड़ता नजर नहीं आ रहा। यहां एनआईटी की बात तो छोडिय़े, नवनिर्मित ‘हूडा’ सेक्टरों की सीवर लाइन का भी बुरा हाल है। कारण एक ही है, इन्तहा दर्जे का भ्रष्टाचार।
छोटी व बड़ी सीवर लाइनों के जरिये सीवेज को डिस्पोजल तक पहुंचाया जाता है। वहीं पर एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) लगाये गये हैं। वास्तव में न तो डिस्पोजल तक पूरा सीवेज पहुंच पाता है और न ही एसटीपी ढंग से काम कर पाते हैं। लिहाजा अधिकांश सीवेज गलियों में बहता देखा जा सकता है।
इस समस्या के उपाय के तौर पर नई व्यवस्था में सीवेज को डिस्पोजल व बड़े एसटीपी तक ले जाने की अपेक्षा गली-मुहल्लों के आस-पास ही पार्कों में छोटे एसटीपी लगा कर पानी को वहीं पार्कों में छोड़ दिया जायेगा। जो लोग नगर निगम, ‘हूडा’ अथवा एफएमडीए वालों की दक्षता एवं कार्यकुशलता से परिचित हैं, वे समझ सकते हैं कि छोटे एसटीपी कैसा काम करेंगे और गली-मुहल्ले किस तरह से सड़ा करेंगे। बहरहाल जो होना होगा वो होगा लेकिन 160 करोड़ के बजट से तमाम अधिकारियों व कर्मचारियों के वारे-न्यारे जरूर हो जायेंगे।
विष्णु नागर