फेकल्टी यानी छात्रों को पढ़ाने वाले व मरीज़ों का इलाज करने वाले वरिष्ठ डॉक्टरों की नियुक्ति जिस संस्थान में होती है, वह उस संस्थान के साथ जुडक़र न केवल पढ़ाने व इलाज करने का काम करते हैं बल्कि खुद भी पढऩे व रिसर्च करने का काम भी करते हैं। इसके लिये उन्हें स्थायित्व की आवश्यकता होती है। संस्थान की प्रयोगशालाओं में उनके तरह-तरह के प्रोजेक्ट चलते रहते हैं। इनके रिसर्च पेपर अंतर्राष्ट्रीय मेडिकल जर्नल्स में छपते रहते हैं। फरीदाबाद के अनेकों डॉक्टरों के पेपर लैनसेट नामक अति प्रतिष्ठित ब्रिटिश जर्नल में प्रकाशित हो चुके हैं और कई पाइप लाइन में हैं।
इन प्रोफेसरों के काम-काज, मेहनत व लगन को देखते हुए आईसीएमआर जैसे अनेकों संगठनों ने इस कॉलेज को कई प्रोजेक्ट दे रखे हैं। इन प्रोजेक्टों के लिये ईएसआई को कुछ खर्च नहीं करना पड़ता बल्कि बाहर से आने वाला पैसा कॉलेज एवं अस्पताल के बड़े काम आता है। फेकल्टी की लगन व मेहनत को देखते हुए ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इन्डिया ने इस अस्पताल को न्यूरो सर्जरी शुरू करने के लिये दो करोड़ के उपकरण खरीद कर दिये हैं, जिससे खबर लिखे जाने तक यहां पांच मरीज़ों की कामयाब न्यूरो सर्जरी हो चुकी है जबकि इस विभाग का उद्घाटन होना अभी बाकी है। इसी तरह सेफ इन्डिया नामक एनजीओ व एचडीएफसी के द्वारा भी इस अस्पताल को करोड़ों रुपये के अल्ट्रासाऊंड मशीन व एक्सरे आदि के उपकरण उपहार स्वरूप दिये गये हैं। विदित है कि कम्पनियों द्वारा यह पैसा अपने सीएसआर फंड से दिया जाता है।
इन्हीं उपकरणों के बदौलत अब यहां बोन मैरो ट्रांस्प्लांटेशन के भी 15 केस सफलतापूर्वक कर लिये गये हैं। इसे कैंसर का सबसे घातक रोग समझा जाता है। इसके लिये व्यापारिक अस्पताल 30 से 50 लाख तक कुछ भी वसूल सकते हैं। ईएसआई कॉर्पोरेशन खर्चा बचाने के चक्कर में ऐसे मरीजों को रैफर न करके मरने के लिये छोड़ दिया करती थी।
संस्थान के डीन डॉक्टर असीम दास के कुशल एवं सहयोगपूर्ण नेतृत्व में सारी फेकल्टी, तमाम अड़चनों के बावजूद न केवल बेहतरीन सेवायें देने का प्रयास कर रहे हैं बल्कि सेवाओं का विस्तार भी कर रहे हैं। इसी विस्तार में ह्दय रोग निदान के लिये कैथलैब भी यहां लगा दी गई है। इसके द्वारा अब तक 120 से अधिक ह्दय रोगियों का सफलतापूर्वक इलाज किया जा चुका है। अजब-गजब बात तो यह है कि बढ़ती सेवाओं के लिये प्रोत्साहित करने की अपेक्षा मुख्यालय में बैठे दीपक शर्मा जैसे निकृष्ट अधिकारी इस अस्पताल को आवश्यक तकनीकी एवं नर्सिंग स्टाफ तक उपलब्ध नहीं होने दे रहे हैं।
दीपक शर्मा को इस बात का कतई ज्ञान नहीं है कि यदि उन्होंने फेकल्टी के साथ उठा-पटक की तो उनका तो कुछ बिगडऩे वाला है नहीं, लेकिन इस अस्पताल का जरूर सत्यानाश हो जायेगा। यह भी बसई दारापुर की तरह 50 प्रतिशत पर आ जायेगा। विदित है कि यहां मौजूद बेहतरीन एवं समर्पित फेकल्टी की मार्केट में बहुत मांग है। फेकल्टी वाले यहां नहीं तो कहीं और कमा कर खा लेंगे।