1946-47 में जब भारत औपनिवेशिक शासन की बेडिय़ों में जकड़ा हुआ था, तब यहां की औसत जीवन प्रत्याशी महज 31 वर्ष थी, गरीबी, कुपोषण, संक्रामक रोगों का प्रकोप, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और अपर्याप्त स्वच्छता व्यवस्था ने देश की जनता को असमय मौत के मुंह में धकेल दिया था। शिशु मृत्यु दर 180 प्रति हजार से अधिक थी और मलेरिया, हैजा, तपेदिक जैसी बीमारियां महामारी का रूप धारण किए हुई थीं। यह वह दौर था जब एक भारतीय की औसत उम्र विकसित देशों की तुलना में आधी से भी कम थी, और स्वास्थ्य के मामले में राष्ट्र एक गहरे संकट में फंसा था
स्वतंत्रता के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में सार्वजनिक स्वास्थ्य को राष्ट्र निर्माण की प्राथमिकता बनाया गया। नेहरू ने स्वास्थ्य अवसंरचना के निर्माण, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसे चिकित्सा संस्थानों की स्थापना, टीकाकरण कार्यक्रमों का विस्तार और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों के विकास पर विशेष ध्यान दिया। उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम, चेचक नियंत्रण अभियान और परिवार नियोजन पहलों की नींव रखी गई। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप 1950 के दशक में जीवन प्रत्याशा बढ़कर 37 वर्ष और 1960 के दशक में 41-43 वर्ष तक पहुंच गई, जो कि डेढ़ दशक में लगभग 10-12 वर्षों की वृद्धि थी, और साथ ही शिशु मृत्यु दर में काफी कमी आए , इस उल्लेखनीय परिवर्तन ने आगामी दशकों में भारत की स्वास्थ्य क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया जब नेहरू राष्ट्र निर्माण कर रहे थे या कोशिश कर रहे थे उस समय एक संगठन सीआईए के सपोर्ट ले रहा था यही है विडंबना और दोषी तो नेहरू ही हैं आज हर गलती के, धन्यवाद उन धूर्तो को जिन्होंने नेहरू को कोस कोस कर पुनर्जीवित कर दिया वरना कांग्रेस ने उन्हें बाल दिवस तक समेट ही दिया था।