फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) एनआईटी में नई सीवर लाइन का टेंडर हड़पने के लिए फर्जीवाड़ा करने वाले सत्ता के लाडले ठेकेदारों के खिलाफ की गई शिकायत पर एसजीएम नगर पुलिस डेढ़ महीने बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं कर सकी है। निगमायुक्त मोना ए श्रीनिवास ने टेंडर में फर्जीवाड़ा करने वाले दो ठेका एजेंसियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था लेकिन जांच में केंद्रीय मंत्री गूजर का भ्रष्ट ‘बेटा’ एक्सईएन ओमदत्त के साथ ही सत्ता के चहेते ठेकेदार फंस रहे थे। यही कारण है कि निगमायुक्त के पत्र पर तुरंत एफआईआर दर्ज करने कर जांच शुरू करने के बजाय पुलिस भी पत्राचार कर सुबूत मांग रही है। बताया जा रहा है कि पुलिस पर सत्ता का दबाव होने के साथ ही ठेकेदार भी सौदेबाजी कर मामला सुलटवाने के प्रयास में लगे हैं, इसीलिए पुलिस ने जांच ही ठंडे बस्ते में डाल रखी है।
पूर्व सीएम खट्टर ने 2015 में एनआईटी एक, दो, तीन और पांच में नई सीवर लाइन डालने का ढोल पीटा था। सीवर लाइन तो डाली नहीं गई लेकिन निगम के भ्रष्ट अधिकारियों ने इसके नाम पर लूट कमाई की तैयारियां कर डाली थीं। खट्टर द्वारा ढिंढोरा पीटने के सात साल बाद इस प्रोजेक्ट की डीपीआर तैयार की गई। इसके तहत 158 करोड़ रुपये से एनआईटी इलाकों में नई सीवर लाइन डाली जानी थीं। नगर निगम के भ्रष्टतम एक्सईएन और कृष्णपाल को अपना पिता बताने वाले ओमदत्त ने मोटी कमाई की संभावनाएं देख यह प्रोजेक्ट लपक लिया था। बताया जाता है कि उसे यह प्रोजेक्ट भी मंत्री के इशारे पर इसलिए दिया गया था ताकि वह इसका टेंडर सत्ता के चहेते ठेकेदारों को किसी भी कीमत पर दिला दे।
अन्य ठेकेदारों को टेंडर प्रक्रिया से बाहर करने के लिए ऑनलाइन बिड प्रक्रिया में फॉर्म अपलोड करने के विकल्प समाप्त करने, बिड ब्लॉक करने, गलत शीर्षक से गुमराह करने की कला में ओमदत्त माहिर है। उस पर सागर गर्ग नामक व्यक्ति की डीपी इंडिया, सहित अन्य दो कंपनियों को ठेका देने के लिए ऑनलाइन टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी करने का आरोप भी लग चुका है। 158 करोड़ का ठेका भी सत्ता और मंत्री के चहेते ठेकेदार को दिलाने के लिए ओमदत्त ने टेंडर प्रक्रिया में खेल कर दिया। बताया जाता है उससे मिलीभगत कर दो एजेंसियों ने फर्जी दस्तावेज और फर्जी डिजिटल हस्ताक्षर लगाकर टेंडर डाल दिए।
क्योंकि घोषणा ढिंढोरेबाज खट्टर ने की थी इसलिए हवा हवाई ही साबित हुई। डीपीआर तो पास हो गई लेकिन बजट जारी नहीं किया गया, इसलिए टेंडर प्रक्रिया सिरे नहीं चढ़ सकी। इधर, टेंडर डालने वाली अन्य एजेंसियों ने फर्जीवाड़ा देखा तो निगमायुक्त से इसकी शिकायत की गई थी। प्रदेश में सत्ता नायब सिंह सैनी के हाथ आई और महकमे का मंत्री सुभाष सुधा बने तो उन्होंने भी कमाई के रास्ते खोजने शुरू कर दिए। निगम में ओमदत्त के कारनामे देखे तो निलंबन का आदेश जारी करने के साथ ही एनआईटी सीवर मामले में फर्जीवाड़ा करने वालों के खिलाफ एफआईआर करवाने का आदेश दिया था।
मंत्री के आदेश पर निगमायुक्त मोना ए श्रीनिवास ने गूजर के ‘बेटे’ ओमदत्त को बचाते हुए दो ठेका कंपनियों के खिलाफ फर्जी दस्तावेज लगाकर धोखाधड़ी करने का केस दर्ज करने को अगस्त के तीसरे सप्ताह में एसजीएम नगर थाने को पत्र लिख कर कर्तव्यों की इतिश्री कर ली थी। अगर पुलिस जांच शुरू करती तो फर्जीवाड़े में न केवल दो ठेकेदार एजेंसियां फंसतीं बल्कि उनके फर्जी दस्तावेज और डिजिटल हस्ताक्षर का ऑनलाइन टेंडर प्रक्रिया में अनुमोदन करने पर ओमदत्त भी फंसता। ठेकेदार एजेंसियां भी सत्तापक्ष की लाडली थीं तो पुलिस पर दबाव तो पडऩा ही था। निगमायुक्त जैसी अथॉरिटी के पत्र के बाद भी पुलिस ने कंपनियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के बजाय निगम अधिकारियों से सुबूत पेश करने को कहा। सुबूत और दस्तावेज एफआईआर दर्ज करने के बाद भी मांगे जा सकते थे लेकिन न तो निगम अधिकारी आज तक कोई दस्तावेज उपलब्ध करा सके और न ही पुलिस ने तफ़्तीश आगे बढ़ाई। सूत्रों के अनुसार पुलिस पर शिकायत ठंडे बस्ते में डालने का दबाव सत्तारूढ़ नेताओं का तो है ही, आरोपी ठेकेदार कंपनियों के नुमाइंदे जांच बंद करने के लिए पुलिस की मुट्ठी गर्म करने को तैयार हैं। जानकारों के अनुसार अब तो जांच होनी भी नहीं है, क्योंकि फार्मेसी काउंसिल में भ्रष्टाचार का आरोपी, खट्टर-गूजर का चहेता रिश्वतखोर धनेश अदलखा बडख़ल का विधायक बन गया है, ओमदत्त अदलखा का भी उसी तरह खास है जिस तरह मंत्री गूजर का। गूजर और धनेश की यारी किसी से छिपी नहीं है, ऐसे में जांच तो क्या होनी है लेकिन बडख़ल विधानसभा की जनता को नए भ्रष्टाचार और विकास के नाम पर ठगे जाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए क्योंकि भ्रष्ट ओमदत्त को अब पिता समान मंत्री गूजर के साथ ही हरामाखोरी के उस्ताद धनेश अदलखा का साथ भी मिल गया है।