फरीदाबाद (म.मो.) वे सरकारें और वे नेता अब नहीं रहे जो प्रदर्शन, भूख हड़ताल एवं मरणव्रत के द्वारा प्रदर्शित जन आक्रोश का संज्ञान लेकर यथोचित कार्रवाई किया करते थे। अब तो नेतागण पूरी बेशर्मीके साथ डंके की चोट पर कहने से नहीं लजाते कि उन्हें जनता ने पांच साल के लिये चुन कर खुला खाने व नंगा नहाने का लाइसेंस दिया है, जिसे पाने के लिये उन्होंने चुनाव में करोड़ों-अरबों रुपये खर्च किये हैं। जब तक वे सत्ता में रहेंगे ऐसे ही लूट मचाते रहेंगे, किसी की नहीं सुनेंगे। ऐसे माहौल में भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ रहे युवा आगाज़ के तमाम साथियों को ‘मज़दूर मोर्चा’ का सलाम।
जसवंत द्वारा खून से लिखा खत उनकी कुर्बानी के जज्बे को तो अवश्य ही दर्शाता है लेकिन जिन सैयादों को वे लिख रहे हैं उनसे कोई बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिये। न केवल हरियाणा में बल्कि पूरे देशभर में जनता के धन की जो खुली लूट हो रही है, वह सब राजनेताओं की मर्जी एवं संरक्षण में हो रही है। लूट चाहे शिक्षा विभाग में हो या नगर निगम, या स्वास्थ्य विभाग या कोई भी महकमा, सब का बही-खाता सदैव राजनेताओं के पास रहता है। लूट के इसी पैसे से सत्तारूढ़ पार्टी के खजाने में हजारों करोड़ का चंदा आता है। हर जगह पार्टी के पंचतारा दफ्तर बनते जा रहे हैं। यहां भी ऐसा ही एक दफ्दर पिछले दिनों बना है।
डीईओ मुनीष चौधरी पर लगे गबन के आरोप बड़े ही स्पष्ट हैं। सरकारी खजाने से, सरकारी काम के लिये एक चेक आता है जो सीधे ही मुनीष चौधरी के खाते में चला गया। मामला बेशक 15 साल पुराना है, लेकिन पुराना होने से गबन का मामला समाप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि वे तमाम अधिकारी भी दोषी बनते हैं जिन्होंने उस वक्त न तो स्वत: इस मामले का संज्ञान लिया और न ही शिकायत मिलने पर यथोचित कार्रवाई की। मामले को इधर-उधर भटका कर दबाने का प्रयास जरूर किया।
यह कहना बिल्कुल गलत साबित हो रहा है कि कानून सब के लिये बराबर है। वास्तव में कानून मकड़ी के उस जाले के समान बना दिया गया है जिसमें छोटे-मोटे मच्छर-मक्खी तो फस कर अपनी जान गंवा देते हैं और शक्तिशाली जानवर उसे तोड़ कर निकल जाता है। संदर्भवश हरियाणा फार्मास्यूटिकल के चेयरमैन धनेश अधलक्खा भ्रष्टाचार के तमाम सबूतों के साथ पकड़े जाने के बावजूद विजिलेंस द्वारा निदोर्ष करार दे दिया गया। स्थानीय सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर ने अधलक्खा को ईमानदारी का प्रमाणपत्र देते हुए कहा था कि बतौर पार्षद उसने कभी किसी से दो रुपये तक भी नहीं लिये।
एफआईआर दर्ज किये जाने के बारे में धनेश के वक्त तथा अब मुनीष चौधरी के वक्त भी ये मंत्री महोदय फर्माते हैं कि एफआईआर दर्ज होने से कोई दोषी थोड़े ही हो जाता है।एफआईआर तो कोई भी किसी के भी, बल्कि मेरे विरुद्ध भी कराई जा सकती है। यह सरासर झूठ है। जनता जानती है कि एफआईआर कैसे दर्ज होती है और उसके बाद पुलिस क्या-क्या खेल खेलती है। 14 अगस्त 2019 को डीसीपी विक्रम कपूर आत्महत्या केस में ‘मज़दूर मोर्चा’ सम्पादक सतीश कुमार का नाम भी बिना किसी वजह के ही एफआईआर में डाल दिया गया था। उसके बाद उनके घर दो बार तलाशियां हुई, उनके न मिलने पर उनके छोटे बेटे को उठा कर ले गये। जब तीन सप्ताह बाद हाईकोर्ट से वे जमानत ले कर आये तो तफ्तीश में कुछ भी नहीं मिला। यही कृष्णपाल उस वक्त भी मंत्री थे।
युवा आगाज़ के संघर्षरत साथियों को समझने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार करना बल्कि जनता के धन को लूटना केवल तभी जुर्म बनता है जब लाभार्थी सत्तारूढ गिरोह का सदस्य न हो। यानी कि सत्तारूढ गिरोह के न केवल सदस्यों बल्कि उनके लगुओं-भगुओं तथा चाटूकारों को भी पूरी छूट है। उन्हें लूटने के तमाम सुअवसर उपलब्ध कराये जाते हैं।
मुनीष चौधरी के समर्थन में मंत्री कृष्णपाल, तीन विधायक तथा खट्टर के कलेक्शन एजेंट अजय गौड़ का पूरा समर्थन है। ऐसे में धनेश अधलक्खा की तरह मुनीष के लिये भी कानून यदि मकड़ी का जाला साबित हो जाय तो कोई बड़ी बात नहीं।