फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) । ढिंढोरेबाज भाजपाइयों के गले की फांस बन चुके मंझावली पुल के कारण पिछले दस साल से केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर बेइज्जत होते रहे, फिर राज्य सरकार में पहली बार मंत्री राजेश नागर ने इसके नाम पर खूब जग हंसाई कराई। बार बार बेइज्जत होकर मंझावली पुल का नाम जिंदा रखने का काम अब राजनेताओं के चापलूस अधिकारियों ने अपने जिम्मे ले लिया है। अधिकारी से सरकारी भोंपू बन चुके पीडब्ल्यूडी के एक्जीक्यूटिव इंजीनियर प्रकाश लाल ने मार्च में मंझावली पुल शुरू होने का झूठ परोसा है।
उनके झूठ का खुलासा ग्रेटर नोएडा के अपर जिलाधिकारी, भू-आधिपत्य बच्चू सिंह ने यह जानकारी देते हुए किया कि मंझावली पुल की अप्रोच रोड बनाने के लिए अधिग्रहण की जाने वाली जमीन के लिए प्रदेश सरकार ने 25 करोड़ 62 लाख रुपये का बजट मंजूर किया है। बजट जारी होने के बाद ही ग्रेटर नोएडा के मुरशदपुर, अफजलपुर, जगनपुर और अट्टा गुजरान गांवों के चालीस किसानों से आवश्यक 68 हजार वर्ग गज जमीन खरीदी जाएगी, इसके लिए बीते सोमवार को कैंप भी लगाया गया, बताया जाता है कि अभी सभी किसानों से जमीन की खरीद नहीं हो पाई है। जमीन खरीद होने के बाद यूपी के लोक निर्माण विभाग को इसके निर्माण का जिम्मा सौंपा जाएगा।
यानी कि उत्तर प्रदेश में हाल- फिलहाल मंझावली पुल की कनेक्टिविटी के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। इसके अलाव अभी हरियाणा छोर पर मंझावली पुल को कनेक्ट करने वाली बीस किलोमीटर लंबी सड़क के चौड़ीकरण और निर्माण का काम भी अधूरा पड़ा है जो मार्च तक पूरा होता नजर नहीं आ रहा। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश छोर पर जमीन अधिग्रहण और कब्जे के बाद, सड़क की डीपीआर, डिजायन तैयार करनें में ही मार्च बीत जाएगा। यदि बहुत तेज गति से भी काम किया गया तो भी अच्छी सड़क बनाने में कम से कम चार महीने तो लगने ही वाले हैं, हां अगर लूट कमाई, कमीशनखोरी और दिखावे के लिए बनाई जानी है तो फिर कभी भी तैयार हो सकती है। फिर भी मार्च में मंझावली पुल शुरू होता नजर नहीं आ रहा।
संदर्भवश, समझने वाली बात यह है कि पुल निर्माण के वक्त भाजपा नेताओं द्वारा जनता को होने वाले जिन लाभों का जिक्र किया था वे न मिलने से जनता को कितना भारी नुकसान हो रहा है, लंबी चौड़ी भाषणबाजियों में बताया गया था गुडग़ांवां से, फरीदाबाद से नोएडा जाने वालों को सीधे इस पुल के द्वारा गुजरने से समय व पेट्रोल की कितनी बचत होने वाली है। मौजूदा दिल्ली होकर जाने वाले रूट पर जाम से भी मुक्ति मिलेगी जिससे प्रदूषण भी घटेगा। लेकिन पतनाला आज भी वहीं का वहीं गिर रहा है। समझने वाली बात यह है कि केंद्र, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में बीते करीब ग्यारह साल से भाजपा की डबल इंजन सरकारें हैं। मंझावली पुल का शिलान्यास भी इन तीनों ही सरकारों के पहले कार्यकाल में रखा गया लेकिन भाजपाइयों की नीयत इस पुल को बनवाने से ज्यादा इसके नाम पर वोट बटोरने वाली ही रही। अगर नीयत सही होती तो जुमलाजीवी मोदी, नफरती योगी और संघी कठपुतली खट्टर मिल कर पुल में आने वाली सारी बाधाएं दूर करते लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दस साल तक हरामखोरी का नतीजा यह हुआ कि जनता ने भाजपा को केंद्र में बहुमत नहीं दिया तो उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भाजपा को किस तरह अप्रत्याशित रूप से जीत हासिल हुई, जनता से छिपा नहीं है। नफरती राजनीति करने वालों को भी समझ में आने लगा है कि जनता उन्हें नकारने लगी है, इसी मजबूरी में मंझावली पुल बनवाया जा रहा है, ताकि जनता के सामने कुछ तो सकारात्मक पेश किया जा सके।
राजनीतिक मामलों के जानकार कहते हैं कि अब भाजपा नेता मंझावली पुल का नाम लेने में शर्म महसूस करने लगे हैं लेकिन क्योंकि स्थानीय निकाय चुनाव सर पर हैं तो जनता को एक बार फिर मूर्ख बनाने के लिए अधिकारियों के जरिए झूठ बुलवाया जा रहा है। प्रशासन में बैठे संघ-भाजपा के कठपुतली एक्सईएन प्रकाश लाल जैसे अधिकारी सब कुछ जानते हुए भी जोर शोर से यह झूठ मीडिया के जरिए जनता को परोसने को मजबूर हैं। मंझावली पुल जब बनेगा तब बनेगा, देखना यह है कि स्थानीय निकाय चुनाव में जनता अंधभक्तों की तरह संघी-भाजपाइयों के झांसे में आती है या दस साल की नाकामियों पर सवाल उठा कर उन्हें वोट के जरिए सबक सिखाती है।