फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) नायब सिंह सैनी सरकार के मंत्रिमंडल में पूर्व मंत्री विपुल गोयल को कैबिनेट मंत्री और तिगांव से दूसरी बार निर्वाचित राजेश नागर को राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाया गया है।
सर्वविदित है कि केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर विपुल गोयल और राजेश नागर को अपनी सत्ता के लिए खतरा समझते हुए दोनों से बड़ी दुश्मनी रखते हैं। विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई तो गूजर ने पहले सारी ताकत लगा दी थी कि इन दोनों को टिकट ही न मिल सके। बावजूद इसके जब पार्टी ने दोनों को टिकट दे दिया तो ये चुनाव न जीत सकें इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। दिखावे के लिए तो गूजर इन दोनों के नामांकन कार्यक्रम में शामिल भी हुए थे लेकिन इसके बाद इन दोनों के समर्थन में वह किसी जनसभा या कार्यक्रम में शामिल नही हुए। यह भी चर्चा रही थी कि गूजर ने तिगांव में अपने चेले ललित नागर को जिताने के लिए अंदरखाने अपनी खास टीम को भी लगाया था। फरीदाबाद में भी विपुल को हराने के लिए कृष्णपाल ने भरपूर प्रयास किए थे। कृष्णपाल की सारी कोशिशों और भितरघात के बावजूद ये दोनों प्रत्याशी वोटों के बड़े अंतर से जीते और मंत्री भी बन गए।
विदित है कि बीते दस साल से फरीदाबाद और पलवल क्षेत्र में केंद्रीय राज्यमंत्री कृष्णपाल इस तरह से चल रहे थे जैसे कि वे यहां के मुख्यमंत्री हों। कहा जाता है कि कृष्णपाल के दबाव के चलते खट्टर ने उन्हें पूरी तरह से बेलगाम छोड़ रखा था, समस्त जिला प्रशासन उनके इशारों पर नाचता रहा था इस दौरान किसी भी विधायक अथवा मंत्री की कोई भी हैसियत नहीं समझी जाती थी। इनकी मर्जी के बगैर जिला प्रशासन में पत्ता तक नहीं हिल पाता था। कई मामलों में तो राजेश नागर की अच्छी खासी फजीहत होती देखी गई थी, वे जिस काम को भी कराने के लिए प्रशासन पर दबाव डालते थे, कृष्णपाल के दबाव में उसका उल्टा ही होता रहा।
आज के हालात में जानकारों का मानना है कि हाईकमांड ने अब कृष्णपाल के पर कतरने की तैयारी पूरी कर ली है। इसका पहला सुबूत तो यह है कि उनके अनकहे दुश्मनों (राजेश नागर, विपुल गोयल) को न केवल टिकट दिए बल्कि मंत्री तक बना दिया। राजनीतिक भाषा में इसे हाईकमांड का एक इशारा समझा जाता है। सर्वविदित है कि जिला प्रशासन राज्य की सरकार द्वारा चलाया जाता है उसमें केंद्र सरकार का कतई कोई दखल नहीं रहता।
ऐसे में किसी भी केंद्रीय मंत्री का दखल केवल तब ही चल सकता है जब मुख्यमंत्री चाहे, लेकिन आज के हालात देख कर लगता नहीं कि खट्टर की भांति सैनी भी कृष्णपाल के सामने घुटने टेक देंगे। किसी भी मुख्यमंत्री के लिए उसके विधायक महत्वपूर्ण होते हैं न कि केंद्रीय मंत्री, ऐसे में क्षेत्र के इन दोनों मंत्रियों के सामने कृष्णपाल की दादागीरी चलने के कोई आसार नजऱ नहीं आते। जाहिर है ऐसे में उन लोगों के कुछ अच्छे दिन आ सकते हैं जिन्हें कृष्णपाल व उसके गुंडों ने जमकर प्रताडि़त किया था।