फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) मीडिया और अखबारों के जरिए जनता को विकास के हसीन ख्वाब दिखाने वाले नगर निगम और एफएमडीए के अधिकारी लूट कमाई के लिए इस तरह की योजनाएं बना रहे हैं कि सवाल होने पर दूसरे विभाग का दायित्व होना बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। यानी कमाई हमारी लेकिन जिम्मेदारी नहीं। शहर की बदतरीन सीवरेज प्रणाली इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। एफएमडीए के पास 300 एमएम या उससे अधिक की सीवर लाइन हैं तो इससे छोटी नगर निगम के पास। दोनों ही विभागों के हरामखोर अधिकारी सीवर लाइन सफाई का दिखावा कर करोड़ों रुपये के बिल फाड़ते हैं। काम तो कुछ होता नहीं जब सीवर चोक होते हैं तो नगर निगम वाले कहते हैं कि हमारी लाइनें साफ हैं, एफएमडीए वालों के कारण समस्या है। इसी तरह एफएमडीए वाले कहते हैं कि नगर निगम के कारण सीवर लाइनें साफ नहीं हो पा रहीं। इन दोनों की कूकुर झौं झौं में समस्या जस की तस बनी हुई है और धृतराष्ट्र की तरह आंखें बंद किए हुए सरकार बस जुगाली करती है।
इसी तरह तीस मीटर चौड़ी सड़क का जिम्मा एफएमडीए के पास है। यहां चालाकी यह है कि एफएमडीए सेंट्रल वर्ज से दोनों ओर 15-15 मीटर सड़क पर ही काम करेगा। यानी पंद्रह मीटर के बाद आने वाला फुटपाथ, ग्रीन बेल्ट, नाली आदि सब नगर निगम के जिम्मे। यहां भी यही खेल होता है कि दोनों विभाग सड़क निर्माण, मरम्मत, ग्रीन बेल्ट, इंटर लॉकिंग के नाम पर मोटे मोटे बिल बनाते हैं लेकिन जिम्मेदारी आने पर एक दूसरे के सिर ठीकरा फोड़ा जाता है। शहर के डिस्पोजल चलाने का काम नगर निगम ने सात करोड़ में ठेके पर दे रखा था। जिससे सरकार संतुष्ट नहीं थी, सरकार तो क्या कोई भी संतुष्ट नहीं था। बेहतर काम करने के नाम पर इसे एफएमडीए को सौंप दिया गया। एफएमडीए के मुताबिक पुराना ठेकेदार नालायक, काहिल और निकम्मा था, उसके बस में काम करना नहीं था, इसलिए यह ठेका किसी अन्य पार्टी को 21 करोड़ मेें दे दिया। इस नई पार्टी ने दस प्रतिशत कमीशन काट कर पुराने ठेकेदार को ही काम सौंप दिया। जाहिर है कि ठेके की इस बढ़ी हुई रकम को संबंधित अधिकारी, ठेकेदार और नेता डकार गए, और जल निकासी के हालात जनता के सामने मौजूद हैं। जल निकासी के नाम पर पहले सात करोड़ में जनता की ऐसी तैसी हो रही थी अब वही काम 21 करोड़ में हो रहा है।
अधिकार और उत्तरदायित्वों की घालमेल सिर्फ सड़क, सीवर, डिस्पोजल में ही नहीं है, पेजयल व्यवस्था, उद्यान, सौंदर्यीकरण, स्ट्रीट लाइट आदि हर शाखा में है। यही कारण है कि ज्यादा जोगी मठ उजाड़ वाली कहावत प्रधानमंत्री मोदी की इस स्मार्ट सिटी में लागू है। जनता कूड़ा, करकट, जलभराव, प्रदूषण, पेयजल, सड़क, नाली-खड़ंजे की समस्याओं से जूझ रही है तो नगर निगम, एफएमडीए, स्मार्ट सिटी आदि में हवा हवाई विकास कार्यों के नाम पर करोड़ों की खुलेआम लूट हो रही है। सवाल उठने पर इन महकमों के अधिकारी दूसरे का अधिकार क्षेत्र बता कर खुद को अलग करने का खेल खेल रहे हैं।