शुभेंद्र त्यागी कातिक महीने की परबा है, शरद ऋतु. धूप अब मद्धिम सी पडऩे लगी है. ‘मेला लगे दिवारी की दौज, लांगुरिया’ गाते हुए विंध्यांचल के ‘बिकट पहाड़ों पर बैठी’