फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय मेला खत्म होते ही सात फरवरी को झूला टूटने की घटना की जांच भी लगता है ठंडे बस्ते में डाल दी गई है। घटना के बाद झूला मालिक मोहम्मद शाकिर और संचालक नितेश को पकड़ कर जेल भेज कर अधिकारियों ने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली थी। इस पूरे खेल में सबसे कमजोर प्राणी यही दो थे। जांच की दशा दिशा देखकर ही समझ आने लगा था कि उन अधिकारियों को बचाने की कवायद की जाएगी जो झूलों के सही सलामत चलाए जाने के जिम्मेदार थे।
घटना केे बाद डीसी ने एडीसी की अगुवाई में जांच कमेटी का गठन किया था और पुलिस ने एसआईटी गठित जांच शुरू करवाई थी। संदर्भवश, बता दें कि उसी एडीसी को जांच सौंपी गई जो इन झूलों के सही संचालन की कमेटी का मुखिया था, यानी दोषी को ही जांच सौंप दी गई। प्रशासन की नीयत कितनी साफ है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि झूला टूटने के तकनीकी कारण तलाशने के बजाय आनन फानन झूला ही घटनास्थल से हटवा कर सारे सुबूत ही खत्म कर दिए गए। यानी झूले में क्या क्या खामियां थीं इसका पता ही नहीं लगाया जा सकता, यानी ऐसा करने से उस टीम के सभी नौ सदस्यों की जान बचा ली गई जो रोजाना झूलों का निरीक्षण-परीक्षण कर उन्हें चलाने की एनओसी देते थे। झूला ही नहीं तो जांच क्या होगी।
एडीसी महोदय जांच के प्रति कितने गंभीर हैं इससे समझा जा सकता है कि मेला लगा रहने के दौरान कोई खास पड़ताल नहीं की गई, अब मेला खत्म हो चुका है, सारे सुबूत हटा दिए गए, गवाह भी इधर उधर हो गए तो जांच किस गति से होगी समझा जा सकता है। पुलिस की एसआईटी हाथ पर हाथ धरे बैठी है क्योंकि दोषी अधिकारी उसे वह दस्तावेज नहीं सौंप रहे जिनकी जांच होने पर वह गुनहगार साबित होंगे। क्या गज़ब है कि पुलिस गुनहगारों से ही उनके गुनाहों के सुबूत मांग रही है। वह भी ढीठ की तरह। पर्यटन विभाग के वो अधिकारी भी लपेटे में आते जिन्होंने मानक और कागजी कार्रवाई पूरे हुए बिना ही झूले संचालन की अनुमति दी थी। इससे बचने के लिए प्रशासन और पर्यटन विभाग एसआईटी को जांच में जरूरी दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं करा रहा। जांच तो पहले भी नहीं होनी थी, हादसे के बाद डैमेज कंट्रोल के लिए सिर्फ जांच कराने का नाटक किया गया था। दरअसल, अधिकारी भाजपाईयों की झूठ बोलने और जनता को वरगलाने वाली शैली ही फॉलो कर रहे हैं कि जांच की घोषणा कर मामले को इतना लटकाओ की जनता भूल जाए, उसके बाद सबको बरी कर दिया जाएगा।