मोदी-खट्टर-सैनी का विकास मॉडल मात्र लूट कमाई का साधन फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) मोदी की स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत पांच साल पहले शहर भर में लगाए 1200 सीसीटीवी कैमरों में से अधिकतर खराब हो चुके हैं। खराब तो होने ही थे, ये खरीदे और लगाए ही इसलिए गए थे कि खराब हों और लूट कमाई के लिए फिर करोड़ों का बजट बने। जो स्मार्ट सिटी अपनी लगाई स्ट्रीट लाइटें भी जला-बुझा नहीं सकती वो भला सीसीटीवी कैमरे क्या चलाएगी। उसे तो ये कैमरे बाजार दाम से कई गुणा अधिक कीमत पर खरीद कर अधिकारियों और नेताओं की जेबें भरनी थीं। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्मार्ट सिटी परियोजना जिसे खट्टर-सैनी जैसी भाजपा सरकारों द्वारा स्वतंत्रता के 75 वर्षों में देश के सौ शहरों के विकास का उत्तम मॉडल बताया गया था, अधिकारियों व नेताओं की लूट कमाई, कमीशनखोरी और घटिया निर्माण का मॉडल बन चुकी है। परियोजना पर जनता की गाढ़ी कमाई का अरबों रुपया विकास के नाम पर जमकर लूटा बांटा गया। स्मार्ट सिटी परियोजना के ये कैमरे भी फ्लॉप होने जा रहे हैं।
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में सीसीटीवी कैमरों के नाम पर जनता का धन किस तरह बर्बाद किया गया, इन आंकड़ों से समझा जा सकता है। 2020 में पूरे शहर में 1200 कैमरे लगाने के लिए 172 करोड़ रुपये खर्च किए गए, यानी प्रति कैमरा इंस्टालेशन, नेटवर्किंग के लिए 14 लाख 33 हजार रुपये से अधिक खर्च किया गया। जानकार कहते हैं कि यदि केवल पांच साल के लिए बारह सौ कैमरे लगाए गए तो सरकार ने प्रतिदिन करीब 9 लाख 42 हजार 466 रुपये यानी खर्च किए। अहम बात ये कैमरे लगा तो दिए गए लेकिन इनका इस्तेमाल यातायात व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए या ट्रैफिक लाइटों के स्मार्ट संचालन में नहीं किया गया। जानकार कहते हैं कि ट्रैफिक लाइटों के साथ कैमरे लगाने का उद्देश्य वाहनों की संख्या के आधार पर रेड और ग्रीन सिग्नल का समय तय करना होता है। यानी यदि किसी लेन पर वाहनों की संख्या अधिक है जबकि दूसरी लेन में कम है तो सीसीटीवी कैमरों की मदद से अधिक वाहन वाली लेन की ग्रीन लाइट का समय बढ़ाया जा सकता है, या जिस लेन में वाहनों की संख्या कम या नहीं है, उन्हें निकाल कर दूसरी लेन के लिए ग्रीन लाइट किया जाना। इससे चौराहों पर बेवजह खड़े होने से वाहनों का ईंधन नहीं खराब होता और प्रदूषण भी नियंत्रित होता है।
सच्चाई ये है कि स्मार्ट सिटी ने 1200 सीसीटीवी कैमरे लगाने से पहले किसी भी जगह पर वाहनों के घनत्व, प्रति मिनट गुजरने वाले वाहनों की संख्या, पीक और ऑफ पीक समय में वाहनों की संख्या, चौराहों पर सडकों से गुजरने वाले वाहनों का अनुपात, यानी किस सड़क पर ज्यादा और किस से कम वाहन गुजरते हैं, गुजरने वाले वाहनों का पैटर्न यानी दो पहिया, चार पहिया और भारी वाहनों का अनुपात आदि कुछ भी अध्ययन नहीं किया। सीसीटीवी कैमरे लगाने का भी यही उद्देश्य होता है ताकि उनके जरिए स्मार्ट तरीके से यातायात प्रबंध किया जा सके, जिसमें ये कैमरे पूरी तरह फेल रहे और मुख्य चौक चौराहों पर जाम की स्थिति बनी रहती है। अधिकारियों को तो बस जनता का धन खर्च करने के लिए पूरे शहर में सीसीटीवी कैमरे लगाने थे सो पानी की तरह पैसा बहा कर लगा दिए गए, ये कैमरे चल भी रहे हैं या नहीं इसमें कभी स्मार्ट सिटी के स्मार्ट भ्रष्ट अधिकारियों ने ध्यान ही नहीं दिया।
सीसीटीवी कैमरे लगाने वाली कंपनी को पांच साल की देखरेख और मरम्मत का ठेका मिला था जो एक महीने पहले खत्म हो चुका है। हालांकि ठेके के समय में भी अनेक सीसीटीवी कैमरे नेटवर्किंग, पावर सप्लाई या अन्य तकनीकी समस्याओं के कारण काम नहीं करते थे, लेकिन ठेका खत्म होने के बाद अब इनका कोई पुरसाने हाल नहीं रहा। सुधी पाठकों को याद दिलाते चलें कि सीएम नायब सैनी ने स्मार्ट सिटी की ट्रैफिक लाइट और सीसीटीवी कैमरों का संचालन एफएमडीए को हैंडओवर करने का आदेश दे रखा है।
जानकार बता रहे हैं कि स्मार्ट सिटी के अधिकारी चार्ज सौप कर पल्ला झाडऩा चाहते हैं लेकिन एफएमडीए के अधिकारी इसलिए टेकओवर नहीं कर रहे, क्योंकि वे जानते हैं कि माल मलाई खाने वाले तो खा गए और अब कबाड़ा उन्हें सौंपा जा रहा है जबकि एफएमडीए को खुद भी माल मलाई खाने से फुर्सत नहीं तो वे भला कबाड़े में क्यों घुसने लगे। परेशानी यह है कि रखरखाव, देखरेख करने वाली कंपनी का ठेका समाप्त होने के कारण स्मार्ट सिटी के अधिकारी भी खराब सीसीटीवी कैमरे दुरुस्त नहीं करवा रहे। सूत्रों के मुताबिक यह सारा खेल जानबूझ कर किया गया है ताकि मरम्मत के नाम पर सरकार से मोटी रकम निकलवा कर लूट बांट की जाए। यह कोई बड़ी बात नहीं कि एफएमडीए अपनी शर्तों पर इस कबाड़े को टेकओवर कर ले, ये शर्तें इन कैमरों की कुल खरीद से भी ज्यादा महंगी हो सकती है।
हालांकि स्मार्ट सिटी लिमिटेड के सीईओ संजय जून ने बताया कि सीसीटीवी और लाइटें खराब होने की उन्हें जानकारी नहीं है, यदि कहीं पर खराबी है तो उसे दुरुस्त कराया जाएगा। दरअसल, सिर्फ सीसीटीवी ही नहीं स्मार्ट सिटी के नाम पर मोदी-खट्टर-सैनी की सरकारों में अरबों रुपये डकारे जा चुके हैं, केवल फरीदाबाद में दस साल में 36 सौ करोड़ से अधिक धन की बंदरबांट सड़क, सीवर, पेयजल, बूस्टर, एसटीपी, पर्यावरण संरक्षण, पार्क, जल निकासी व्यवस्था आदि के नाम पर की गई। शहर कितना स्मार्ट बना यह पूरे शहर में जलभराव, बढ़ते प्रदूषण, जगह जगह कूड़े के ढेर के रूप में नजर आ रहा है।