फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) शहर की जलनिकासी और डिस्पोजल व्यवस्था दुरुस्त रखने के नाम पर हर साल करोड़ों रुपयों की बंदरबांट करने वाले नगर निगम अधिकारी अब लूट कमाई की नई तकनीक स्काडा (सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डेटा एक्विजिशन) के जरिए जनता को मूर्ख बनाने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए दो करोड़ रुपये का लंबा चौड़ा बजट बनाया गया है। दावा किया जा रहा है कि शहर के सभी डिस्पोजलों को स्काडा सिस्टम से जोड़ दिया जाएगा। इससे रियल टाइम यह पता चल जाएगा कि किस डिस्पोजल पर कौन सी मोटर बंद हो गई है या फिर कम पानी फेक रही है। अगर कोई मोटर खराब हो गई होगी या पानी फेकना बंद कर दिया होगा तो निगम के कमांड एंड कंट्रोल रूम में बैठे अधिकारियों को इसकी तुरंत जानकारी हो जाएगी और उसे फौरन ही दुरुस्त कराने के लिए डिस्पोजल मेंटिनेंस कंपनी को सूचना दे दी जाएगी। दावों को सुनकर तो लगेगा जैसे इस बरसात में शहर में कहीं जलभराव दिखेगा ही नहीं और अगर किसी डिस्पोजल की मोटर खराब हो गई तो ठेकेदार मेंटिनेंस एजेंसी को तुरंत जानकारी दी जाएगी। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि ठेकेदार एजेंसी मोटरों को चुटकियों में ठीक कर दोबारा चालू कर देगी। परेशान तो जनता को तब भी उतना ही होना होगा जितना कि वह पहले से होती आ रही है।
निगम मामलों के जानकार इसे लूट कमाई की एक और योजना से ज्यादा कुछ नहीं मान रहे हैं। उनके अनुसार फिलहाल शहर में 53 डिस्पोजल है। इन्हें स्काडा से जोडऩे का खर्च ही दो करोड़ रुपये बताया जा रहा है यानी हर डिस्पोजल पर 3 लाख 77 हजार 358 रुपये खर्च किए जाएंगे। इसके बाद इन डिस्पोजलों का मेंटिनेंस निजी कंपनी को एक साल के लिए दे दिया जाएगा, इस कंपनी को भी करोड़ों का ठेका दिया जाएगा। यह सारी कवायद दिखावे के लिए तो जनहित में है लेकिन माना जा रहा है इसका उद्देश्य संघी-भाजपाइयों की एजेंसियों को लूट कमाई कराना है। जिस तरह खट्टर ने संघी दोस्त की याशी कंसल्टेंसी को पूरे प्रदेश की प्रॉपर्टी आईडी बनाने के नाम पर 57 करोड़ रुपये भेंट कर दिए थे उसी तर्ज पर डिस्पोजलों के ठेके भी किसी संघी भाजपाई को दिए जाएंगे। भ्रष्टाचार के कारण बीते ग्यारह वर्षों में शहर के आधारभूत ढांचे की जो दुर्दशा हुई है वह बरसात में जलभराव के रूप में साफ नजर आती ही है, तो सर्दियों में स्मॉग, वायु प्रदूषण और गर्मियों में धूल के उठते गुबारों के रूप में नजर आती है। डिस्पोजलों की हालत जर्जर है, यहां मोटरें आए दिन खराब होती रहती हैं। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि बिजली कटौती दिखा कर जेनरेटर और डीजल खर्च की मद में हर महीने लाखों रुपयों की बंदरबांट हो जाती है। यदि बिजली निगम द्वारा डिस्पोजलों को की जाने वाली बिजली आपूर्ति की लॉग बुक की जांच की जाए तो जेनरेटर-डीजल घोटाला स्पष्ट रूप से सामने आ जाएगा लेकिन जब निगमायुक्त ही मातहतों से पांच लाख के लहंगे, सोने के बिस्कुट और मॉल में की गई खरीदारी का बिल भरने की उम्मीद करती हों तो भ्रष्टाचार होना स्वाभाविक है। स्काडा सिस्टम लागू होने से डिस्पोजलों की हालत बेहतर नहीं होने वाली, हां इतना जरूर होगा कि लूट कमाई में निगम अधिकारियों के साथ सत्ता समर्थित ठेकेदार एजेंसियों की भी हिस्सापत्ती बंध जाएगी।
सुधी पाठकों को बताते चलें कि निगम अधिकारी डिस्पोजलों के अलावा जलापूर्ति व्यवस्था और स्ट्रीट लाइट को भी स्काडा से जोडऩे की जुमलेबाजी कर चुके हैं। साल 2018 में दो सौ करोड़ घोटाले की आरोपी तत्कालीन निगमायुक्त अनीता यादव और भ्रष्टाचारी चीफ इंजीनियर डीआर भास्कर ने जलापूर्ति व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए स्काडा सिस्टम का ढोल पीटा था। तब भी उनका लक्ष्य सिस्टम के नाम पर सरकारी धन की बंदरबांट करना ही था, लेकिन दो सौ करोड़ का घोटाला खुल गया तो स्काडा ठंडे बस्ते में चला गया। कमीशन के अतिरिक्त ठेकेदार से पांच लाख रुपये का लहंगा लेने वाली निगमायुक्त मोना ए श्रीनिवास ने इसी जनवरी में शहर की स्ट्रीट लाइटों को स्काडा सिस्टम से जोड़े जाने का झुनझुना बजाया था। इसे लागू करने में भी दसियों करोड़ रुपये खर्च करने की तैयारी थी। हालांकि मैडम अब इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोल रहीं क्योंकि उन्हें अहसास हो चुका है कि अब उनकी चलाचली की बेला है।
जानकारों का यह भी मानना है कि मोदी-सैनी की डबल इंजन सरकारें सरकारी नौकरी खत्म कर ठेका व्यवस्था लागू करने की मुहिम के तहत ही ऐसे निर्णय ले रही हैं। स्थायी नौकरी के बजाय सत्ता समर्थित पूंजीपतियों को ठेका देकर खुश किया जाएगा बदले में वे पार्टी को मोटा चंदा देंगे, जनता तो जलभराव, जल, वायु, ध्वनि और मृदा प्रदूषण से जूझ रही है और आगे भी जूझती रहेगी।