निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के बजाय अन्य स्कूल में दाखिला लेने की सलाह दे रहीं फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कक्षाएं चलाने के लिए करीब 7800 कमरों की कमी है, प्रारंभिक शिक्षक (पीआरटी) के 8799, पीजीटी के 11 हजार 341 और टीजीटी के 16 हजार 537 पद खाली हैं ! और शिक्षामंत्री सीमा त्रिखा बड़बोलापन दिखा रही हैं कि हम किसी अभिभावक को नहीं कहते कि आप अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल में डाले, हम दोनों हाथ पसारे बच्चों को अपनी बड़ी गोद यानी सरकारी स्कूलों में लेने के लिए तैयार बैठे हैं कि बच्चे हमारी गोद में आएं। यह बयान उन्होंने बीते शनिवार को घरौडा में जिला स्तरीय विद्यालय प्रबंधन समिति के कार्यक्रम में दिया था।
यह प्रतिक्रिया उन्होंने निजी स्कूलों द्वारा शिक्षा के नाम पर मोटी फीस वसूलने, यूनिफार्म, किताबें-स्टेशनरी आदि के नाम पर ठगी किए जाने की शिकायत पर दी थी। शिक्षामंत्री होने के नाते उन्हें अभिभावकों से हो रही लूट से संरक्षण दिलाने के लिए कोई कार्रवाई करने का आश्वासन देना चाहिए था लेकिन निजी स्कूलों का साफ बचाव करते हुए बोलीं कि कोई जबरदस्ती थोड़ी न है कि उसी स्कूल में पढऩा है, स्कूल बदल लो। सीमा त्रिखा यदि एक को बदल कर दूसरे निजी स्कूल में दाखिला लेने की बात कर रही थीं तो वहां भी यही लूट होनी है, अगर सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने की बात कर रही थीं तो उन्हें भी मालूम है कि उनमें पढ़ाई के अलावा और सब कुछ होता है। दरअसल, खट्टर-सैनी की सरकार ने बीते दस साल में प्रदेश के सरकारी स्कूलों की व्यवस्था सुधारने की बजाय उसे खराब ही किया है। दस साल में स्कूलों में शिक्षक सेवानिवृत्त होते गए लेकिन उन पदों को नहीं भरा गया। हरियाणा मास्टर वर्ग एसोशिएशन के मुख्य संरक्षक सुरेन्द्र यादव के अनुसार शिक्षा विभाग में क्लास-1 अधिकारियों के लगभग 40 पद रिक्त हैं। राज्य में केवल 4 उप-जि़ला शिक्षा अधिकारी कार्यरत हैं। बीईओ व बीआरसी के पद सैकड़ों की संख्या में रिक्त हैं। स्कूलों में प्रिंसिपल के लगभग 900 पद और हाईस्कूल में हेड मास्टर के 600 पद रिक्त हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार शिक्षा विभाग में 71 हजार पद खाली पड़े हैं जिनमें अस्सी फीसदी पद पिछले एक दशक में रिक्त हुए हैं। जब नीचे से लेकर ऊपर तक इतने पद खाली हैं तो पढ़ाई क्या खाक होगी, और जिन स्कूलों में पढ़ाई की कुछ संभावना है वहां दस सीटों पर हजार बच्चे दाखिले के लिए आ रहे हैं, खुद सीमा ने माना था कि इन स्कूलों में दाखिले के लिए छात्र उनके घर के दरवाजे तोड़ रहे हैं।
खाली पदों का असर सरकारी स्कूलों में शिक्षा पर पड़ रहा है, अनेक दूर दराज के विद्यालयों में सिर्फ एक ही शिक्षक है, वह कितने विषय और कितनी कक्षाओं को पढ़ा पाता होगा समझा जा सकता है। एसोसिएशन के जिला प्रधान उदयवीर सिंह के अनुसार स्टाफ की कमी होने के कारण विद्यार्थियों की वर्दी भत्ता का भुगतान नहीं हो पाया है, बीपीएल व अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को बांटी जाने वाली छात्रवृत्ति की राशि भी नहीं आई है। शिक्षामंत्री इन समस्याओं का समाधान तो करा नहीं पा रही हैं और अभिभावकों से बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिला दिलाने की बात कह रही हैं। मंत्री जी, तुम्हारे पास न तो स्कूल की इमारतें हैं, न शिक्षक, न उपकरण, स्कूलों में बिजली, पंखे तक नहीं हैं और दावे बड़े बड़े। अब विधानसभा चुनाव सिर पर हैं तो सीएम सैनी ने प्रदेश में पचास हजार पद भरने का ऐलान किया है। सीमा त्रिखा भी कहती हैं कि शिक्षकों के खाली पद हरियाणा कौशल रोजगार निगम (एचकेआरन) के द्वारा यानी ठेके पर भरने की तैयारी की जा रही है। चुनाव के समय इन दोनों को बताना चाहिए था कि पांच साल में उनकी सरकार ने क्या किया, अब चुनाव से पहले ढिंढोरा पीट रहे हैं कि हम ये करेंगे। चुनाव बीतने के बाद भर्ती अगले चुनाव तक फिर लटका दी जाएंगी।
विभाग में खाली पड़े मुख्य पदों को भरने के लिए सरकार पदोन्नति भी नहीं कर रही है, समझा जा सकता है कि सरकार की नीयत ही शिक्षा व्यवस्था सुधारने की नहीं है। संभवत: यही कारण है कि जब पत्रकारों ने शिक्षामंत्री से पूछा कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी मिलेनिया ने पड़ोसी दिल्ली के सरकारी स्कूलों का निरीक्षण किया था और उनकी बिल्डिंग, शिक्षण व्यवस्था व शिक्षण उपकरण, खेल मैदान, शौचालय आदि की जमकर तारीफ की थी, स्कूल में पढऩे वाले बच्चों के बौद्धिक स्तर को भी खूब सराहा था, तो उन्होंने कहा कि ये कौन है। मैं नहीं जानती। मेरी जानकारी के में ऐसा कोई नाम नहीं है।
यदि शिक्षामंत्री को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का नाम नहीं पता है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह प्रदेश की शिक्षा को किस दिशा में ले जाएंगी। उनका यह जवाब उनके बौद्धिक स्तर को जांचने के लिए पर्याप्त समझा जाना चाहिए। उनकी बातों से ये तो समझ में आता ही है कि वह अभी शिक्षामंत्री जैसे महत्वपूर्ण और गरिमापूर्ण पद को संभालने लायक नहीं हुई हैं। वैसे भी, जिस तरह भाजपा में कई बड़े दावेदार उभर रहे हैं उससे लगता है कि विधानसभा में यह उनकी आखिरी पारी है।