मरम्मत के नाम पर अधिकारियों की लूट कमाई का साधन फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बाटा रेलवे ओवरब्रिज की मरम्मत के नाम पर आंकड़ों के अनुसार बीते आठ साल में करीब दो करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं लेकिन इसके बड़े बड़े गड्ढे, चौड़ी होती दरारें और जर्जर होती जा रही सड़क भ्रष्टाचार का ढोल पीट रहे हैं। हालत ये हैं कि बाटा से हार्डवेयर की ओर चढ़ते ही कुछ ही दूरी पर सड़क बुरी तरह से उखड़ चुकी है। कई जगहों पर तो सड़क की सारी परतें उखड़ चुकी हैं और नीचे का लेंटर नजर आने लगा है। सबसे ज्यादा खराब हालत रेलवे ओवर ब्रिज के ज्वाइंट का है। यहां इतने बड़े बड़े गडढ़े हो चुके हैं और कई जगहों में सड़क किनारों पर सिमट कर ढूह की तरह उठ गई है कि चार पहिया वाहन फंस सकते हैं जबकि दोपहिया वाहन चालक असंतुलित होकर गिरते रहते हैं। उतरते समय भी सड़क पर अनेकों गड्ढे हैं जिनके कारण चालक धीरे चलने को मजबूर होते हैं और पुल पर वाहनों का जाम और लोड बढऩे की स्थिति दिन में अधिकतर समय बनी रहती है।
यही हालात हार्डवेयर चौक से बाटा की ओर जाने वाली लेन की है। पुल पर चढ़ते ही बड़े बड़े गड्ढ़े स्वागत करते हैं तो उन्हें बचाने के लिए चालक को वाहन एक साइड में करना पड़ता है और जाम की स्थिति बनती है। इस लेन में भी बाटा मोड़ तक बीच बीच में सड़क इतनी जर्जर है कि बहुत संभाल कर वाहन चलाना पड़ता है। इस ओर भी ज्वाइंट का बुरा हाल हो चुका है, गर्डर के पास गड्ढे इतने गहरे हो चुके हैं कि बहुत सावधानी से वाहन निकालना पड़ता है। पाठकों को बताते चलें कि वर्ष 2017 में नगर निगम के तत्कालीन चीफ इंजीनियर डीआर भास्कर ने पुल की मरम्मत के लिए 1 करोड़ 34 लाख रुपये का खर्च दिखाया था और जून तक काम समाप्त करना दिखा दिया गया था। यह मरम्मत छह महीने भी नहीं चली और फरवरी मार्च 2018 में लोक निर्माण विभाग ने पुल की मरम्मत की थी, इसमें भी बीसियों लाख रुपये खर्च बताया गया था। यह मरम्मत भी एक डेढ़ साल तक ही चल सकी, 2020 मेें एक बार फिर इसकी बड़े पैमाने मरम्मत कराई गई।
जानकारों के अनुसार तब काफी दिनों के लिए पुल का आवागमन रोका गया था। तब सड़क की मरम्मत के साथ संस्पेंशन ज्वाइंट यानी बियरिंग भी दुरुस्त किए गए थे यानी फिर बीसियों लाख खर्च हुए थे लेकिन घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किए जाने के कारण चंद महीनों में ही बाटा चौक की ओर से पुल पर चढ़ते ही सड़क में बड़े बड़े गड्ढे हो गए थे। तब भी लाखों रुपये खर्च कर मरम्मत कराई गई। बताया जा रहा है कि 2023 में नीलम पुल की मरम्मत से पहले एफएमडीए की ओर से बाटा पुल की मरम्मत की गई थी, इसी तरह 2024 में भी बरसात से पहले मरम्मत के नाम पर पैचवर्क आदि का खेल कर करोड़ों रुपये डकार लिए गए। जिस तरह इस पुल की मरम्मत के लिए निगम, एफएमडीए और लोक निर्माण विभाग लगे हैं उससे तो ऐसा लगता है कि ये सारे विभाग बारी बारी से लूट कमाई कर रहे हैं और जवाबदेही तय किए जाने के सवाल पर एक दूसरे पर टाल दिया जाता है। भाजपा के शासन में भ्रष्टाचार का जो हाल है, केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर का नाम एनएचएआई कंपनी से दस प्रतिशत कमीशन मांगने में उछला तो नगर निगम के दौ सौ करोड़ घोटाले में मंत्री मूलचंद शर्मा का ठेकेदार सतबीरा से चालीस लाख कीमत वाली कार गिफ्ट लेना और परिवार के साथ हवाई यात्राएं करना विजिलेंस जांच में आना बताया जा रहा है, ऐसे में यह मानना गलत नहीं होगा कि पुल की मरम्मत के नाम पर हुई लूट कमाई की हिस्सापत्ती सत्ता के लालों को न पहुंची हो, तब ही तो इन नेताओं को सड़कों के गड्ढे और जनता की समस्याएं नजर नहीं आतीं।
भ्रष्टाचार का आलम यह है कि एफएमडीए ने अप्रैल 2023 में 32 लाख रुपये की लागत से हार्डवेयर चौक पर मैस्टिफ अस्फाल्ट यानी तारकोल की मोटी परत बिछाई थी, तब एफएमडीए के अधिकारियों ने बड़े बड़े दावे किए थे कि करीब पचास मीटर के इस चौक के बन जाने से वाहन बेरोकटोक गुजरेंगे। मजदूर मोर्चा ने तब ही बता दिया था कि सड़क बत्तीस महीने भी नहीं चलेगी, वही हुआ हार्डवेयर चौक पर इतने गहरे गड्ढे हो गए कि यातायात दुरुस्त करने के लिए पुलिस वालों को अपने तौर पर ट्रैक्टर ट्राली से मलबा गिरवाना पड़ा, इसके बावजूद भी गड्ढे ज्यों के त्यों कायम हैं क्योंकि मलबा बहुत देर तक टिक नहीं सकता। जनता की गाढ़ी कमाई कैसे बेखौफ होकर लूटी जा सकती है उसका उदाहरण फरीदाबाद में देखा जा सकता है। वैसे मज़दूर मोर्चा को यह खुशफहमी कतई नहीं है कि यह खबर प्रकाशित होने के बाद मोटी चमड़ी वालेे बेशर्म अधिकारियों और नेताओं पर कोई असर हो पाएगा, जैसा कि कई अखबार वालों को होता है। इनका इलाज केवल जनता के सड़कों पर उतरने से ही होता है।