मजदूर मोचो फरीदाबाद। हिन्दी, उर्दू और पंजाबी के समर्पित साहित्यकार ज्योति संग जी का पिछले दिनों निधन हो गया, वे 78 वर्ष के थे। उनका जन्म 24 सितंबर,1947 को जालंधर में हुआ, लेकिन पालन-पोषण फरीदाबाद में हुआ। इनके पिता स्व0 जगत प्रकाश संग कांग्रेस के कर्मठ नेता और फरीदाबाद के प्रसिद्ध समाजसेवी थे। लगभग साठ वर्षों से ज्योति जी की समाज, साहित्य और सांस्कृतिक क्षेत्र में केन्द्रीय भूमिका रहती थी। अपने चहेते साथी ज्योति संग के देहावसान पर बड़ी संख्या में फरीदाबाद के साहित्यकारों, कलाकारों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों द्वारा गहरा दु:ख व्यक्त किया गया और भावभीनी शब्दांजलि अर्पित की गई-
जीवा संस्थान, फरीदाबाद के अध्यक्ष डॉ. ऋषिपाल चौहान, ने कहा, “श्री ज्योति संग जी एक प्रतिष्ठित पत्रकार थे। उनकी लेखनी में सहज संवेदनशीलता, सामाजिक जागरुकता और विषयों की गहरी समझ स्पष्ट रूप से झलकती थी। पत्रकारिता में उनकी निष्पक्षता, सजगता और समर्पण उन्हें समाज में अत्यंत सम्माननीय बनाते थे। सामाजिक सरोकारों के प्रति उनकी सक्रियता और उत्तरदायित्व पूर्ण दृष्टिकोण सदैव प्रेरणादायक रहा। उनके सरल स्वभाव, ईमानदारी और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में आजीवन सक्रिय सहभागिता ने उन्हें फरीदाबाद ही नहीं बल्कि व्यापक समाज में भी सम्मान और प्रेम दिलाया। जीवन के अंतिम समय तक वे बौद्धिक रूप से सक्रिय और अनुशासित बने रहे, जो उनके प्रेरणादायक व्यक्तित्व का सच्चा परिचय है। उनका निधन उनके परिवार के लिए ही नहीं बल्कि बुद्धिजीवी और कला प्रेमियों के लिए भी एक बड़ी अपूर्ण क्षति है। —— वरिष्ठ साहित्यकार आचार्य बलदेवराज “शान्त” ने कहा, “बहुआयामी प्रतिभा के स्वामी भाई श्री ज्योति संग जी जब तक जिये, मानवतावादी मूल्यों के संग रहकर तथा सर्वजन-हिताय की ज्योति को थाम कर जिये। उनके परलोकगामी होने पर यही कह सकता हूँ कि, “न होना आपका हरदम खलेगा। हमें शाबाशियाँ अब कौन देगा ?” —— प्रतिष्ठित साहित्यकार श्रीमती सुदर्शन रत्नाकर ने कहा कि, “बरसों में ज्योति संग जी को जितना जाना, लगता था बहुत और जानना अभी शेष है। सजग नागरिक, संवेदनशील कवि, पत्रकार, शानदार वक्ता, मिलनसार, बेहतरीन अभिनेता ईष्र्या-द्वेष से दूर, सभी को सम्मान देने वाला बहुमुखी प्रतिभा का धनी वह व्यक्तित्व भले ही हमारे बीच में नहीं रहा; लेकिन उनका कृतित्व उनकी स्मृति को हमारे दिलों में जीवित रखेगा। ” —— वरिष्ठ पत्रकार, जगन्नाथ गौतम ने भावुक स्वर में बताया, “हमारे करीबी मित्र, साहित्यकार, पत्रकार, रंगकर्मी ज्योति संग जी का गत 23 नवम्बर को अचानक चले जाना हम सब को झकझोर गया। वे मित्र के साथ-साथ मेरे पड़ौसी भी थे। ज़ब भी कभी कुछ कारणों के चलते विचलित होते, मेरे पास चाय पीने चले आते। कई बार हमारे चैनल ‘देश रोजानाÓ पर आए, हमने उनसे वर्तमान मीडिया, और साहित्य के हालातों पर बातचीत क़ी, चैनल पर कवि सम्मेलन भी किया। आखरी बार एक कार्यक्रम में कवि हरेराम समीप जी के घर पर इक_े गए, लौटती बार बिल्लू लस्सी वाले के यहाँ दोनों ने पांच नम्बर में लस्सी पी। उन्हें घर छोड़ा। बस वही आखिरी मुलाक़ात साबित हुई। उनकी कई चाह अधूरी रह गईं. वह अपने अखबार क़ो पूरे हरियाणा में फैलाने, एक पुस्तक लिखने, और अपने बेटे के लिए कुछ और ज्यादा करने क़ी हसरत लिए विदा हो गए। मेँ जीवन में उन्हें कभी नहीं भूल पाउँगा. इतनी भी क्या जल्दी थी जाने क़ी मेरे दोस्त? अश्रुपूर्ण विदाई… —— ‘मजदूर मोर्चा’ पत्रिका के सम्पादक सतीश कुमार ने कहा, “ज्योति भाई से मेरी पहली मुलाकात 90 के दशक में पत्रकार अनूप चौधरी ने कराई थी। उस वक्त मुझे पता लगा कि वे साहित्य एवम् थियेटर में विशेष महारत रखते थे। उनकी काफी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी थी। इसके अतिरिक्त वे जर्मन भाषा के भी विशेषज्ञ थे। बच्चों को जर्मन पढ़ाकर भी अपनी रोजी चलाने का प्रयास कर रहे थे। कुछ समय बाद उन्होंने हरियाणा तरंग नामक एक साप्ताहिक अखबार का विमोचन भी कराया। थियेटर एवम् साहित्य के लिए वे सारे काम छोड़कर लग जाते थे। कई वर्षों तक वे गर्वर्मेंट कॉलेज यूथ फैस्टिवल की तैयारी के लिए गर्वमेंट कॉलेज, फरीदाबाद इनका विशेष सहयोग प्राप्त करता रहा। मेरा उनके साथ विशेष स्नेह रहा है, दो तीन हफ्ते तक अगर मुलाकात न हो तो कहते थे मैं आऊं या तुम आ रहे हो, मैं भी बर्बस उनकी और खींचा चला जाता था। उनके इस अचानक निधन से मुझे व्यक्तिगत रूप से भारी क्षति हुई है। मैंने अपना एक खास साथी खो दिया है। —— अग्रवाल महाविद्यालय के हिन्दी प्रोफेसर डॉ. टी. डी. दिनकर का कहना है कि “हरियाणा के सांस्कृतिक गौरव, अपनी दिव्य प्रज्ञा की सौरभ से समाज और राष्ट्र को सदैव सुवासित करने वाले साहित्य-सेवी पत्रकार, हमारे आदर्श अग्रज भाई ज्योति संग जी का आकस्मिक महाप्रयाण अत्यन्त पीड़ादायक है। आप बहुभाषाविद, गहन चिन्तक , साहित्य मनीषी, कुशल वक्ता , सहृदय कवि , जीवन के यथार्थ-बोध के कथा-शिल्पी, सहज करुणामूर्ति, बहु आयामी व्यक्तित्व के धनी और बुजुर्गो के आदर्श थे। आज भले ही वे भौतिक रूप से हमारे मध्य नहीं हैं, पर उनका विराट व्यक्तित्व और कृतित्व सदैव हमारा जीवन पाथेय बना रहेगा। —— मीनाक्षी जिजीविषा, चर्चित कवयित्री पत्रकार, शायर, कहानीकार, अभिनेता, कुशल वक्ता, मंच संचालक, समाज-सेवी ज्योति संग भाषाविद, जर्मन भाषा के ज्ञाता और शिक्षक, और मेरे लिए बड़े भाई समान आदरणीय ज्योति संग की का यूं, असमय , अकस्मात जाना पूरे साहित्य जगत को स्तब्ध और रिक्त कर गया। वे जाति, धर्म, वर्ग से बहुत परे सबके थे और गुरुबाणी के सूत्र वाक्य, ‘सरबत दा भला’, को मन-कर्म और वचन से जीने वाले सच्चे साहित्यकार थे। “वे हमेशा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन” के मार्ग पर चले । उनका कृतित्व एवं व्यक्तित्व इन उपमाओं से कहीं बहुत ऊंचा है। उनकी शख्सियत साहित्य-जगत एवं समाज के लिए अनुकरणीय एवं प्रेरणादायक है। उनका कोई बदल नहीं है। उनका जाना साहित्य जगत एवं समाज के लिए अपूर्णीय क्षति है । दु:ख के इस समय में मैं जिजीविषा साहित्यिक संस्था की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ। —— गीतकार एवं कवि किशोर कुमार कौशल ने कहा कि हिंदी, उर्दू व पंजाबी के संगम ज्योति संग विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। वे भारतीय छात्रों को जर्मन पढ़ाते थे। एक दशक से भी अधिक समय से ‘हरियाणा तरंग’ के संपादक रहकर वे स्थापित लेखकों के साथ-साथ नये कलमकारों की रचनाएं भी छापते थे। वे निर्भीक पत्रकार,उम्दा शायर और सशक्त कहानीकार होने के साथ-साथ नेकदिल इंसान तथा सबके हमदर्द थे। उनकी भरपाई असम्भव है। —— वरिष्ठ गीतकार एवं कवि, नवाब केसर बोले, “जीवन की गहराइयों को बहुत बारीकी के साथ जीने वाला एक महान पत्रकार, साहित्यकार, कलाकार श्रद्धेय ज्योति संग अपने साथ न जाने कितने राज़ समेटकर अनंत यात्रा पर चले गए। उन्होंने हमेशा गरीबों और मजलूमों के लिए बहुत कुछ लिखा। जब ‘हंस’ पत्रिका ने अपने प्रकाशन के 20 वर्ष की 20 सर्वश्रेष्ठ कहानियां प्रकाशित की तो उनमें एक कहानी ज्योति संग जी की भी थी, जो उनके लेखन की विश्वसनीयता और उत्कृष्टता को प्रमाणित करता है। जब भी वह लोगों से मिलते थे,बड़े ही ख़ास अंदाज़ में मिलते थे,जो दिल को छू लेता था। उनका जाना अपने आप में लेखन-जगत के लिए,समाज के लिए और पत्रकार- जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। —— कवि हरेराम समीप का कहना है, “ज्योति संग जी का अकस्मात् चले जाना जैसे नगर के साहित्यिक साँस्कृतिक ‘पावर हाऊस का’ अचानक बुझ जाना है। उनकी अनुपस्थिति से जो रिक्तता आई है, वह अब केवल उनकी यादों और प्रेरणाओं से ही भरी जा सकती है। ज्योति जी एक विलक्षण, विरले, अद्भुत, अजूबे और अद्वितीय व्यक्ति थे। अनन्य शब्दसाधक, धुनी रंगकर्मी, जुझारू पत्रकार और समर्पित समाजसेवी ज्योति जी का सम्पूर्ण जीवन एक मिशन की तरह था। वे सबके थे और सब उनके थे। एक तरह से वे फरीदाबाद नगर की साझा-संस्कृति के प्रतीक-पुरुष थे। उनके मन में किसी तरह की संकीर्णता नहीं थी न जाति, न धर्म, न भाषा। हिन्दी, उर्दू, पंजाबी की समन्वित संस्था ‘अदबी संगम’ और ‘यूथ फॉर यूनिवर्स’ के माध्यम से उन्होंने पचास साल तक फऱीदाबाद की सांस्कृतिक एकता की गौरवशाली परम्परा निर्मित की और उसे विकसित किया। हिन्दी से उन्हें अगाध प्रेम था। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए उन्होंने बरसों संघर्ष किया, जेल भी गए पुलिस की लाठियां भी खाई। सब जानते हैं कि उनकी वाणी पर जैसे माँ सरस्वती विराजमान रहती थीं। मंच पर घंटों बोलते रहना उनकी विशेषता थी। उनकी कहानियां, कविताएँ, गजलें या लेख उनके ईमानदार और शानदार व्यक्तित्व के प्रतिबिम्ब थे।
वे अपनी पत्रिका ‘तरंग’ में निरंतर सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक विषयों पर निर्भीकता से लिखते थे और अपने सकारात्मक लेखन से हजारों लोगों को प्रेरित व जागरूक करते थे। उनके जाने से फरीदाबाद के एक गौरवपूर्ण युग का अंत हो गया है। वे सदैव हमारे प्रेरणा स्त्रोत रहेंगे। मै उन्हें समस्त फरीदाबाद साहित्य समाज की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। इनके अतिरिक्त अनेकानेक जन प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों, सामाजिक, राजनीतिक, व्यापारिक तथा शिक्षा संस्थानों द्वारा उन्हें भावभीनी श्रृद्धांजलियाँ भी प्रेषित की गई हैं। फरीदाबाद नगर ज्योति संग जी के अप्रतिम योगदान को कभी नहीं भुला पायेगा।