डॉ. रामवीर
सबकी अपनी अपनी समझ है सबकी अपनी अपनी बुद्धि बहुत कठिन है मन में गहरे बैठे विश्वासों की शुद्धि।
सबके अपने अपने भय हैं सबकी अपनी अपनी भ्रान्ति रूढिग्रस्त समाज में कैसे आ सकती है कोई क्रान्ति।
जैसे स्थिर जल में स्वत: ही जमने लग जाती है काई वैसे ही समाज में अन्ध- विश्वासों की आती बुराई।
इतनी शक्ति कहां से लाऊं किस किस साथी को समझाऊं सही गलत औ सत्यासत्य का अन्तर साफ साफ दिखलाऊं।
निहित स्वार्थी नेताओं ने इतना फैला दिया है द्वेष कलह नहीं मिटती कितना भी देते रहो शान्ति सन्देश।
अन्दर भरी कुटिलता बाहर धारे हैं सन्तों का वेष छद्म साधुओं के कृत्यों का भोग रहा फल भारत देश।
छल प्रपंच औ भ्रष्टाचार ही जिनकी राजनीति की रीति भारत के उच्चादर्शों से इनको कभी हुई न प्रीति।
जो कहते हैं उससे उल्टा चलना इनका है इतिहास उसने सदा धोखा ही खाया जिसने किया इनका विश्वास।
देशभक्ति औ राष्ट्रवाद दो इनके वही पुराने मुखौटे इनकी आड़ में ही तो किए हैं काम इन्होंने अतिशय खोटे।
अंग्रेजो भारत छोड़ो का सारे देश में था जब शोर ये अंग्रेजों की सेवा में लगा रहे थे पूरा जोर।
बटवारे की सबसे पहले बात इन्होंने ही थी उठाई अब भी उसी तरह की बातें करते रहते संघी भाई।