विवेक कुमार 27 मार्च की सुबह किसी काम से जेपी मैक्स अस्पताल नोएडा सेक्टर 128 जाना हुआ। वहां एक पुराने साथी के साथ महीनों बाद मुलाकात हुई तो बातें अन्य दोस्तों की जि़ंदगी के हालातों से गुजरते हुए देश के हालातों तक आ पहुंची। माथे पर पीले रंग के पुते हुए टीके ने मुझे बता दिया था कि मेरा साथी सुनील अब स्कूल वाले सुनील से अलग 2014 के बाद वाला हिन्दू सुनील है। फिर भी न जाने क्यों वह यह मानने को तैयार नहीं था कि वह अब वो अंधभक्त है जिसके सोचने समझने की क्षमता एक खास पार्टी के पास गिरवी धरी जा चुकी है।
पेशे से एक अमेरिकी दवा कंपनी का सीनियर मैनेजर सुनील बुद्धि से भाजपा का आईटी सेल कर्मी दिखता था। उसने कहा कि देश में अब नौकरी करने का नहीं बल्कि नौकरी देने का माहौल आ चुका है। आज का युवा दूसरों को नौकरी देने में लगा है। मेरे पूछने पर कि उनकी कंपनी से पिछले हफ्ते ही 16 युवाओं की नौकरी जाने के बाद वे युवा अब कितनों को नौकरी देने की स्थिति में हैं? के जवाब में सुनील ने कहा कि वे सभी कामचोर हैं इसलिए नौकरी गई।
राजस्थान का रहने वाला सुनील जिसने इंदिरापुरम और नोएडा के आगे उत्तर प्रदेश को देखा ही नहीं, मानता है कि गोरखपुर, सोनभद्र, श्रावस्ती, पीलीभीत और नोएडा के इस 128 सेक्टर में अब कोई अंतर नहीं। सभी जगह कानून व्यवस्था आला दर्जे की है और योगी के राज में सब जगह पर कमाने खाने के साधन उपलब्ध हैं। टपरी वाले लड़के ने चाय पकड़ाते हुए सुनील को ऐसे देखा जैसे किसी अन्य ग्रह से कोई प्राणी जमीन पर उतर आया हो।
हमारी बहस जारी ही थी कि अचानक रेहड़ी वाले ने अपने एक साथी से गर्मागर्म बहस करते हुए उसकी रेहड़ी पर लदे सामान को सड़क पर फेंकना शुरू कर दिया। साथ ही वह अपने सामने खड़े लड़के को गालियां देते हुए उसे दलाल और न अन्य उपमाओं से नवाजने लगा। एक बारगी तो ऐसा लगा जैसे उसमें शक्तिमान घुस गया है। मामला थोड़ा शांत होने पर ”सोनू के मशहूर परांठे और स्नैक्स’ वाले रोते हुए लड़के से मैंने पूछा कि बात क्या है। सुनील को घूरते हुए उसने कहा कि जिस लड़के से उसकी बहस हुई वह भी उसी कि तरह कभी रेहड़ी लगाता था पर आज वो पुलिस चौकी वालों का एजेंट है। अब वो इलाके के रेहड़ी वालों से पुलिस को जाने वाली अवैध मंथली की रकम वसूलता है। पहले महीने का रेट 500 रुपये था पर जबसे चौकी पर नई मैडम आई है रेट 2000 कर दिया है। मां कसम भईया 2000 रुपये देने में परता नहीं खा सकता। इससे पहले ऑटो चलाता था तो उसका डेढ़ लाख का चालान बना दिया था पुलिस ने, तो वो मैं छुड़ा ही नहीं पाया। चोरी चकारी करो तो दिक्कत। अब करूं तो करूं क्या?
उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था और रोजगार का नजारा देखने के बाद चाय का अपना कप सड़क किनारे फेक कर वापस अस्पताल में जाते हुए सुनील ने कहा ”साला चोरी करता था तो अब मेहनत कहाँ से होगी, सड़क पर लगाएगा तो पुलिस को पैसे देना ही पड़ेगा’। सुनील फार्मा कंपनी की तरफ से अस्पताल के डॉक्टरों को दवा बेचने, और मरीज को उसकी दवा प्रिस्क्राइब करने के लिए मोटी रिश्वत के साथ ही महंगे गिफ्ट्स भी देता है। कई दफा डॉक्टरों को विदेश भी भेजता है। ऐसा सब करने में उसे काफी मेहनत करनी पड़ती है जबकि रेहड़ी पर धूप और लू के थपेड़ों में परांठे बिना मेहनत अपने आप सिक जाते हैं और चाय खुद उबल जाती है।।