पहले रोडवेज बस-ट्रेनें सही से चलवा लो फिर चलाना पॉड टैक्सी फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) काम नहीं काम का ढिंढोरा पीटने वाले संघी-भाजपाइयों के नायाब नमूने सीएम नायब सैनी प्रदेश में पॉड टैक्सी चलवाने जा रहे हैं। जिस प्रदेश में चालीस लाख से अधिक परिवार यानी करीब एक करोड़ 80 लाख लोग मुफ्त सरकारी राशन पर जीवन गुजारने को मजबूर हों और जनता बिजली, पानी, सड़क जैसी आधारभूत सुविधाओं के लिए तरस रही हो वहां पॉड टैक्सी चलाना सरकार की जनविरोधी नीयत को दर्शाता है।
बीते दिनों सीएम नायब सैनी ने जापान की सुजूकी और अमरीकी कंपनी ग्लाइडवेज के अधिकारियों के साथ बैठक कर प्रदेश में पॉड टैक्सी चलवाने का निर्णय लिया है। उनके फैसले के बाद जागरूक नागरिकों में चर्चाएं हो रही हैं कि सरकार रोडवेज, रेल नेटवर्क का अधिकतम उपयोग तो कर नहीं रही है, इसके बजाय पहले मैट्रो, फिर आरआरटीएस (रैपिड रेल ट्रांजिट सिस्टम) और अब पॉड टैक्सी चलाने जा रही है। बेहतर होता कि सरकार यातायात के जो साधन पहले ही उपलब्ध हैं उनका ही पूर्ण क्षमता से इस्तेमाल करती। रोडवेज की हालत खराब है, बड़े शहरों को छोड़ दिया जाए तो प्रदेश भर के सारे जिले ही रोडवेज बसों के जरिए एक दूसरे से नहीं जुड़े हैं जनता को अवैध और असुरक्षित संसाधनों का सहारा लेना पड़ता है। बड़े शहरों में भी आंतरिक रोड नेटवर्क नहीं होने के कारण सिटी बसें भी नहीं चलाई जा पा रही हैं। केवल फरीदाबाद में ही जेएनएनयूआरएम के तहत लाई गईं दो सौ लो फ्लोर बसें बिना चले खराब होकर बर्बाद गई। हालात ये हैं कि अभी भी खराब सड़कों के कारण कई रूटों पर सिटी बसें नहीं चल पा रही हैं। ई बसों का ढिंढोरा पिछले चार पांच साल से पीटा जा रहा है लेकिन आज तक उसके लिए जरूरी आधारभूत ढांचा ही उपलब्ध नहीं हो सका है, सीएम सैनी उन्हें चलवा नहीं पा रहे पॉड टैक्सी चलवाएंगे। सरकार आरआरटीएस और मैट्रो और यहां तक कि सिटी बस डिपो बनाने के लिए जगह नहीं तलाश पा रही है, पॉड टैक्सी के लिए जरूरी जमीन व आधारभूत सुविधाएं कहां से जुटा पाएगी। जानकार कहते हैं कि गुडग़ांव-फरीदाबाद में एलिवेटेड कॉरिडोर, फ्लाईओवर और आरआरटीएस प्रोजेक्ट पहले ही पाइपलाइन में हैं, सरकार इन प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा नहीं करवा पा रही है।
पलवल, बल्लबगढ़, ओल्ड फरीदाबाद से रोजाना दिल्ली जाने वाले हजारों लोगों का कहना है कि सरकार पहले कोविड संकट के समय बंद की गईं सारी लोकल ट्रेनें ही बहाल करा दे यही आम जनता के लिए बड़ी राहत होगी। हालात ये हैं कि सुबह ऑफिस टाइम और पीक ऑवर में दिल्ली-पलवल के बीच हर आधा घंटे पर एक लोकल या मेल ट्रेन उपलब्ध रहती थी। कोविड खत्म हुए चार साल होने वाले हैं लेकिन अधिकतर लोकल ट्रेनें आज तक बहाल नहीं हुईं। लोकल ट्रेनें नहीं चलने के कारण दिल्ली एनसीआर में नौकरी करने वाले स्थानीय दैनिक यात्रियों को आने जाने पर कहीं ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। लोकल ट्रेनों के न होने मैट्रो जैसा महंगा साधन इस्तेमाल करना पड़ता है।
पॉड टैक्सी को जानने वाले इसे महंगा सौदा बताते हैं, उनके अनुसार इसमें एक बार में महज छह सवारियां ही आ-जा सकती हैं जबकि इसकी चालन लागत कहीं ज्यादा है। उनके अनुसार कहने को तो इसकी चालन लागत मैट्रो ट्रेन के मुकाबले पांच गुना कम है लेकिन सवारियों के मद्देनजर देखा जाए तो मैट्रो उससे पचास गुना ज्यादा सवारियां लेकर चल सकती है। यात्रियों के लिए सबसे सस्ती लोकल ट्रेन है, पलवल से दिल्ली 57 किलोमीटर दूरी महज 15 रुपये में होती है, इसके विपरीत बल्लबगढ़ से नई दिल्ली तक मैट्रो में 64 रुपये खर्च होते हैं, पॉड टैक्सी इतनी दूरी के लिए सौ रुपये से भी ज्यादा वसूल करेगी। ये पॉड टैक्सी यूरोपीय शहरों के लिए अच्छी हो सकती हैं क्योंकि वहां आबादी कम है, दिल्ली-एनसीआर वाली घनी आबादी की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए ये पर्याप्त नहीं होंगी। पॉड टैक्सी के फैसले पर लोगों का कहना है कि क्या प्रदेश में मैट्रो के सारे प्रोजेक्ट पूरे हो गए हैं, आरआरटीएस प्रोजेक्ट की घोषणा होने के बाद क्या हुआ किसी को पता नहीं है, ये सारे प्रोजेक्ट अगर पूरे हो जाएं तो पॉड टैक्सी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, लेकिन घोषणा करने में कुछ खर्च तो होना नहीं है तो फरीदाबाद-गुडग़ांव मैट्रो, फरीदाबाद-पलवल मैट्रो, फरीदाबाद- गुडग़ांव आरआरटीएस प्रोजेक्ट की तरह ही पॉड टैक्सी का भी ढिंढोरा पीट दो, गोदी-पत्तलपाड़ मीडिया तो है ही जो सरकार से सवाल पूछने के बजाय जनता को वरगलाने को तैयार बैठी है। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि लूट कमाई और हिस्सापत्ती के लिए नेता-अधिकारी कोई भी प्रोजेक्ट समय पर पूरा ही नहीं होने देते ताकि लागत बढ़े और मोटा नजराना मिले। पॉड टैक्सी भी सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार का प्रोजेक्ट साबित होने वाली है।