पत्रकारिता का अंधा युग-8

पत्रकारिता का अंधा युग-8
February 13 04:14 2026

आनन्द स्वरूप वर्मा
कांग्रेस के पी.वी. नरसिंह राव ने 1991 से जिस नवउदारवादी आर्थिक नीति की शुरुआत की वह प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह से होती हुई नरेंद्र मोदी तक जारी है। सितंबर 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद और आतंकवाद की समस्या से निपटने के लिए विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों का एक सम्मेलन बुलाया था जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्रियों को सलाह दी कि वे मीडिया को ‘कोऑप्ट’ करने की कला सीखें। अब आज अगर नरेंद्र मोदी की सरकार ने समूचे मीडिया को अपने अनुकूल कर लिया है, तो इसमें आश्चर्य क्या! इसीलिए मुझे 2015 में अरुण शौरी की कही बात बहुत सही लगती है जिसमें उन्होंने मोदी सरकार को ‘कांग्रेस प्लस ‘काऊ’ कहा था। लेकिन यह ‘काऊ’ वाला तत्त्व बहद खतरनाक है। ऐसी हालत में चौथे स्तंभ का मर्सिया पढऩे का समय आ गया है। अब यह तथाकथित चौथा स्तंभ आम जनता के लिए दुश्मन के रूप में दिखायी दे रहा है। इसकी जब स्थापना हुई थी तो इसका मकसद लोकतंत्र के तीनों स्तंभों-कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका पर निगरानी रखना था। लंबे समय तक इसने अपने दायित्व को पूरा भी किया। लेकिन जैसा कि ऊपर बताया गया, इसका क्रमश: अध:पतन होता गया और आज ऐसी स्थिति पैदा हो गयी है कि अब इससे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। चूँकि इस पर किसी की निगरानी नहीं है इसलिए यह निरंकुश और बेलगाम हो गया है। और अपने को जनता का नहीं बल्कि अपने कॉरपोरेट मालिकों का जवाबदेह मानता है।

जाहिर है कि ऐसे में इन तीनों स्तंभों के साथ-साथ चौथे स्तंभ पर भी निगरानी रखने की जरूरत है और हमें इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या एक परिकल्पना के तौर पर ही सही हम किसी ‘पाँचवें स्तंभ’ (फिफ्थ इस्टेट) को खड़ा कर सकते हैं? यह पाँचवाँ स्तंभ अन्य स्तंभों के साथ-साथ विशेष रूप से चौथे स्तंभ पर निगरानी रखेगा। आप यह सवाल उठा सकते हैं कि अगर चौथा स्तंभ भ्रष्ट हो गया तो क्या गारंटी कि पाँचवाँ स्तंभ भी भ्रष्ट नहीं होगा। बात सही है। यह भी भ्रष्ट हो सकता है लेकिन इस काम में इसे भी कई दशक लग जाएँगे जैसा कि चौथे स्तंभ के संदर्भ में हुआ। यह पाँचवाँ स्तंभ मुख्य रूप से पत्रकारों को लेकर बनाया जाएगा क्योंकि इसका काम पत्रकारिता पर निगरानी रखना है। बावजूद इसके इस स्तंभ के साथ उन सभी लोगों को घनिष्ठ रूप से जोडऩा होगा जो राजनीति, स्वास्थ्य, शिक्षा, अर्थशास्त्र आदि अलग-अलग क्षेत्रों में किसी विकल्प के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इनके सहयोग के बिना न तो इस प्रयास को हम जिंदा रख सकेंगे और न इसे भ्रष्ट होने से बचा सकेंगे। यहाँ जवाबदेही का भी सवाल है।

हमारी जवाबदेही उस व्यापक जनसमुदाय के प्रति होगी जो मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक स्थिति से क्षुब्ध है और किसी विकल्प की तलाश में है। इसे एक आंदोलन की तरह लेकर आगे बढऩा होगा। केवल घोषणापत्र छाप देने और कमेटियाँ बना देने से इसे नहीं चलाया जा सकता। जब मैं आंदोलन की बात करता हूँ तो हमें यह तय करना होगा कि हम किन्हें लेकर, किनके खिलाफ आंदोलन करना चाहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमें पाँचवें स्तंभ की मित्र शक्तियों की शिनाख्त करनी होगी। इसी को ध्यान में रख कर मेरा मानना है कि समाज में विभिन्न क्षेत्रों में विकल्प के लिए संघर्षरत शक्तियों को साथ लेना होगा क्योंकि यही हमारी मित्र शक्तियाँ होंगी। इनके जरिये ही हम एक समानांतर सूचना व्यवस्था विकसित कर सकते हैं। जर्मनी में फासीवाद के खिलाफ बौद्धिक लड़ाई लडऩे वाले मशहूर कवि और नाटककार बर्तोल्त ब्रेख्त ने अपने एक लेख में झूठ के खिलाफ लड़ाई लडऩे के लिए कुछ तरीके बताये थे। उनका कहना था कि पाँच बातों को ध्यान में रखना चाहिए

1. सच को कहने का साहस, 2. सच को पहचानने की क्षमता, 3. सच को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का कौशल, 4. उन लोगों की पहचान करना जिनके हाथ में सच का यह हथियार कारगर हो सकता है, और 5. व्यापक जनसमुदाय के बीच सच को फैलाने का हुनर

पी. साईनाथ ने अपने एक वक्तव्य में एक बार कहा था कि आज मीडिया का झूठ बोलना उसकी संरचनागत बाध्यता (structural compulsion) है और इसे वह अपने सभी उपादानों सहित आत्मसात कर चुका है। इससे सहमत होते हुए मैं अपनी बात जॉर्ज ऑरवेल के इस कथन से समाप्त करूँगा जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘इन ए टाइम ऑफ यूनीवर्सल डिसीट, टेलिंग दि टूथ इज ए रिवोल्यूशनरी ऐक्ट ।Ó अर्थात् जिस समय चारों तरफ धोखाधड़ी का साम्राज्य हो सच कहना ही क्रांतिकारी कर्म है।

  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles