पाखंड : अम्बेडकर जयंती समारोह में भाजपाई नेता भी पहुंचे!

पाखंड : अम्बेडकर जयंती समारोह में भाजपाई नेता भी पहुंचे!
April 21 18:59 2025

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) 14 अप्रैल को बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर की जयंती पर हुए समारोहों में से शायद ही कोई ऐसा बचा होगा जिसमें अम्बेडकर विचारधारा के धुर विरोधी भाजपा नेता न पहुंचे हों। इन पाखंडी नेताओं की भाषणबाज़ी से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि इन लोगों ने बाबा साहेब की विचारधारा को स्वीकार कर लिया है।

ऐसा एक समारोह एनआईटी के हार्डवेयर चौक पर भी आयोजित किया गया था। बेशक इसका आयोजन दीन दयाल गौतम तथा उनकी संस्था सामाजिक न्याय अधिकार समिति द्वारा किया गया बताते हैं। परन्तु प्रशासन एवं भाजपाई नेता भी इसके आयोजन का श्रेय लेने में पीछे नहीं रहे। नगर निगम कर्मचारियों ने भी सभा स्थल पर आवश्यक कामकाज किए। इतना ही नहीं मंच से भाषण देने वालों में मुख्य रूप से केन्द्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर, हरियाणा के कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल तथा बडख़ल विधानसभा क्षेत्र के विधायक धनेश अदलखा थे। यदि सरकार एवं भाजपाई नेताओं का इस आयोजन में कोई सहयोग नहीं था तो इन्हें मंच पर चढऩे ही क्यों दिया गया? इन नेताओं से दलित वर्ग अपने हितों में क्या अपेक्षा कर सकता है? कुछ भी नहीं। ये नेता इस वर्ग को जैसे-तैसे बहला-फुसला कर अपने वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं।

दलित वर्ग को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि यह भाजपा उसी हिंदुत्ववादी विचारधारा की औलाद है जिसने 1950 में अम्बेडकर द्वारा रचित संविधान का कड़े शब्दों में विरोध करते हुए मानने से इनकार कर दिया था। इन हिंदुत्ववादियों के अनुसार भारत का संविधान मनुस्मृति पर आधारित होना चाहिए था। मनुस्मृति एक ब्राह्मणवादी आचार-विचार संहिता है जिसके अनुसार दलितों व महिलाओं को इन्सान तक नहीं समझा गया है। इसी संहिता के अनुसार जहां दलितों को अछूत व महिलाओं को पुरुष की जूती के समान समझा गया था। इसके विस्तार में न जाते हुए इतना भर कहना ही काफी रहेगा कि इन दोनों वर्गों को किसी प्रकार के भी मानवाधिकार नहीं दिए गए थे। हिन्दुत्ववादी आज फिर से उसी मनुस्मृति को लागू करना चाहते हैं।

भाजपा का हिन्दुत्ववादी पितृ संगठन अपने जन्म से ही भारत को उसी तरह का हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है जिसमें मनुस्मृति लागू हो सके। भाजपा नेता यदा कदा हिन्ट देते रहे हैं कि वे मौजूदा संविधान को बदल देंगे। लोकसभा के बीते चुनावों में तो खुले तौर पर ही यह कहा जाने लगा था कि 400 सीटें मिलने पर ये बाबा साहब के गले-सड़े संविधान को आसानी से बदल देंगे। यह तो शुक्र रहा कि ये लोग 240 पर ही अटक गए। झूठ बोलने व कलाबाजी खाने में ये भाजपाई इतने माहिर हैं कि अपनी कही गई बातों से मुकर गए और बाबा साहब और उनके संविधान के गीत गाने लगे। दलितों को आरक्षण न देना पड़े इसलिए विधिवत भर्तियां ही बंद कर दी गई। इसके फलस्वरूप आज देश भर में एक करोड़ से अधिक पद रिक्त पड़े हैं। जो दाएं-बाएं से कामचलाऊ भर्तियां की भी जा रही हैं, उनमें कोई आरक्षण नहीं दिया जा रहा।

पुरानी बातों को छोडि़ए अभी हाल ही में लोकसभा सत्र के दौरान भाजपाई गृहमंत्री अमित शाह ने बड़ी बेशर्मी के साथ कहा था कि अम्बेडकर-अम्बेडकर चिल्लाने की बजाय यदि राम-राम चिल्लाते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता। दरअसल अमितशाह की घुटी हुई आत्मा की यह आवाज़ यकायक फूट निकली थी। ये अम्बेडकर वाद के बढ़ते प्रभाव तथा किसी हद तक गोलबंद होते दलितों से घबराए अमित शाह की आंतरिक आवाज़ थी जो ऊपरी लि$फाफा फाड़ कर निकल आई थी। राम-राम जपते तो दलितों को हजारों वर्ष हो चुके थे लेकिन उन्हें कभी कोई राहत नहीं मिली थी। और तो और उन्हें राम आदि के मंदिरों में घुसने की इजाजत भी नहीं थी। यह तो अम्बेडकर का नाम ही था जिसने दलितों को पशु योनि से निकाल कर मनुष्य योनि में स्थापित करने का प्रयास किया। उनके इसी प्रयास से दुखी ये संघी एवं भाजपाई भेडि़ए भेड़ की खाल ओढ़ कर दलितों के बीच अपने घुसपैठ बनाने का प्रयास करते रहते हैं।

दलित वर्ग को इनकी तमाम साजिशों से बचकर रहना होगा, वरना फिर से हिन्दुत्ववाद का शिकार होने से इन्हें कोई नहीं बचा पाएगा। दलितों को अंबेडकर और उनकी विचारधारा के खुले दुश्मनों से तो मोर्चा लेना ही होगा, इससे भी ज्यादा संघ-भाजपा की गोद में बैठे अपनी ही बिरादरी के ऐसे लोगों से सावधान रहना होगा जो ब्राह्मणवादी संगठनों द्वारा दिए गए झूठे ओहदे और फेंके गए चंद सिक्कों के लिए पूरे दलित समाज का सौदा कर रहे हैं। उन्हें पहचानना मुश्किल नहीं है बस इतना देखना है कि पिछले लोकसभा चुनाव में जब संघी-भाजपाई खुलेआम बोल रहे थे कि चार सौ सीट आईं तो संविधान बदल दिया जाएगा, उस समय राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर दलितों के मसीहा माने जाने वाले कौन कौन से नेता चुप थे या संघ-भाजपा की रणनीति के तहत काम कर रहे थे।

कथनी कुछ करनी कुछ वाली संघ-भाजपा ने दलित रामनाथ कोविद को राष्ट्रपति बनाया और उनसे ही सरकारी नौकरी में गरीब सवर्णों को आरक्षण देने वाले विधेयक पर हस्ताक्षर करवा डाले। राष्ट्रपति होने के बावजूद दलित होने का अहसास कराने के लिए उनसे एक ब्राह्मण के पैर तक पकड़वाए गए। दलितों को अपने बीच के कोविदों को पहचानना और समाजहित में काम करना वक्त की मांग है।

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Mazdoor Morcha
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