फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) शहर भर में जगह जगह लगे कचरे के बदबूदार ढेर और उफनते सीवर आम जनता के लिए परेशानी और बीमारियों का सबब बन रहे हैं और मेयर प्रवीण बत्रा जोशी स्वच्छता की शपथ दिलाने का नाटक कर रही हैं। नगर निगम के सभागार में एक जून को स्वच्छता पखवाड़े का शुभारंभ करते हुए उन्होंने चंद निकम्मे कर्मचारियों और लूट कमाई की नीयत से पार्षद बनने वालों को शपथ का पाखंड कराया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि शहर को इंदौर जैसा बनाने के लिए मदद करें।
मेयर महोदया, कोई भी शहर एक पखवाड़े में स्वच्छ नहीं हो सकता, इसके लिए निरंतर मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। इंदौर का नगर निगम प्रशासन, मेयर और पार्षद शहर को साफ करने के लिए स्वच्छता पखवाड़े का इंतजार नहीं करते बल्कि पूरे साल काम करते हैं, इसीलिए बीते कई वर्षों से स्वच्छता रैंकिग में टॉप कर रहा है। यहां आप अपने पार्षदों पर ही काबू पाने की स्थिति में नजर नहीं आ रही हैं। पार्षद गायत्री देवी, रवि भगत ही अवैध कमाई के हाथ पैर नहीं मार रहे, सरदार जसवंत सिंह, जयवीर खटाना, मनोज नासवा जैसे पुराने पार्षद भी अनुभव का फायदा उठाते हुए अवैध निर्माण से लेकर कूड़े तक से कमाई करने में लगे हुए हैं।
इन पार्षदों को अपने वार्ड की सफाई से ज्यादा कूड़े से होने वाली कमाई पर कब्जा जमाने में दिलचस्पी है। ईकोग्रीन का अनुबंध रद्द होने के बाद वार्डों से कूड़ा उठाने के लिए निजी एजेंसियां काम में लगाई जा रही हैं। अनेक पार्षद बेनामी तौर पर एजेंसियां बना कर कचरा उठाने का ठेका हासिल करने में लगे हैं तो कई पार्षद एजेंसियों को काम दिलाने के लिए कमीशन वसूल रहे हैं। वार्ड तीन के पार्षद रवि भगत ने तो निगमायुक्त को चिठ्ठी तक लिख डाली कि उनके वार्ड की सफाई का ठेका फलां कम्पनी को ही दिया जाए।
अभी टेंडर जारी भी नहीं हुए और इन एजेंसियों ने वसूली भी शुरू कर दी है। वार्ड नंबर तीन में सफाई अभियान सेवा समिति फरीदाबाद नाम की संस्था की ओर से नगर निगम फरीदाबाद के लोगो वाला कैश मेमो काट कर घरों से न्यूनतम पचास रुपये वसूले जा रहे हैं जबकि व्यावसायिक व औद्योगिक संस्थानों से पांच सौ से लेकर पांच हजार रुपये तक वसूले जा रहे हैं। इन रसीदों पर जीएसटी नंबर भी नहीं है और न ही नगर निगम में इनका कोई रिकॉर्ड है।
जानकारों के अनुसार एक वार्ड से प्रतिमाह कूड़ा बटोरने के नाम पर दो से ढाई लाख रुपये तक की वसूली होती है। कूड़ा उठाने के लिए ट्रैक्टर ट्रॉली भी नगर निगम की इस्तेमाल हो रही है। इनका काम कचरा बटोर कर नगर निगम के खत्तों में डाल देना है बस। बताया जा रहा है कि ठेकेदार डोर टू डोर कचरा लेकर आने वाले लड़कों को कुछ देता नहीं है, उनकी कमाई घरों से कचरे के साथ निकलने वाला कबाड़ बेचने से होती है। यानी कूड़ा कलेक्शन में प्रति महीने औसतन पच्चीस से तीस हजार का खर्च और कमाई दो लाख। यही कारण है कि हर वार्ड में पार्षद कूड़ा कलेक्शन अपने हाथ में लेना चाहता है।
वार्डों की सफाई के लिए अपनाई जाने वाली टेंडर प्रक्रिया निष्पक्ष और किफायती नहीं होने वाली। एक सफाईकर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कचरे से होने वाली मोटी कमाई पर केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर के सजातियों ने कब्जा कर रखा है। नगर निगम में जितनी भी सफाई एजेंसियां पंजीकृत की जा रही हैं लगभग सभी मंत्री गूजर के सजातीयों की है। यानी सिर्फ लूट कमाई की योजना है सफाई की नहीं। वैसे भी अगर शहर साफ हो गया तो फिर सफाई के नाम पर मोटी कमाई बंद हो जाएगी।
स्वच्छ भारत अभियान का पाखंड कर चीन की कंपनी ईकोग्रीन और उसके संघी संचालकों पर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों लुटाने वाली भाजपा की ट्रिपल इंजन सरकार की मेयर प्रवीण बत्रा जोशी भी अच्छी तरह जानती हैं कि शहर के कचरे से ज्यादा गंदगी और भ्रष्टाचार तो नगर निगम में है। मेयर बनते ही उन्होंने अपने आवास पर सात नए एसी लगवाने का फरमान जारी किया था, ऐसे में माना जा सकता है कि वह भी निगम की गंदगी साफ करने के बजाय उन्हीं भ्रष्ट और निकम्मे अधिकारियों का साथ देना फायदेमंद सौदा समझेंगी। रही जनता की बात तो सरकार उसे टैक्स से तो पहले ही लूट रही है अब कूड़े के नाम पर सत्ता से मिलीभगत करने वालों की पर्ची का शुल्क चुकाने को भी मजबूर रहेगी।