प्रभात कुमार बसन्त अभी पाँच -छ: दिन पहले एक मंदिर के पास से गुजर रहा था। मानवधर्मशास्त्र के ऊपर भाषण हो रहा था । वक्ता बोले कि मनुस्मृति को न मानना अपने पिता को न मानने के जैसा है । उनका मानना था कि मनुस्मृति में आदर्श परिवार, आदर्श नारी और आदर्श समाज तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं । अगर हम उन्हें मान लें तो हमारे देश की सारी समस्यायों का समाधान हो जाएगा।
चूंकि बड़ी संख्या में लोग यह मानते हैं कि इस किताब में समाज की समस्यायों का निदान है इसलिए हमें इनके बारे में जानना चाहिए। मानवधर्मशास्त्र में जाति व्यवस्था, परिवार के ढाँचे और स्त्रियों की स्थिति को लेकर काफी चर्चा की गयी है । इनकी समझ बनाना इसलिए जरूरी है कि आज के हिन्दुस्तान में धर्म और जाति काफी हद तक राजनीति के व्याकरण को निर्धारित करते हैं । हमारे देश में ज्यादातर शादियां जाति और परिवार के उन्हीं मानकों के आधार पर होती हैं जो मनु ने निश्चित किये थे । परिवार के भीतर पुरुष स्त्री संबंध कैसे हों, कौन बड़ा है, किसके कब्जे में संपत्ति हो , किसे समय समय पर पीटना चाहिए – इन सारे मुद्दों पर मनु निर्देश देते हैं। ये निर्देश आज भी हमारे समाज में पैठ बनाये हुए हैं। महिलाओं को ले कर मनु के निर्देश चर्चा के विषय रहे हैं।
कुछ विद्वान यह बताते हैं कि मनु ने स्त्रियों को काफी ऊँचा स्थान दिया था । मनु का एक प्रसिद्ध श्लोक है जिसमे कहा गया है कि जहाँ नारियों की पूजा होती हैं वहां देवता वास करते। लेकिन अगर हम इस पुस्तक में नारियों के बारे में लिखे सभी श्लोकों का अध्ययन करेंगे तो पता चलेगा कि मनु स्त्रियों को हेय भाव से देखते थे । उदाहरण के लिए मनु का प्रसिद्ध श्लोक कहता है। “समय – कुसमय मे, इस लोक में या परलोक में, जिस व्यक्ति ने रीति रिवाज के साथ शादी की है वह हमेशा अच्छा होता है। पति में अगर कोई भी अच्छाई ना हो, वह भले ही व्यभिचारी हो , वह बिलकुल नालायक ही क्यों न हो, अच्छी स्त्री को पति को एक देवता समझ कर पूजना चाहिए।” एक अन्य श्लोक में मनु कहते हैं।
“व्यभिचारी वृत्ति, अस्थिरता , संग दिली स्त्रियों के अंदर कूट कूट कर भरी होती है। उनपर कड़ी नजर रखने पर भी वे पति के खिलाफ हो जाती हैं ।” शायद यही कारण है कि एक प्रसिद्ध श्लोक में वे कहते हैं “नारी को बचपन में पिता की निगरानी , शादी के बाद पति की निगरानी में और पति के मर जाने पर पुत्र की निगरानी में रखा जाना चाहिए । किसी भी हालत में नारी को स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिए।” महिलाओं को स्वतंत्र रूप से कोई भी धार्मिक कार्य करने का अधिकार नहीं था। वेदों से तो उन्हें दूर ही रखा जाता था। जरूरत पडऩे पर उनकी पिटाई का भी प्रावधान है। स्त्रियों के लिए ऐसे कानून बनाने के पीछे एक पितृसत्तात्मक जाति व्यवस्था की अवधारणाएं काम कर रही थीं । जाति व्यवस्था इस मान्यता पर आधारित थी कि संतति पिता की आध्यात्मिक और सांसारिक उत्तराधिकारी होती है। संतति का पिता निश्चित करने का सबसे कारगर उपाय था महिलाओं के ऊपर कड़ी निगरानी। शादी ब्याह के ऊपर उनका कोई अख्तियार नहीं।
शादी एक ही जाति के दो परिवारों के पुरुषों द्वारा ही निश्चित की जा सकती है। अब यदि मंदिरों में मनु निर्मित आदर्श समाज को फिर से लाने की बात की जा रही है तो आप समझ सकते हैं वह कैसा समाज होगा। निश्चित रूप से उसमे निम्न जातियों और महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं। (जामिया मिलिया में इतिहास के प्रोफेसर)