सत्यवीर सिंह 15 जनवरी 1902 को जन्मे मेहमद नाजि़म रान उफऱ् नाजि़म हिक़मत के पिता तुर्क और मां जर्मन थीं। पहले विश्व युद्ध में तुर्की का ऑटोमन शासक जर्मनी के साथ लड़ा था। 18 साल उम्र होने से पहले ही उन्हें 1919 में सेना में भर्ती कर लिया गया और जंग के मोर्चे पर भेज दिया गया। वे वहां बहुत बीमार हो गए और 1920 में उन्हें मोर्चे से वापस भेज दिया गया। स्वस्थ होते ही उन्होंने महसूस किया कि जंग लडऩी ह तो हुकूमत के इशारे पर जिससे वह कहे उससे क्यों लड़ें? अपनी हुकूमत ही जब लोगों पर ज़ुल्म ढाती है तब शोषित-पीडि़त लोगों के साथ मिलकर, हुकूमत की ना-इंसाफी के खि़लाफ़ क्यों ना लड़। 1921 में महज़ 19 साल की उम्र म मेहमद नाजि़म तुर्की के आज़ादी आंदोलन में शामिल हो गए।
तुर्की के आज़ादी आंदोलन में उनकी मुलाक़ात आंदोलन के हीरो मुस्तफ़ा कमाल पाशा उफऱ् अतातुर्क से हुई। उन्हें शेर लिखते देख मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने उनसे कहा; बरखुरदार ये क्या लिखते रहते हो, लिखना ही है तो कुछ ऐसा लिखो कि तुर्की के नौजवान आज़ादी आंदोलन में खिंचे चले आएं। ये बात नौजवान मेहमद नाजि़म के दिल को छू गई। 1917 की रुसी क्रांती और लेनिन के बारे में उन्होंने पढ़ ही रखा था। उन्होंने कविता लिख मारी जिस पर सब साथी वाह-वाह कर उठे और बोले ‘तू तो यार कम्युनिस्ट है!’ उसके बाद तो लोग उनकी कविताओं के दीवाने होते चले गए। उन्हें तुर्की के नौजवानों को आज़ादी आंदोलन में शामिल करने के लिए प्रेरित करने के लिए शिक्षक का काम सौंप दिया गया। वहीं कट्टर मज़हबी ज़हनियत वाले लोग उन्हें कम्युनिस्ट कहकर किनारा करने लगे। उनके बर्ताव को देखकर मेहमद नाजि़म के दिल में अज़ीब खय़ाल आया। ये लोग कम्युनिज्म से इतना डरते हैं तो मुझे कम्युनिज्म को ठीक से समझना चाहिए।
30 सितंबर 1921 को मेहमद नाजि़म उफऱ् नाजि़म हिक़मत अपने दोस्त मुहित्तिन बे के साथ मास्को पहुंच गए। वहां उनकी मुलाक़ात पहले प्रतिष्ठित रुसी कलाकार व्लादिमिर मायाकोव्सकी से हुई। कुछ दिन बाद ही उन्हें लेनिन से मिलने का मौक़ा भी मिल गया। पढऩे का शौक़ था ही, उन्होंने रुसी क्रांति से जुड़ीं बहुत सारी कि़ताबें पढ़ डालीं। कुछ दिन बाद जब तुर्की लौट तो वे तुर्की के कम्युनिस्ट नाम से शोहरत हासिल कर चुके थे। अब उनकी नज्में तुर्की भर में मक़बूल हो रही थीं और नौजवानों में अन्याय और शोषण से बग़ावत करने का ज़ज्बा पैदा कर रही थीं। इसके खामियाज़े के रूप में उन्हें पहली बार सरकारी प्रसाद 18 मार्च 1933 को मिला!
‘आप तुर्की में कम्युनिज़म फ़ैला रहे हैं’, इस आरोप में गिरफ्तार कर, उन्हें जेल में डाल दिया गया। महज़ 4 महीने मुक़दमा चला और उन्हें क़सूरवार घोषित कर 29 जुलाई 1933 को 6 महीने की सज़ा सुना दी गई। वे जेल में ही थे कि उनकी एक और नज़्म को आपत्तीजनक पाया गया। इस बार फिर वही दिलचस्प आरोप और गहराई से लगाया गया: ‘आप तो कम्युनिज़म फैलाने के साथ-साथ, माशरे को बग़ावत के लिए भी भड़का रहे हैं! 31 जनवरी 1934 को उन्हें 5 साल की सज़ा सुनाई गई। 1935 में लेकिन सरकार ने खुश होकर सभी राजनीतिक क़ैदियों को सज़ा माफ़ी दे दी, जिसकी वज़ह से नाजि़म हिक़मत भी जेल से छूट गए।
कुछ लोग जेल के डर से अपना रास्ता बदल लेते हैं, लेकिन नाजि़म हिक़मत उन कच्चे लोगों में से नहीं थे। अब तो उन्होंने शायरी के साथ-साथ कहानियां, नाटक, उपन्यास, यहाँ तक कि फिल्मों की स्क्रिप्ट भी लिखनी शुरू कर दी। जो भी लिखा, डंके की चोट पर लिखा, ज़ोरदार लिखा, बेख़ौफ़ लिखा, ज़ुल्म-ओ-जबर के खि़लाफ़ और इंसाफ़ के हक़ में ही लिखा। नाजिम हिक़मत अब, तुर्की के ही नहीं बल्कि समूची दुनिया के चहेते जन-साहित्यकार बन गए थे। उनकी कविताएं और कहानियां दुनियाभर में पढ़ी जा रही थीं। क्रांतिकारियों की अलमारियों में उनकी शायरी ज़रूर मिलती थी।
सरकार अब उनसे दहशत खाने लगी थी इसीलिए 1938 में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया और इस बार, ‘आप सेना को भी विद्रोह करने को भड़काते हैं, यह बहुत गंभीर दफ़ा लगी। मुक़दमे की नौटंकी जल्दी ही निबटा दी गई और उन्हें 13 साल 4 महीने की सज़ा हुई। उनके जेल में रहते हुए ही उनके खि़लाफ़ एक और चार्ज शीट दाखि़ल हुइ। घुमा फिराकर लिखने की उन्हें आदत नहीं थी इसलिए सज़ा होने में भी अदालतें ज्यादा वक़्त नहीं लेती थीं। इस बार उन्हें 15 साल की सज़ा हुई। इस तरह कुल 28 साल की सज़ा हो गई! उन्हें मिली इतनी लंबी सज़ा के खि़लाफ़ तुर्की में लोग सड़कों पर आ गए। दुनिया भर के बड़े-बड़े प्रख्यात साहित्यकार जैसे फैज़ अहमद फैज़,पाब्लो नरूदा मोर्चे निकालने लगे। सरकार को उन्हें 1950 में सज़ा माफ़ी देकर रिहा करना पड़ा।
उनके चाहने वाले यह अच्छी जान चुके थे कि नाजि़म हिक़मत को उनके रास्ते से थोडा सा भी हटाना मुमकिन नहीं। इसलिए, जेल से रिहाई के बाद तुर्की के लोग उन्हें इस बात के लिए मनाने में क़ामयाब रहे कि वे तुर्की छोड़कर सोवियत संघ चले जाएं। 17 जून 1951 को नाजि़म हिक़मत तुर्की छोड़कर मोस्को चले गए। सरकार तो बस इसी का इंतज़ार कर रही थी उसने उनकी तुर्की की नागरिकता ही समाप्त कर दी। उनका तुर्की का पासपोर्ट रद्द कर दिया गया। उसके बाद वे मृत्यु पर्यंत मास्को में ही रहे। उन्हें दुनिया भर में इनाम-ओ-इकऱाम से नवाज़ा गया। उनकी कविताओं का दुनिया की हर भाषा में अनुवाद हो चुका है। आज ही के दिन, 3 जून, 1963 सुबह 6:30 बजे मास्को में हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हुई।