मालिक और मज़दूर के बीच बैर की वज़ह क्या है?

मालिक और मज़दूर के बीच बैर की वज़ह क्या है?
September 18 15:37 2022

फरीदाबाद (म.मो.) पहले ज़माने में जिसे सामंतवाद कहा जाता था, जब कोई कारीगर कुछ बनाता था, तो उसे उसके नाम से जाना जाता था. जैसे ये बैलगाड़ी हरेराम बढई की बनाई हुई है. कई बार उसपर उसका नाम भी लिखा होता था. आज, पूंजीवाद में उत्पादन बहुत बढ़ गया है और हर उत्पादन अपने इस्तेमाल के लिए नहीं, बल्कि बाज़ार में बेचने के लिए ही होता है. उत्पादन सामूहिक, सामाजिक हो गया है. आज कोई ये नहीं कह सकता कि मारुती कार किस मज़दूर ने बनाई है. क्योंकि उसके बनाने में हजारों मज़दूरों के हाथ लगे हैं. मारुती कार बनकर, शो रूम में बिकने के लिए गुडगाँव और मानेसर से निकलती है, लेकिन उसके कल पुर्जे फरीदाबाद के हज़ारों मज़दूरों के हाथों से बनते हैं. हर रोज़ उत्पादन अधिक से अधिक सामाजिक होता जा रहा है, लेकिन उसका मालिकाना व्यक्तिगत है. ये है बैर की असल वज़ह. बल्कि हर रोज़ मालिक गिनती में कम होते जा रहे हैं लेकिन उनके पूंजी के पहाड़ विशालकाय होते जा रहे हैं. मालिक चाहता है, कि सारा उत्पादन सामाजिक हो जाए, सब कुछ उसकी कंपनियां ही बनाएं, लेकिन जो भी वस्तु बने उसका मालिक सिर्फ  वही रहे. ये पूंजीवाद में ही संभव है. मज़दूर चाहते हैं कि जैसे उत्पादन सामाजिक है, उसी तरह उत्पादन पर मालिकाना भी सामाजिक रहे, सारे समाज का रहे. इस व्यवस्था को समाजवाद कहते हैं. जैसे-जैसे उत्पादन ज्यादा से ज्यादा सामाजिक होता जा रहा है और मालिक कम होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था को टिकाए रखना कठिन होता जा रहे है. मालिक और मज़दूर की इस लड़ाई का बीच-बिचाव नहीं हो सकता. निश्चित रूप से, जल्दी ही वो दिन आने वाला है, जब उत्पादन करने वाले मज़दूर एक हो जाएँगे और वे मालिक का कान पकडक़र, उसे अलग बिठा देंगे. सामाजिक उत्पादन पर सामाजिक मालिकाना क़ायम हो जाएगा. मुनाफ़ाखोर सरमाएदार भी काम करेगा तो खाएगा वर्ना भूखा मरेगा.

  Article "tagged" as:
  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles