फरीदाबाद (म.मो.) हरियाणा सरकार द्वारा चलाये जा रहे तमाम छ: मेडिकल कॉलेजों में फीस को 80 हजार वार्षिक से बढाकर एकदम से 10 लाख कर दिया है। केवल अग्रोहा मेडिकल कॉलेज, जिसे एक ट्रस्ट द्वारा चलाया जा रहा है, में यह फीस दो लाख वार्षिक थी। इस बढोतरी के चलते अति मेधावी यानी प्रथम श्रेणी के वे छात्र यहां दाखिला नहीं ले सके जिनके पास देने को इतनी मोटी फीस नहीं थी। यह फीस बढोतरी एक प्रकार से अमीर लोगों के लिये आरक्षण देने का काम कर रही है।
दूसरी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि फीस में इतनी भारी भरकम वृद्धि करने के बावजूद इन छात्रों को पढ़ाने के लिये पर्याप्त फैकल्टी किसी भी मेडिकल कॉलेज में नहीं है। प्रत्येक कॉलेजवार ब्योरा इस प्रकार है:
ऐसा नहीं है कि इन रिक्त पदों के लिये उपयुक्त लोग नहीं मिल रहे, इसके बावजूद मेडिकल जैसे गम्भीर विषय को पढऩे-पढ़ाने में सरकार द्वारा बरती जा रही यह कोई मामूली लापरवाही नहीं है, बल्कि इसे लापरवाही न कह कर, धन बचाने की सोची-समझी रणनीति कहना उचित होगा। औसतन एक फैकल्टी का मासिक वेतन दो लाख भी लगाया जाय तो खट्टर जी इन 982 रिक्त पदों से 1964 लाख यानी 19 करोड़ 64 लाख प्रति माह की कमाई कर रहे हैं। इससे घटिया सोच और कुछ हो नहीं सकती। बदनीयति का आलम यह है कि इतनी मोटी फीस वसूलने के बावजूद खट्टर सरकार ने अभी तक इन रिक्त पदों को भरने के लिये आवेदन तक नहीं मांगे हैं। फैकल्टी भर्ती का मामला इतना सरल भी नहीं होता कि एक को बुलाओ और 100 आ जायें, इसके लिये लगातार आवेदन मांगने का सिलसिला चलाना पड़ता है। स्थानीय ईएसआई मेडिकल कॉलेज में हर महीने फैकल्टी की भर्ती चलती रहती है।
गौरतलब है कि यह फैकल्टी छात्रों को पढ़ाने के साथ-साथ अस्पताल में आने वाले मरीजों का इलाज भी करते हैं। खट्टर की इस घटिया एवं जनविरोधी सोच के चलते जहां एक ओर छात्र पढ़ाई से वंचित हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर क्षेत्र के मरीजों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पा रही है। इसके परिणाम स्वरूप मरीज़ों को दिल्ली व इधर-उधर के व्यापारिक अस्पतालों की शरण में जाकर लुटना पड़ता है। संदर्भवश, हरियाणा में 15 लाख आयुष्मान तथा 13 लाख चिरायु कार्ड खट्टर जी बना चुके हैं। नियमानुसार इन कार्ड-धारकों को न तो प्राथमिक चिकित्सा देने की कोई व्यवस्था की गई है और न ही पूरी तरह से सेकेंडरी चिकित्सा की।
ड्रामेबाजी के लिये केवल सुपर स्पेशलिटी चिकित्सा देने का दावा किया गया है। यदि खट्टर वास्तव में ही अपनी जनता को कोई चिकित्सा सुविधा देना चाहते तो इन रिक्त पदों के साथ-साथ स्वास्थ्य विभाग के अन्य रिक्त पदों को भी भर सकते थे। यही है खट्टर का राम़-राज्य।