जुमलेबाजी में सैनी क्यों पीछे रहें, बजाया गुडग़ांव-फरीदाबाद-नोएडा रैपिड रेल-मैट्रो का झुनझुना

जुमलेबाजी में सैनी क्यों पीछे रहें, बजाया गुडग़ांव-फरीदाबाद-नोएडा रैपिड रेल-मैट्रो का झुनझुना
March 04 08:00 2026

मज़दूर मोर्चा ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुमलेबाजी के हथकंडे सीख रहे सीएम सैनी ने बीते बुधवार को गुडग़ांव-फरीदाबाद-नोएडा रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (आरआरटीएस) का जुमला उछाल दिया। प्रोजेक्ट की घोषणा के उत्साह में सीएम यह भी भूल गए कि नोएडा उनके राज्य में नहीं बल्कि यूपी में आता है। जो ट्रिपल इंजन सरकार बारह साल में मंझावली पुल की यूपी में कनेक्टिविटी नहीं करवा पाई वह गुडग़ांव से नोएडा के बीच रैपिड रेल कितने दिनों में चलाएगी समझा जा सकता है। सीएम सैनी के अनुसार यह आरआरटीएस कॉरिडोर गुरुग्राम में इफको चौक से शुरू होगा और सेक्टर 29, मिलेनियम सिटी, सेक्टर 52, सेक्टर 57 और सेक्टर 61 को ग्वाल पहाड़ी से जोड़ेगा। यह सीधा दिल्ली मेट्रो की येलो लाइन से जुड़ेगा। फरीदाबाद में कॉरिडोर सैनिक कॉलोनी से गुजरेगा। यहां से न्यू फरीदाबाद को जोड़ेगा, जो एनआईटी, बाटा चौक और सेक्टर 12-15 को दिल्ली मेट्रो की वायलेट लाइन से जोड़ेगा। पाठकों को बता दें मेट्रो यलो लाइन का निकटतम स्टेशन हौज खास है। सीएम सैनी ने यह नहीं बताया कि कॉरिडोर को यलो लाइन से सैनिक कॉलोनी तक कैसे जोड़ा जाएगा। सैनी इस परियोजना से जिस नोएडा को जोडऩे के दावे कर रहे वहां अभी कोई बात ही नहीं हुई है।

दरअसल, मोदी हों या खट्टर-सैनी, संघ की शाखाओं से दीक्षित होकर निकले इन सबका बीते बारह वर्षों से एक ही शुगल रहा है काम न करो लेकिन काम का ढिंढोरा जोर जोर से पीटो। यह प्रोजेक्ट भी उसी का हिस्सा है। सरकार पहले भी समय-समय पर फरीदाबाद-पलवल, फरीदाबाद-गुडग़ांव मैट्रो, फरीदाबाद-नोएडा-गुडग़ांव एफएनजी का ढिंढोरा पीटती रही है। अधिकारी भी जानते हैं कि दिल्ली मैट्रो रेल कॉरपोरेशन ( डीएमआरसी) पलवल और गुडग़ांव के प्रोजेक्ट को पूरी तरह खारिज कर चुकी है, बावजूद इसके नेतागण चुनावों में इसका राग अलापते हैं। वह तो छोडि़ए मंझावली पुल भी पिछले बारह साल मेें चालू नहीं करवा पाए, जनता की गाढ़ी कमाई के सैकड़ों करोड़ रुपये पुल बनाने में लगा दिए गए लेकिन उत्तर प्रदेश में भी भाजपा सरकार होने के बावजूद दस साल में कनेक्टिविटी नहीं करवा पाए। दरअसल, मंझावली पुल भाजपा सरकारों की मूर्खतापूर्ण, बिना अध्ययन और समन्वय के परियोजना की घोषणा और शिलान्यास करने का बेहतरीन उदाहरण है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और कृष्णपाल गूजर ने यमुना नदी पर पुल बनाने से पहले यह नहीं देखा कि उत्तर प्रदेश में कनेक्टिविटी मिल पाएगी या नहीं, वाहवाही लूटने के लिए हवाहवाई घोषणा और शिलान्यास कर डाला। पुल तो बन गया लेकिन यूपी में कनेक्टिविटी के लिए जमीन ही नहीं थी। पुल बनाने के बाद यूपी सरकार और नोएडा प्राधिकरण से कनेक्टिविटी की भीख मांगी जा रही है, जमीन नहीं होने के कारण सुनवाई नहीं हो रही।

अब सीएम सैनी ने भी अपने तौर पर नोएडा तक आरआरटीएस की घोषणा कर दी है। इसका हाल मंझावली पुल जैसा होता तय है अगर यह वहां तक पहुंच पाए तो। सैनी साहब आप गुडग़ांव को सैनिक कॉलोनी, बाटा मैट्रो से बाद में जोड़ लेना, पहले टूटा पड़ा बाटा पुल तो ठीक करा दो, पूरे पुल में जगह जगह सड़क बुरी तरह उखड़ी हुई है। बियरिंग के जोड़ भी सही सलामत नहीं रहे, इसका कारण जोड़ों पर सड़क ऊपर नीचे हो चुकी हैं जिससे वाहनों में झटके लगते हैं। पुल में गड्ढों के कारण वाहन बच कर चलने को मजबूर हैं यानी पूरी चौड़ाई में ट्रैक का इस्तेमाल नहीं हो पाता और ट्रैक के सही वाले हिस्से पर ही वाहनों का दबाव पड़ रहा है, इससे वहां भी टूट फूट हो रही है। इन गड्ढोंं से धूल उड़ती है। बाटा पुल की यह हालत बीते चार-पांच साल से है और कभी निगम तो कभी स्मार्ट सिटी, एफएमडीए या पीडब्ल्यूडी मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये हर साल डकारते रहे लेेकिन इस दौरान पुल शायद ही कभी गुड्ढामुक्त हुआ हो।

बल्लभगढ़ में सोहना रेलवे ओवरब्रिज की भी हालत आज तक नहीं सुधर सकी है। 2024 में इसकी मरम्मत पर 65 लाख रुपये लुटा दिए गए लेकिन पुल 65 दिन भी गड्ढा मुक्त् नहीं रह सका था। इस पुल को फोर लेन करने की घोषणा खट्टर और उसके बाद केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर, मूलचंद शर्मा सहित अनेक भाजपाई गाहे बगाहे खास कर चुनाव के समय करते रहे लेकिन दस साल गुजरने के बाद आज तक कुछ नहीं हो सका। एफएनजी प्रोजेक्ट का भी बार-बार ढिंढोरा पीट कर जमीनों के दाम बढ़वा कर भूमाफिया को लाभ पहुंचाने के अलावा कुछ नहीं हुआ। सैनी साहब आपकी सरकार ये छोटे छोटे प्रोजेक्ट ही पहले पूरे करा ले, उसके बाद हरियाणा से यूपी तक आरआरटीएस के दावे किए जाएं तो कुछ समझ में आए। लगता है कि आरआरटीएस की घोषणा सैनी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बुलेट ट्रेन की घोषणा से प्रेरित होकर की है। मोदी सरकार की निर्लज्जता देखिए कि बुलेट ट्रेन का कहीं पता नहीं है लेकिन इसकी विज्ञापनबाजी पर कमोबेश प्रोजेक्ट की कीमत जितनी रकम खर्च कर दी। बुलेट ट्रेन की ही तरह अनेक प्रोजेक्ट हैं सरकार गाहे बगाहे जिनकी मंजूरी मिलने, घोषणा करने के जुमले उछालती रही और पत्तलपाड़ मीडिया ने करोड़ों रुपये डकार कर सरकार की तारीफों के पुल बांध दिए। दरअसल, घोषणा- मंजूरी में तो कोई जोर नहीं लगता, जोर लगता है बनाने में, वह होना नहीं है।

  Article "tagged" as:
  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles