मज़दूर मोर्चा ब्यूरो उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और वाराणसी के सांसद पीएम मोदी ने विकास के नाम पर बनारस में जिस मणिकर्णिका घाट पर बुलडोजलर चलवा कर नेस्तनाबूद कर दिया है वही यूपी सरकार सूरजकुंड मेले में इन घाटों को प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर की तरह शोकेस कर रही है। मेले में आने वाले पर्यटकों को बड़े चाव से बताया जा रहा है कि बनारस के इन घाटों का सबसे ज्यादा और बेहतरीन विकास सत्रहवीं शताब्दी में मराठा राज के दौरान हुआ था। वैसे तो बनारस में अस्सी से अधिक घाट हैं लेकिन मणिकर्णिका घाट सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। जानकार कहते हैं कि वर्तमान में बनारस में जितने भी घाट हैं उनमें से अधिकतर का निर्माण छत्रपति शिवाजी के वंशजों के काल में खास कर होल्कर राजाओं ने करवाए थे। इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने बनारस में मणिकर्णिका घाट का निर्माण कराया था, निर्माण को यादगार बनाने के लिए इसी घाट पर गोद में शिवलिंग लिए उनकी मूर्ति स्थापित करवाई थी, इसके साथ ही गणेश प्रतिमा और गंगा स्वरूप की प्रतिमा भी तीन सदियों पहले की भारतीय संस्कृति-स्थापत्य का प्रतिनिधित्व करती थीं।
प्रधानमंत्री मोदी ने इन घाटों को नया और भव्य रूप देने का काम शुरू कराया है। जाहिर सी बात है कि जो अंधभक्तों की दृष्टि में साक्षात विष्णु भगवान हों और बकौल भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा खुद भगवान जगन्नाथ भी मोदी के भक्त हों और राम को उंगली पकड़ कर लाए हों तो ऐसे भगवान के आदेश पर अहिल्याबाई होल्कर का एतिहासिक घाट, उनकी, गणेश और गंगा की मूर्ति का सफाया होना ही था। मोदी-योगी के बुलडोजरों ने इन एतिहासिक इमारतों को नेस्तनाबूद करके इतिहास के पन्नों में समेट दिया।
जानकार कहते हैं कि संघ-भाजपा की रीति नीति सत्ता हासिल करने के लिए गले मिल कर पीठ में छुरा घोंपने वाली रही है, मणिकर्णिका घाट पहला उदाहरण नहीं है। मोदी जिस लाल कृष्ण आडवाणी के पैर पूजते थे प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहले उन्हें ही बर्बाद किया। उनकी सत्ता के लिए जो भी चाहे वह भाजपाई हो या कोई अन्य उसको रास्ते से हटाने की कला में माहिर हैं। संसद में संविधान को माथे से लगाया और आज संविधान की क्या हालत है किसी से छिपी नहीं है। अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिम समाज के मदरसों में आधुनिक विषय पढ़ाने की घोषणा की और पूरे देश में मदरसों की जांच शुरू हो गई। वक्फ बिल, यूजीसी बिल, कृषि कानून आदि मोदी-शाह की छुरा घोंप तकनीक के उदाहरण हो सकते हैं। इसके अलावा गुजरात में गोधरा कांड में मोदी को कटघरे में खड़ा करने वाला आईपीएस संजीव भट्ट हो या फिर मोदी पर गुजरात का सीएम रहने के दौरान एक एक युवती की जासूसी करने का आरोप लगाने वाले वरिष्ठ आईएएस प्रदीप शर्मा को पंगु कर दिया गया। उनकी सत्ता को चुनौती देने वाले गुजरात के गृहमंत्री हीरेन पांड्या की हत्या तो सबको याद होगी। इन उदाहरणों से समझा जा सकता है कि काशी घाटों की तोडफ़ोड़ कोई बड़ी बात नहीं है। अंधभक्त तो नहीं लेकिन ऐतिहासिक घाटों को तोड़े जाने का विरोध पढ़े लिखे, जागरूक और विवेकशील लोगों द्वारा पूरे देश में होने लगा। बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हुआ तो सरकार बैक फुट पर आई। संघ-भाजपा के जानकार कहते हैं कि संघ की पाठशालाओं में असफलता को भी उपलब्धि बनाने के गुर सीखने वाले मोदी-योगी सरकारों ने अपनी इस गलती को छिपाने के लिए ही बनारस के घाटों के गुणगान शुरू किए हैं। सूरजकुंड मेले में बनारस के घाट, मंदिर, डमरू-त्रिशूल और काशी को शोकेस किया जाना इसी डैमेज कंट्रोल का हिस्सा है। सूरजकुंड मेले में आने वाले पर्यटकों को काशी की अच्छी सूरत दिखा कर छवि चमकाई जा रही है भले ही पूरी काशी मोदी-योगी से नाराज रहे।