मज़दूर मोर्चा ब्यूरो संघ लोक सेवा आयोग परीक्षा में इस बार जामिया मिलिया इस्लामिया के ट्रेनिंग सेंटर के 32 अभ्यर्थियों ने सफलता हासिल की। इनमें से 13 मुस्लिम, दो ईसाई व शेष हिंदू व दलित आदि हैं। इस विश्वविद्यालय ने वंचितों के लिए उच्च पदों तक पहुंचने के लिए जो निशुल्क कार्यक्रम चलाया है उसके अनुसार प्रति वर्ष सौ प्रतिभावान छात्रों का चयन किया जाता है।खास बात यह है कि इनमें कई अभ्यर्थी अनुसूचित जनजाति यानि आदिवासी, दलित, ओबीसी वर्ग के हैं और सामान्य परिवारों से आते हैं, यानी आईएएस बनने के लिए लिए प्राइवेट कोचिंगों का लाखों रुपया वहन नहीं कर सकते थे।
इन अभ्यर्थियों की सफलता दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जैसी मानसिकता वाले लोगों के मुंह पर तमाचा है जो सरकार द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों को दी जा रही सब्सिडी का विरोध करने के साथ छात्रों से मोटी फीस वसूलने की वकालत करते हैं। जहां प्राइवेट कोचिंग संस्थान आईएएस ट्रेनिंग के लिए लाखों रुपयों का पैकेज बनाती हैं वहीं जामिया मिलिया के ट्रेनिंग सेंटर में मुफ़्त पढ़ाई और एक हजार रुपये प्रति माह खर्च पर रहने खाने, लाइबृ्रेरी, सभी विषयों के एक्सपट्र्स द्वारा लेक्चर की सुविधा दी जाती है। ऐसे चयनित छात्रों से छह माह का रहने व खाने का कुल खर्च मात्र छह हजार रुपये लिया जाता है। यही नहीं इंटरव्यू में सफलता के लिए मॉक इंटरव्यू के जरिए पर्सनालिटी डेवलपमेंट और कौशल भी मुफ़्त में निखारा जाता है।
जामिया के ट्रेनिंग सेंटर से निकले अभ्यर्थियों के नाम-पते देखने से पता चलता है कि उनमें कुछ पूर्वाेत्तर की उन जनजातियों से हैं जिनमें अभी भी शिक्षा का अभाव है। ईसाई, मुसलमान, सिख, दलित, ओबीसी यानी समाज के सामाजिक शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग-अल्पसंख्यकों को इस ट्रेनिंग सेंटर ने आईएएस जैसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक पद पर पहुुंचने में महती भूमिका निभाई। निश्चित ही जामिया यह इसलिए कर सका कि उसे सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए सरकार से अनुदान मिलता है। फीस सस्ती होने के कारण ही प्रतिभावान गरीब और सामाजिक-शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के बच्चे भी उच्च शिक्षा हासिल कर पा रहे हैं।
जामिया का यह परिणाम उन लोगों के मुंह पर भी तमाचा है जो इस आला यूनिवर्सिटी को देशद्रोहियों का अड्डा बता कर इसकी छवि धूमिल करने के कुत्सित प्रयास करते रहे हैं। विधायक कपिल शर्मा, सुदर्शन टीवी का सीईओ सुरेश चाह्वाण के, लाला रामदेव, हेमंत बिस्वसरमा जैसे अनेक नफरती इस विश्वविद्यालय पर कालिख उछालते रहे और यह साल दर साल देश को बेहतरीन आईएएस, पीसीएस, डॉक्टर, इंजीनियर, कंप्यूटर-सॉफ़्टवेयर इंजीनियर देता रहा। इसका आईएएस ट्रेनिंग सेंटर प्रतिवर्ष 25-30 सेलेक्शन दिलाता है।
विदित है कि दिल्ली जैसे शहर में छह हजार में मात्र एक कमरा मिलता है, जिसमें दो या तीन छात्र घुसे रहते हैं। इसके अलावा खाने का खर्चा होता है वो अलग। कोचिंग का जो पैकेज है वह किसी भी इंस्टीट्यूट का लाखों से कम नहीं होता। जाहिर है आम गरीब आदमी ये खर्चे वहन नहीं कर सकता। इसी नज़रिए से जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यायल ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए अपनी क्षमता अनुसार प्रतिवर्ष सौ प्रतिभावान छात्रों को चुनकर निशुल्क एवं उच्च स्तरीय शिक्षण प्रशिक्षण देने का बीड़ा उठाया है। इसका यह कार्यक्रम बीते 14 वर्षों से चल रहा है।
आईएएस जेहाद जैसे झूठ फैला कर सुरेश चाह्वाण के, लाला रामदेव जैसे कट्टरपंथी इस बेहतरीन यूनिवर्सिटी को बर्बाद करने के लिए विश्वविद्यायल अनुदान आयोग (यूजीसी) पर इनको दिए जाने वाले अनुदान में कटौती की वकालत करते हैं। दरअसल, शिक्षा पर सवर्णों का ही एकाधिकार वाली मनुवादी मानिसकता के पैरोकार संघी भाजपाई गरीब, दलित, ओबीसी वर्ग को शिक्षा से वंचित रखने के लिए ही शिक्षा महंगी किए जाने पर जोर दे रहे हैं। शिक्षा महंगी कर इन गरीब, आदिवासी, दलित, पिछड़ों को प्रतियोगिता से वंचित कर दिया जाए, यही ये चाहते हैं, ऐसें में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय का यह कदम, ऐेसे प्रतिभावान अभ्यर्थियों के लिए अमोघास्त्र साबित हो रहा है।